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बंद दरवाजे और खुलती खिड़कियां

बहुत से लोगों के लिए सॉफ्टवेयर का मतलब माइक्रोसॉफ्ट है और इंटरनेट का मतलब गूगल। इनमें फेसबुक पीढ़ी के वे लोग भी हैं, जिनका पूरी दुनिया से नाता की-बोर्ड और माउस के जरिये ही जुड़ता है। माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के बीच पूरी एक पीढ़ी का अंतर है। माइक्रोसॉफ्ट तब आई थी, जब कंप्यूटर आंकड़ों की माथापच्ची वाले यंत्र की भूमिका से निकल कर आम लोगों और जरूरतों के लिए इस्तेमाल होने वाली चीज बनने जा रहे थे। गूगल उस समय आई, जब सारी दुनिया के कंप्यूटरों ने इंटरनेट की मदद से आपस में जुड़ने का जरिया ढूंढ लिया था। माइक्रोसॉफ्ट ने अगर दुनिया को कंप्यूटर का सबसे लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम दिया तो गूगल इंटरनेट पर पूरी दुनिया के लिए तमाम जगहों और ठिकानों तक पहुंचने का जरिया बना। उसी गूगल ने पहली बार ताल ठोंककर माइक्रोसॉफ्ट को चुनौती दी है। गूगल अगले साल अपना ऑपरेटिंग सिस्टम लाएगा, जो बाजार में माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज़ को टक्कर देगा।

यहां बाजार शब्द थोड़ा उलझने वाला है। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट दोनों के बाजार अलग-अलग हैं, या दोनों की बाजार की सोच अलग है। माइक्रोसॉफ्ट के कारोबार का उसका तरीका पुराना है। आप थैला लेकर बाजार जाइए, दुकान से सॉफ्टवेयर का डिब्बामय लाइसेंस खरीदिए, घर आकर कंप्यूटर में लोड कर दीजिए। जैसे हम सायकिल का नया टायर वगैरह खरीदते हैं। इसी बाजार की कमाई से माइक्रोसॉफ्ट पूरी दुनिया पर छाई और सबसे अमीर कंपनी बन गई। पिछली बार जब इसने विंडोज़-विस्टा बाजार में लांच किया था तो इसे ऑनलाइन खरीदा और कंप्यूटर पर लोड भी किया जा सकता था। लेकिन इससे उसका व्यापारिक मॉडल कहीं नहीं बदला। सिवाय इसके कि खरीदारी बाजार में जाकर ऑनलाइन हो गई। माइक्रोसॉफ्ट जैसी बाजार पर एकछत्र राज करने वाली कंपनी के लिए अपने बिजनेस मॉडल को बदलना इतना आसान भी नहीं हो सकता था।

इस बिजनेस मॉडल ने माइक्रोसॉफ्ट को एक बंद दरवाजे वाली कंपनी बना दिया है। उसके अपने पेटेंट हैं, अपने कॉपीराइट। मुनाफे की इमारत इन्हीं पर खड़ी है, इसलिए पिछले दो दशक से उसकी सबसे बड़ी चिंता सॉफ्टवेयर पाइरेसी को लेकर है। कंपनी का एक बड़ा खर्च दुनिया भर में पाइरेसी विरोधी अभियान चलाने, विभिन्न देशों में उसके लिए लॉबी तैयार करने, उसके लिए जांच एजेंसियों और पुलिस बलों को पटाने-समझाने में हो जाता है। लेकिन कंप्यूटर का विस्तार पूरी दुनिया में इतनी तेजी से हुआ है और हो रहा है कि जिस बिजनेस मॉडल ने माइक्रोसॉफ्ट को सॉफ्टवेयर सम्राट बनाया था, वहीं उसके विस्तार की सीमा भी बनता जा रहा है। ज्यादा से ज्यादा विस्तार के लिए कंप्यूटर को लगातार सस्ता बनाया जा रहा है। दस हजार रुपये की कीमत का कंप्यूटर बाजार में उतरने को लगभग तैयार है। ऐसे कंप्यूटर में भला कोई ढा़ई हजार रुपये का विंडोज सिस्टम क्यों डालना चाहेगा? यानी विंडोज जहां तक जा सकती है, कंप्यूटर की दुनिया उससे भी आगे जाने को तैयार है। पिछले दिनों जब लैपटॉप से भी छोटे नोटबुक कंप्यूटरों का दौर चला तो अचानक पता लगा कि माइक्रोसॉफ्ट इस बदलाव के लिए तैयार ही नहीं था। विस्टा और एक्सपी जैसे उसके ऑपरेटिंग सिस्टम डेस्कटॉप और लैपटॉप के लिए तो ठीक हैं, लेकिन छोटे नोटबुक कंप्यूटरों में न तो वे ठीक से फिट होते हैं, बल्कि छोटे प्रोसेसर के कारण सुस्त पड़ जाते हैं। कंपनी ने अब अपने नए ऑपरेटिंग सिस्टम विंडोज-7 में इसका हल देने की कोशिश की है, लेकिन ज्यादा कीमत रखने की वजह से कंपनी की आलोचना भी काफी हो रही है।

गूगल का बिजनेस मॉडल बिल्कुल अलग है। अभी तक का उसकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया विज्ञापन है और आगे भी वही रहने वाला है। आपको बस इतना करना होगा कि गूगल के साइट पर जाएं और उसका ऑपरेटिंग सिस्टम अपने कंप्यूटर में लोड कर लीजिए। और तुरंत आपको अपनी जेब भी ढीली नहीं करनी होगी। पेटेंट वगैरह की सख्ती नहीं है, इसलिए आप उसके सॉफ्टवेयर की कॉपी बनाकर अपने दोस्तों, पड़ोसियों का भी बांट सकते हैं। ऐसा करने पर आप दंड संहिता की किसी धारा का उल्लंघन भी नहीं करेंगे। गूगल का तरीका फ्री टेलीविजन चैनल वाला है। वहां आप चैनल पर दिखाए गए विज्ञापनों के हिसाब से साबुन, टूथपेस्ट, शंपू वगैरह खरीदिए बाकी चैनल की कमाई का इंतजाम अपने आप हो जाएगा।

ऐसा नहीं है कि पेटेंट की सख्ती से मुक्त ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम पहली बार बाजार में उतारा जा रहा है। दरअसल, गूगल जिस क्रोम ऑपरेटिंग सिस्टम को अगले साल बाजार में लाएगा, वह लाइनक्स पर आधारित है। लाइनक्स कई साल से बाजार में है, लेकिन कभी बहुत ज्यादा सफल नहीं हुआ। अभी तक यह कुछ उन जुनूनी प्रोग्रामर के एक अभियान की तरह रही है, जो फ्री-सॉफ्टवेयर आंदोलन की मशाल उठाए हुए हैं। क्रोम के रूप में पहली बार लाइनक्स से एक बहुत बड़ा कॉपरेरेट प्रयास जुड़ रहा है। एक ऐसी कंपनी जो मानती है कि भविष्य ऑपरेटिंग सिस्टम का नहीं इंटरनेट का है और अभी तक भले ही लोग इंटरनेट पर ऑपरेटिंग सिस्टम के माध्यम से पहुंचते रहे हों, लेकिन इंटरनेट के माध्यम से ही ऑपरेटिंग सिस्टम हासिल करेंगे। खासकर उस समय, जब एक ऐसी पीढ़ी आ चुकी है, जो हरदम इंटरनेट से जुड़ी रहती है। कंप्यूटर या मोबाइल फोन के जरिये।

कंप्यूटर भी अब ज्यादातर समय ऑनलाइन रहते हैं, जबकि विंडोज को मूल रूप से ऑफलाइन कंप्यूटिंग के लिए बनाया गया है। विंडोज नई पीढ़ी की जरूरत को पूरा नहीं करती। अभी तक कंप्यूटर को ऑन करके दम साध कर इंतजार करना पड़ता है कि कब ऑपरेटिंग सिस्टम लोड हो और कब काम शुरू किया जाए। दिक्कत यह भी है कि कंप्यूटर कैसा भी हो धीरे-धीरे वह सुस्त होता जाता है। जबकि नई पीढ़ी को मोबाइल फोन जैसी व्यवस्था चाहिए, जो हर दम चलती रहे और किसी भी की पर हाथ लगाते ही काम करने लगे। गूगल ने यही वादा भी किया है।

जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कंप्यूटरों का इस्तेमाल कईं स्तरों पर हो रहा है। नई पीढ़ी की जरूरतों के लिए बना क्रोम इन सभी मोर्चे पर कामयाब हो सकेगा, यह कहना अभी शायद जल्दबाजी होगी। कई दशकों से कंप्यूटरों पर छाई माइक्रोसॉफ्ट के खिलाफ पहली बार किसी बड़े खिलाड़ी ने इस तरह ताल ठोंकी है, इसलिए यह न तो विजेता की घोषणा का समय है और न ही विंडोज़ को श्रद्धांजलि देने का। बस एक बात तय है- जिस कंप्यूटर ने हमारी जीवन शैली को बदला था, नई जीवन शैली उस कंप्यूटर के तौर-तरीकों को बदलने जा रही है।

लेखक हिंदुस्तान के एसोशिएट एडीटर हैं

herjinder.sahni@hindustantimes.com

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