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शिव जी की बारात

एक दिन ऑफिस आते हुए जीटी रोड पर कांवड़ शिविरों की तैयारी देखी। समझ गया कि सावन आस-पास है। खुद को ही अजीब सा लगा कि आजकल कांवड़ तैयारियों से ही सावन का एहसास होता है। कांवड़िए आते हैं, तो सड़क पर चलने वालों को सिहरन होने लगती है। आखिर इन 12-13 दिनों में उनका ही राज होता है।

कांवड़ियों को देख कर मुझे शिवजी की बारात याद आती है। शिवजी की बारात यानी औघड़ लोगों का हुजूम।
कांवड़िए भी गजब के औघड़ होते हैं। उनकी कांवड़ों के ही इतने ज्यादा रंग नहीं होते। वे खुद भी बेहद रंगीन होते हैं। इतनी अलग किस्म की कांवड़ और उतनी ही तरह के कांवड़िए। सचमुच शिवजी की बारात।

शिव भी कमाल के देव हैं। वह कितनी आसानी से इतने अलग-अलग औघड़ों को संभाल लेते हैं। बेहद अलग किस्म के लोगों को साधना ही तो लीडरशिप है। और जो जितना लोगों को साधना जानता है, वह उतना ही बड़ा लीडर होता है। शिव इसी मायने में महान लीडर हैं कि वह किस-किस को साध लेते हैं। अपनी बारात में शामिल कर लेते हैं। और शिव के बारे में क्या सोचते हैं लोग? लोगों के लिए तो वह भोलेबाबा हैं। क्या भोलेबाबा होना लीडर के लिए निगेटिव तो नहीं है? अक्सर लोग मानते हैं कि लीडर का भोलेबाबा होना अराजकता की ओर ले जाता है। लेकिन मुझे लगता है कि लीडर तो घर के मुखिया जैसा होता है। और भोलेबाबा के बड़प्पन के बिना घर नहीं चलता। अब कांवड़िए क्या करते हैं? वे अपने-अपने इलाके से निकलते हैं। गंगा का जल कांवड़ों में भरते हैं। फिर पैदल ही वापसी करते हैं। त्रयोदशी को वह जल अपने महादेव पर चढ़ा देते हैं। क्या यह ‘त्वदीयं वस्तु गोविंदम् तुभ्यमेव समर्पित:’ की तर्ज पर नहीं है? यानी हम यह जल जो ला रहे हैं। प्रभु आपकी ही कृपा से मिला है। गंगा आपके बिना धरती पर आ ही नहीं सकती थीं। उसी गंगा के जल को हम कृतज्ञतावश आप पर चढ़ा रहे हैं। एक मायने में यह गंगा और शिव दोनों को श्रद्धा अर्पित करने जैसा है। क्या यह परम पुरुष और परम प्रकृति को अर्पण नहीं है? शिव हैं परम पुरुष और गंगा हैं परम प्रकृति।

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