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साठ के सुनील

कई साल पहले सुनील गावसकर जब बतौर कप्तान एक सीरीज जीत कर वापस आए तो हवाई अड्डे पर मौजूद पत्रकारों में से एक ने किसी मैच में उनके किसी फैसले का कारण पूछा। गावस्कर ने जवाब दिया- मैं शायद और विवादास्पद बनना चाहता था। गावसकर जब से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हैं वे हमेशा विवादों से घिरे रहे लेकिन वे विश्व क्रिकेट के सबसे सम्माननीय लोगों में से भी रहे। वे पहले खिलाड़ियों के पारिश्रमिक और सुविधाओं के लिए लड़े और आज अगर भारतीय क्रिकेटर इतनी सुविधा और पैसा पाते हैं तो उसका बड़ा श्रेय गावसकर को जाता है। वे भारत-पाकिस्तान के बीच कट्टर और तीखी प्रतिद्वंद्विता में भारत के प्रतिनिधि थे लेकिन जब अंग्रेज खिलाड़ियों का पाकिस्तानियों से विवाद हुआ तो अंग्रेजों के नस्ली दुराग्रहों पर तीखा आक्रमण उन्होंने किया। एशियाई खिलाड़ियों के प्रति श्वेत दुनिया के भेदभाव को उन्होंने लगातार रेखांकित किया और एशियाई क्रिकेट के आज के वर्चस्व में उनकी बड़ी भूमिका है। गावसकर यह सब इसलिए कर पाए क्योंकि उनमें अपने सिद्धांतों पर गहरा विश्वास, साहस और डटे रहने की क्षमता है। इसी साहस और क्षमता की वजह से उन्होंने भारतीय क्रिकेट का स्वरूप भी बदल डाला।

गावसकर के पहले भारतीय क्रिकेट टीम ऐसे खिलाड़ियों की टीम थी जो आकर्षक और चमकदार थे लेकिन जिन्हें हराना आसान था। गावसकर अपनी टीम को विश्व विजेता तो नहीं बना सके लेकिन उन्होंने उसे ऐसी टीम बना दिया जिसे हराना बड़ी से बड़ी टीम के लिए मुश्किल हो गया। जूझने का जो जज्बा उन्होंने पैदा किया उसने भारतीय किक्रेट की शक्ल बदल दी और आज भारतीय खिलाड़ी नंबर एक टीम बनने की सोच सकते हैं। इस मायने में गावसकर का अवदान सिर्फ एक खिलाड़ी की तरह रनों और हार जीत में नहीं तौला जा सकता, उन्होंने खेल के प्रति हमारा नजरिया बदला। वे ऐसे व्यक्ति हैं जो सांप्रदायिक दंगे में किसी को बचाने के लिए अकेले दंगाइयों का सामना कर सकते हैं और किसी अल्पज्ञात खिलाड़ी के सहायता मैच में खेलने के लिए लंबी रेल यात्रा करने के लिए तैयार रहते हैं। वे उन दुर्लभ खिलाड़ियों में से हैं जिनका स्तंभ कोई ‘घोस्ट’ लेखक नहीं लिखता, वे खुद लिखते हैं। एक खिलाड़ी के बड़प्पन की कसौटी के रूप में हमारे सामने सुनील गावसकर हैं।

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