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व्यवहार : ख्वाहिशों से बदली फितरत

अपनी गलतियों के लिए जानवर बहुत दुखी होते हैं। यहां तक कि उन्हें मिले अवसरों का उपयोग करने में भी उनसे कोई चूक हो जाए तब भी वे बहुत अफसोस में डूब जाते हैं। यह जंगल राज का अपूर्व ‘कोयोटे सिद्धांत’ है।

गलतियों, दुख देने की स्थितियों तथा शर्मिन्दगी के बीच जंगलराज में भी मनो-व्यवहार का अदभुत चेहरा सामने आता है।

मैं इस हफ्ते जब जॉन टिर्नी का एक निबंध पढ़ रहा था तो बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार होते मशहूर शाइनी आहूजा की सूरत सामने तैर रही थी। ठीक उसी वक्त फिर से हरियाणा के एक नव राजपरिवार की आशिकी की अजीब दास्तान का गुणगान चल रहा था। जॉन टिर्नी ने कुछ तथ्य इकट्ठे किए हैं। उनका सार यह है कि ‘अफसोस पशुओं में एक अनिवार्य गुण है। इन्सान अपने पालतू जानवरों को माफ कर देते हैं, लेकिन कोयोटे जैसे प्राणी पर यदि अपने जंगली समुदाय में धोखेबाज का दर्जा चस्पां हो जाए तो वह शर्म के मारे खुद को अलग कर लेता है और समूह छोड़कर चला जाता है।’

कोलोरेडो यूनिवर्सिटी में व्यवहार विज्ञानी मार्क बेकॉफ का पक्का मानना है कि अपनी गलतियों के लिए जानवर बहुत दुखी होते हैं। यहां तक कि उन्हें मिले अवसरों का उपयोग करने में भी उनसे कोई चूक हो जाए तब भी वे बहुत अफसोस में डूब जाते हैं। यह जंगल राज का अपूर्व ‘कोयोटे सिद्धांत’ है।

जहां मानवीय समुदाय में अपराध के तहत पकड़े गए अभिजन तेजस्वी पुरुषों की तरह अपने मस्तक उठाए फोटो खिंचवाते हैं, वहीं जंगलों में कोयोटे सिद्धांत का जोर एक उल्लेखनीय सूचना है।

एक विख्यात सोशलाइट पिछले दिनों लाखों रुपए की ज्वलरी लाते हुए पकड़ी गईं। उससे पहले एक सीईओ बैलेंस शीट में हेराफेरी को प्रेमपूर्वक स्वीकार कर चुके हैं। अर्थात ‘एक मामूली खतरा हो और उसे पार कर लेने पर बड़े नतीजे की संभावना’ हो तो छल करने का जोखिम लेना मानवीय जंगल में चातुर्य की कसौटी बन जाता है। मामूली खतरे के शीघ्र ही मुनाफे में बदल जाने की संभावना मूल्य-सूत्रों में गहरा परिवर्तन कर देती है।

बंदरों-चिंपाजियों पर, जो कि आदमी के काफी करीबी माने जाते हैं, एकदम ताजा प्रयोगों से पहला सबूत यह मिला है कि आदमियों की तरह उनमें भी-‘होना चाहिए,’ ‘हो सकता है,’ ‘होगा ही’-जैसे विचार पैदा होते हैं। जब वे किसी प्रयोग में अपेक्षित नतीजे नहीं दे पाते तो उनके अफसोस का स्तर पागलपन की हद तक दिख सकता है। कौन जानता है, अफसोस की यह भावना उन्हें भावनात्मक रूप से जितना गढ़ती और बदलती होगी, लेकिन ‘वाइल्ड जस्टिस’ की सह-लेखिका जेसिका पियर्स के साथ डॉ. मार्क मानते हैं कि अफसोस का यह आघात कोयोटे में तो सचमुच बहुत गहरा होता है।

‘इमोशन’ नामक जर्नल के एक ताजा डच वैज्ञानिक परीक्षण को आधार बनाएं तो कई चरित्रों पर आपको करुणा आने लगेगी। उस परीक्षण में 0 से 100 अंक बांटे गए थे। आधार था-उन लोगों का जो किसी न किसी छल में पकड़े गए हैं, लेकिन भावनाओं के प्रदर्शन में उन्होंने भिन्न-भिन्न तरह का परिणाम दर्शाया। कुछ उदासीन दिखे, कुछ उदासीन रहे पर शर्म का रंग छुपा नहीं पाए, कुछ को साफ शर्म आई यानी उनका सिर नीचा दिखा और नजरें भी इधर-उधर थीं और कुछ साफतौर पर शर्म में लाल पकड़े गए। इससे उनकी संवेदनशीलता तथा विश्वसनीयता का पता चलता है। यह भी कि वे वास्तव में मनुष्यगत मूल्यों का पालन करते हुए भी कितने कौशल का इस्तेमाल भावनाओं को आवरण देने में कर सकते हैं। जॉन टिर्नी के आलेख की अंतिम पंक्ति कहती है-‘एक कोयोटे जब अफसोस में ‘अपनी वाली’ पर आता है तो जवानी में ही मौत की उसकी आशंकाएं चार गुनी बढ़ जाती है।’ (यानी अफसोस में उसकी उम्र एक चौथाई रह जाती है)।

कोयोटे एक परदेसी जानवर हैं, लेकिन जानवरों की दुनिया में देस-परदेस से ज्यादा हमें इस बात की परख करनी चाहिए कि वे अपने लज्जा संबंधी आत्ममूल्यांकन में किस सीमा तक हमसे ऊपर जाते हैं। लोग बलात्कार कर सकते हैं, प्रणय का लोकप्रिय तमाशा कर सकते हैं, घपले और सार्वजनिक धन की बर्बादी कर सकते हैं, जरूरत पड़ने पर काला धन समर्पित करते हुए फिर से किसी नए विश्वविद्यालय के कुलपति बन सकते हैं, लेकिन क्या उनसे आप जंगली कोयोटे की तरह लज्जा मिश्रित संवेदनशीलता से दुखी दिखाई देने की उम्मीद कर सकते हैं? उनकी ख्वाहिशें हजारों होती है। इसके विपरीत जानवरों की ख्वाहिशें संभवत: सीमित होती हैं।

क्या जॉन टिर्नी और बेनेडिक्ट केरी को ये वज्ञानिक विश्लेषण लिखते वक्त पता होगा कि उसी वक्त ‘हजारों ख्वाहिशें’ पालने वाले नेता-अभिनेता लज्जा का ‘कोयोटे सिद्धांत’ इन्सानी दुनिया में कितना फालतू साबित कर चुके हैं।

लेखक ‘अहा! जिंदगी’ के संपादक हैं
yashwantvyas@gmail.com

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