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समाचार और मनोरंजन का घालमेल

क्या आप ने कभी सोचा है कि टेलीविजन के मनोरंजन और समाचार चैनल में फर्क करना कितना कठिन हो गया है? आखिरकार विज्ञापन और ग्राहक शुल्क के माध्यम से 18,000 करोड़ रुपए की कमाई करने वाले टीवी व्यापार पर मनोरंजन ही तो छाया हुआ है। जबकि 14,800 करोड़ की कमाई करने वाला प्रिंट मीडिया ज्यादातर समाचार पर केंद्रित है। इसके बावजूद समाचार चैनलों की संख्या किसी और चीज के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

साल के शुरू में संसद में एक सवाल के जवाब में सूचना प्रसारण मंत्री ने बताया था कि समाचारों और सामयिक विषयों के 201 और गैर समाचारों व सामयिक विषयों के 180 चैनल हैं। इसके अलावा 97 निजी सैटेलाइट समाचार व सामयिक विषयों के चैनल और 85 गैर-समाचार के निजी सेटेलाइट व सामायिक विषयों के चैनल मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। फिर जो 67 निजी चैनल विदेश से अपलिंक हैं, उनमें 14 समाचार और 53 गैर-समाचार के हैं।

समाचार और सामयिक विषय और गैर-समाचार और सामयिक विषय के रूप में किया जाने वाला चैनलों का यह वर्गीकरण हमें काफी हास्यास्पद लगता है। परिभाषित करने की इस शैली में समाचार और सामायिक विषयों की परिभाषा में कहा है कि ‘‘ जिस चैनल की कार्यक्रम सामग्री में किसी प्रकार के समाचार या सामयिक विषय का तत्व हो, उसे इस दायरे में रखा जाएगा।’’

इसी परिभाषा के चलते समाचार चैनल मनोरंजन के दायरे में प्रवेश करते हैं। समाचार और सामयिक विषयों के चैनलों को मंत्रालय से विशेष मंजूरी की आवश्यकता रहती है। उन्हें प्रेस सूचना ब्यूरो से मान्यता प्राप्त होना भी जरूरी है और उनमें 26 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी पूंजी नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा इनमें महत्वपूर्ण निर्णायक पदों पर सिर्फ भारतीय ही होने चाहिए।

समाचार चैनलों के बारे में यह व्यवस्था इसलिए की गई है, क्योंकि समाचार से सरकार का भी सरोकार होता है और यह एक संवेदनशील मसला है। लेकिन चैनलों के मामले में उसने बिल्कुल अलग व्याख्या ग्रहण कर ली है। इस दौरान इस माध्यम की सीमाएं अस्पष्ट हो गई हैं और इस माध्यम से मनोरंजन की सीमाओं का घालमेल हो  रहा हैं।

समाचार चैनलों पर जो मनोरंजन परोसा जता है, उसे हम दो श्रेणियों में बांट सकते हैं। पहली श्रेणी समाचारों को रोचक तरीके से प्रस्तुत करने की है और दूसरी श्रेणी मनोरंजन की खबरों की है। समाचारों की प्रस्तुति ज्यादा नाटकीय, दोस्ताना और मनोरंजक बनती ज रही है। यह इस माध्यम की मजबूरी है। लेकिन इससे भी मजेदार बात यह है कि अब मनोरजन के समाचारों के बारे में रुचि बढ़ रही है और उस तरह की खबरें भी ज्यादा आ रही हैं।

समाचार चैनलों के पास अब मनोरंजन की दुनिया से जुड़ी खबरें ज्यादा होती हैं। प्रमुख राष्ट्रीय चैनलों के प्राइम टाइम के टेलीविजन समाचारों का ग्राफ बताता है कि मनोरंजन से जुड़ी खबरों का हिस्सा पिछले चार सालो में 6 प्रतिशत से बढ़ कर 16 प्रतिशत तक पहुंच गया है। हैदराबाद के  सीएमएस मीडिया लैब में किए गए नौ तेलुगू समाचार चैनलों का एक विश्लेषण बताता है कि समाचारों का  करीब 9 प्रतिशत समय मनोरंजन के समाचारों का समर्पित होता है।

समाचार चैनलों पर स्वास्थ्य और पाक कला के कार्यक्रम पहले से ही हैं जिन्हें मनोरंजन के दायरे में नहीं रखा जाता । लेकिन अब बात और आगे तक चली गई है। अब कई चैनल दूसरे चैनलों पर आने वाले मनोरंजन कार्यक्रमों पर विशेष कार्यक्रम बनाते हैं। जैसे कि रोजाना के धारावाहिकों का मुकाबला करने के लिए समाचार चैनल आज तक ने सास बहू और बेटियां और स्टार न्यूज ने सास बहू और साजिश जैसे कार्यक्रम चला रखे हैं। इसी प्रकार सिनेमा हमेशा से टेलीविजन को सामग्री प्रदान करता रहा है। कई समाचार चैनल भी इस सामग्री का लाभ उठा रहे हैं, जसे कि जी टीवी पर खबर फिल्मी है, सीएनएन-आईबीएन पर ई टूनाइट, साक्षी में बिग पिक्चर, ईटीवी 2 सिनेमा स्कोप , टीवी 5 में मूवी मंत्र, बालीवुड डाट काम और टीवी 9 वगैरह।

इनके अलावा मशहूर हस्तियों के जीवन और उनके संबंधों पर भी चैनलों के कार्यक्रम भी चल रहे हैं। यह कार्यक्रम वैसे ही होते हैं जैसे अखबारों के पेज-तीन की खबरें। इस श्रेणी में एनडीटीवी के नाइट आउट कार्यक्रम को रखा जा सकता है। तेलुगू के समाचार चैनलों पर आने वाले कुछ विशेष कार्यक्रम तो फिल्मों के साउंटट्रैक जरी होने वाले कार्यक्रमों को भी दिखाते हैं। पिछले साल बालीवुड के दीवानों को ध्यान में रख कर तैयार ई 24 नाम का एक मनोरंजन समाचार चैनल काफी तेजी से उभरा।

हम समाचार और सूचना की परिभाषा किस प्रकार करते हैं यह बहस का विषय है। लेकिन यह साफ है कि समाचार चैनलों के विकास ने समाचारों के बारे में हमारी दृष्टि बदल दी है। फिर भी एक बात साफ है कि समाचार और मनोरंजन के घालमेल से उस प्रोफेशन का ही नुकसान होगा जिसे हम कभी पत्रकारिता कहा करते थे।

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