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उइगर मुक्ति के लिए जूझती एक मां

उइगर मुक्ति के लिए जूझती एक मां

रेबिया कदीर और दलाई लामा का संबंध चीन से है। दोनों ही अपने जातीय समूहों की आजदी के लिये संघर्षरत हैं। दलाई लामा की तुलना में रेबिया कदीर कम जानी-पहचानी लग सकती हैं। लेकिन उनकी कुर्बानी की दास्तां किसी से कम नहीं है। वे एक करोड़ से अधिक उइगरों की मां हैं। बेशक उनके अपने सिर्फ ग्यारह बच्चे हैं। इनमें से दो जेल में बंद हैं।

लेकिन वे हर उइगर के लिये मां की तरह हैं, जेल में अपने बच्चों से बेखबर। उइगरों की हर चिंता रेबिया की अपनी चिंता है। वे मुक्त हुआ एक देश हैं, जिसमें उनके अपने गुलाम बच्चे हैं। वे कभी चीन की सबसे धनी महिलाओं में से एक थीं। आज उनके पास अपना एक भी पैसा नहीं है। वॉशिंगटन में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। हर वक्त उन्हें सिर्फ अपने उइगर बच्चों की मुक्ति का ख्याल ही सताता है। बासठ वर्षीया रेबिया को चीन की कम्युनिस्ट सरकार उग्रवादी मानती है।

ये बात भी दीगर है कि कभी वे चीन की संसद की सदस्य थीं और चीन की महिलाओं के प्रतिनिधि मंडलों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करती थीं। उन पर आरोप है कि शिनजियांग प्रांत में छपने वाले स्थानीय अखबारों को वे अपने पति सिद्दीक रौजी को देश से बाहर भेजती थीं। इसकी सज भी उन्हें छ: साल जेल में रह कर भुगतनी पड़ी। बमुश्किल दुनिया के दबाव में उन्हें चीनी सरकार ने रिहा किया और तब से वे निवार्सितों का जीवन जी रही हैं।

अब उनके जीने का मकसद सिर्फ एक है, शिनजियांग की आजदी। शिनजियांग में हाल में हान समुदाय और उइगर लोगों के बीच हुए दंगों का आरोप चीनी सरकार ने रेबिया पर लगाया है। इस्लामिक उग्रवादी संगठनों से उनके संबंध होने की बात कही है। इन दंगों में बड़ी संख्या में लोग मारे गये हैं। 2008 के तिब्बती विद्रोह की तरह ही 2009 भी अब उइगर बगावत के तौर पर जाना जायेगा।

चीन शिनजियांग में हान समुदाय के लोगों को बसा कर उइगर लोगों को अल्पसंख्यक बनाना चाहता है। इसके साथ ही वह उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी खत्म करने पर तुला है। इसको लेकर ही रेबिया संघर्षरत हैं। वैसे भी उइगर अपने को चीन की तुलना में मध्य एशिया के देशों के नजदीक मानते हैं। उनकी भाषा भी तुर्कियों से मिलती जुलती है। 21 जनवरी 1947 में जन्मी रेबिया एक गरीब परिवार में जन्मी। लेकिन अपनी मेहनत से वे एक सफल व्यवसायी बनीं।

लांड्री के काम से अपने व्यवसाय की शुरूआत कर वे एक बड़ी ट्रेडिंग कंपनी और डिपार्टमेन्टल स्टोर की मालकिन बनीं। इसी के साथ उन्होंने एक मदर प्रोजेक्ट के जरिये तमाम उइगर महिलाओं को अपना धंधा शुरू करने के लिये प्रशिक्षण और धन मुहैया कराया। 1997 में शिनजियांग के गुलज उइगर नरसंहार के बाद उन्होंने चीनी सरकार का विरोध शुरू किया। 1999 आते-आते तक रेबिया चीनी सरकार की दुश्मन नम्बर एक हो गईं और उन्हें देशद्रोह के नाम पर 1999 में जेल में डाल दिया गया।

इसके बाद 2005 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडिलीसा राइस के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया। 2006 में रेबिया को नोबल प्राइज के लिये नामित किया गया। इसी साल म्यूनिख में हुई विश्व उइगर कांग्रेस में उन्हें चेयरमैन बनाया गया। वाशिंगटन में रह कर वे कांग्रेस का काम विदेश में रहने वाले उइगरों की मदद से चला रही हैं। वे चीन के इस आरोप का प्रतिवाद करती हैं कि उनका संबंध पूर्वी तुर्किस्तान के उग्रवादी संगठन इस्लामिक मूवमेंट से हैं। वे उइगरों की मुक्ति के लिये शांतिपूर्ण संघर्ष की पक्षधर हैं।

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