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श्रमिक तड़प रहे थे, प्रशासन तंबू हटाने में था मशगूल

जब संवेदनाएं खत्म हो जती हैं तो कोई किस हद तक पहुंच जता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यहां देखने को मिला। बुद्धदेव पार्क में जहर खाने के बाद आंदोलनकारी दिहाड़ी श्रमिक जहां-तहां तड़प रहे थे, वहीं प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी आंदोलनकारियों के धरनास्थल को नेस्तनाबूद करने में जुटे थे। पूरा अमला उनका तंबू उखाड़ने में मशगूल था।

छह माह से दिहाड़ी श्रमिकों के आंदोलन को तोड़ने में नाकाम नगर प्रशासन ने आज जमकर अपनी भड़ास निकाली। पहले तो उन्होंने चार दिन के बाद भी Þामिकों की सामूहिक आत्महत्या की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। दूसरा जब वह जहर गटक रहे थे तो उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।


प्रशासनिक अधिकारी व पुलिस अमले ने सारी संवेदनाओं को ताक पर रखकर Þामिकों को अस्पताल में भर्ती कराने से ज्यादा ध्यान उनके तंबू को उखाड़कर नाले में फेंकने में दिया। नतीजतन, दो श्रमिकों को जब तक अस्पताल में भर्ती कराया गया उन्हें दिक्कत और ज्यादा बढ़ गई। एक तो, दो दिनों से आमरण अनशन के चलते उनके पेट खाली थे, दूसरा जहर ने उनके शरीर पर खासा असर डाला। डॉक्टरों का कहना है कि नुवान से किडनी पर सीधा असर पड़ता है जबकि सल्फास खाने से पेट में जहरीली गैस बन जती है, शरीर के नर्वस सिस्टम व महत्वपूर्ण अंगों को नष्ट कर देती है।

 

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