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शनिवार-रविवार-परिवार

शनिवार-रविवार-परिवार

मेरे बचपन की गलतकारियों में साहित्यिक रुचि का होना भी है। मैं उन दिनों का लेखक हूं जब कवि अपना उपनाम रखा करते थे। मैं हर विधा का था सो पहले बच्चे का नाम रखा उपन्यास। दूसरी बेटी हुई तो उसका नाम-कहानी रख दिया। अगली बेटी का नाम कविता रखा। फिर एक बेटा हुआ तो उसका नाम रखा-निबंध। मेरे एक दुष्ट समीक्षक ने सुझाव दिया अगर मेरे यहां अब की बार लड़का हो तो उसका नाम- चुटकुला रखना। मैंने यह व्यंग्य सह लिया और नसबंदी करवा ली। साहित्यिक परिवार वृद्धि का ठेका मैं ही क्यूं लूं? बड़े-बड़े नामवर हैं इस क्षेत्र में। साहित्य में परिवारवाद कभी चलता होगा, अब प्रचलन में कम है। उन दिनों संयुक्त परिवार थे, सो वकील का बेटा वकील, अध्यापक का बेटा अध्यापक और डाक्टर का बेटा डाक्टर बन जाता था। सबसे सुखी, साहसी, दबंग और हनकभरा परिवार वो होता था जहां एक बेटा पुलिस में, दूसरा वकील और तीसरा सचिवालय में होता था। इसे अंतरिम प्रशासन कहते थे।

मैं तो उस समय के प्रूफ रीडरों से भी परेशान था। तब मैंने एक आरती लिखी थी कि जै देवी आदि वृद्धि दे हो गया सत्यानाश। एक बेटा और जनम गया। मैंने नाम रखा-संस्मरण और छुट्टी पाई। एक हादसा और हुआ। मैंने अपनी रचना में प्रसाद जी को उद्धृत किया कि- नारी तुम केवल श्रद्धा हो। अगले दिन छपा साहित्य में परिवारवाद के दिन नहीं रहे। प्रेमचंद की तीसरी पीढी में लगभग साहित्य नहीं है। सुमित्रानंदन पंत से तो खैर उम्मीद ही नहीं थी। नागर जी, यशपाल, भगवती चरण जी, निराला जी से लेखक कम हैं, जिनके यहां साहित्य का परिवारवाद हो। समकालीन साहित्य को ही ले लो। ज्यादातर कवियों-कथाकारों के बेटा-बेटी हिंदी नहीं जानते। उनका कहना है कि हिंदी की न कोई टी.आर.पी. है, न कोई यू.एस.पी.। ग्लोबलाइजेशन के मार्डन टाइम में ये एक डाईंग लैंग्वेज है। समकालीन ने जैसे छंद का छायावाद छोड़ा था, उनके लाडलों ने हिंदी छोड़ दी। परिवार नियोजित होना ही था। कुंवारों से कोई उम्मीद नहीं होती। प्रतिभाएं बांझ हों तो असर ही तो उपजेगा। मेरे एक चचेरे भाई थे। पहले पहाड़ के थे, फिर दिल्ली जाकर हिंदी के हो गए और अपनी रचनाओं में पहाड़-पहाड़ कराहते रहे। उनके बड़े बेटे ने शेयर का काम संभाला। बेचारा ढेर हो गया। दूसरा किसी अमेरिकन कंपनी में था। नौकरी चली गई। तीसरा दूरदर्शी था, सो पान की दूकान खोल ली। आजकल उसी के दम पर भाई साहब का परिवार चल रहा है।

अब परिवार की कहें क्या। ये अकथ कहानी है। मेरे एक भूतपूर्व पहाड़ी मास्टर साहब ने हमें कबीर पढ़ते हुए बताया था कि- बूढ़े वंश कबीर का उपजा पूत कमाल। मास्टर जी ने इसका अर्थ बताया कि कबीर के यहां कमाल का पुत्र पैदा हुआ कि पूरा वंश परिवार असमय बूढम हो गया। मैं इस व्याख्या से सहमत हूं। जब कबीर के परिवार के ये हाल हैं, तो हमारी साहित्यिक औकात है ही क्या। अब तो जैसे शनिवार-रविवार वैसा ही परिवार।

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