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सही पटरी पर

होना तो यह चाहिए कि जो योग्य हो उसे ही नौकरी पर रखा जाए, वह चाहे किसी प्रदेश, क्षेत्र, जति या धर्म का हो। केंद्रीय सेवाएं आमतौर पर इसी सिद्धांत पर चलती रही हैं, इसकी कई दिक्कतें भी हैं और इसे लेकर चलने वाले हिंसक विवाद तो खर अक्सर ही सुर्खियां बनते रहते हैं। अब रेलमंत्री ममता बनर्जी ने इस सोच पर बनी नीति को बदलने की ठानी है। उनका कहना है कि भविष्य में रेलवे की नौकरियों में स्थानीय लोगों को 50 फीसदी आरक्षण मिलेगा, बाकी आधे स्थान बाहरी लोगों को मिलेंगे। थोड़ी देर के लिए स्थानीय लोगों को नौकरी देने के नाम पर की जा रही राजनीति को छोड़ दें तो बिना स्थानीयता का ध्यान रखे लोगों को नौकरी पर रखने की दिक्कतें दिखने लगती हैं। एक तो बाहरी लोग अक्सर स्थानीय जरूरतों से वाकिफ नहीं होते हैं और दूसरे कई बार वे नौकरी हासिल करते ही अपने इलाके में ट्रांसफर के जुगाड़ में लग जाते हैं। ऐसी कुछ छोटी -मोटी समस्याएं और भी होंगी जो ममता बनर्जी के इस फॉर्मुले से हल हो सकती हैं। लेकिन असल मसला क्षेत्रीय नेताओं की स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नाम पर चलाई जाने वाली राजनीति का है जो इस नए फॉर्मुले से किस हद तक हल हो पाएगा यह अभी नहीं कहा जा सकता।

पिछले दिनों राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने रेलवे परीक्षा देने आए दूसरे राज्यों के बेरोजगारों के साथ जब मारपीट की थी। ऐसी घटना चंद रोज पहले कर्नाटक जैसे आधुनिक माने जाने वाले राज्य में भी हुई। आरोप लगाया गया कि रेलवे में बिहार के लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है, क्योंकि रेलमंत्री उसी प्रदेश के हैं। बिहार के बेरोजगारों पर सबसे अधिक नजला झड़ा जाता है, उनकी दिक्कत यह है कि खुद उनके राज्य में उद्योग धंधें न पनप पाने के कारण उन्हें जहां भी मौका मिलता है, वे कोशिश करने पहुंच जाते हैं। देश का संविधान सभी को यह अधिकार भी देता है। स्थानीय लोगों को 50 फीसदी रोजगार देने से यह समस्या पूरी तरह हल हो जाएगी, यह उम्मीद ज्यादा नहीं है। स्थानीय आरक्षण के बाद भी राज ठाकरे जैसे लोगों के पास इस मसले पर राजनीति करने की 50 फीसदी संभावना बची रह जाएगी। अंध-क्षेत्रवाद की राजनीति का जवाब रोजगार नीति के किसी फॉर्मुले से नहीं दिया जा सकता, उसका जवाब तो राजनीति से ही पैदा करना होगा। एक और दीर्घकालिक उपाय विकास का इतना विस्तार है, जिससे बेरोजगारी इस हद तक खत्म हो जाए कि किसी के पास पक्षपात की शिकायत या इस पर राजनीति करने का मौका ही न रहे।

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