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सप्तरंगी क्रांति का सपना दिखाने वाली सरकार ने कृषि विकास के लिए रोड मैप तैयार कर विभाग के सामने कालबद्ध योजनाओं का लक्ष्य तो रख दिया है, लेकिन कर्मियों की कमी दूर नहीं की जा सकी।

स्थिति यह है कि राज्य में बिहार कृषि सेवा के 1054 पद स्वीकृत हैं लेकिन कार्यरत अधिकारियों की संख्या मात्र 239 है। इसके अलावा सूबे में लगभग आठ सौ ऐसे अधिकारियों के पद भी रिक्त हैं जो प्रखंड कृषि अधिकारी या उनके समकक्ष हैं। सरकार ने 13 नये जिलों को कृषि जिला घोषित कर जिलास्तर के पद तो स्वीकृत कर दिये लेकिन निचले स्तर के पद आज भी नहीं स्वीकृत हैं। राज्य के 101 अनुमंडलों में अनुमंडल कृषि पदाधिकारियों के मात्र 62 पद ही स्वीकृत हैं। ऐसे में दिन-रात भी अधिकारी काम करें तो लक्ष्य को पाना आसान नहीं होगा।

विभाग में जब काम नहीं था तो अधिकारियों की भरमार थी। आज सिर्फ काम ही काम है तो अधिकारी ही नही हैं। अधिकारी आज संचिकाओं के बीच खोये रहते हैं। विभाग में योजनाओं के बढ़ते बोझ और अधिकारियों की घटती संख्या से इसका सहज ही अनुमान लगाया ज सकता है। योजनाओं की संख्या कुछ ऐसी बढ़ी कि विभाग का प्लान 23 करोड़ से बढ़कर लगभग चार सौ करोड़ तक पहंच गया।

वर्ष 2005-2006 में विभाग का आउट ले मात्र 23 करोड़ का था। इसमें लगभग 18 करोड़ रुपये स्थापना मद में खर्च होते थे। पिछले वर्ष विभाग का प्लान बढ़कर लगभग 373 करोड़ का हो गया है। इस दौरान सैकड़ों कर्मचारी रिटायर हो गये। विभाग का प्लान इस ऊंचाई पर तब पहुंच गया है जब स्थापना को गैर योजना मद में डाल दिया गया है। बिहार कृषि सेवा संघ के महासचिव आदित्यनारायण राय का कहना है कि सरकार काम भी लेती है और उनकी जयज मांगों पर विचार भी नहीं करती। शनिवार और रविवार को भी कभी-कभी दफ्तर आना पड़ता है। लेकिन हड़ताल अवधि का वेतन देने में सरकार को परेशानी हो रही है। वह भी तब जब संघ इस बात से सहमत है कि उस अवधि को अधिकारियों और कर्मियों के अजिर्त अवकाश में समायोजित किया जए।    

 

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  • Web Title:योजनाएं बढ़ी तो अधिकारी घट गए