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जी-8 को जी-14 में बदलने की कवायद

जी-8 को जी-14 में बदलने की कवायद

वैश्विक व्यवस्था में विस्तार होने के एक संकेत के तहत इटली में चल रहे शिखर सम्मेलन में विकसित देशों के समूह जी-8 और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले पांच देश जी-5 को जी-14 में बदलने के सुझाव सामने आए हैं, वहीं विश्व के नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था तथा वित्त संस्थानों में सुधार का पक्ष लिया है।

शिखर सम्मेलन के मेजबान देश इटली के राष्ट्रपति सिलवियो बर्लूस्कोनी ने दोनों समूहों की बैठक में प्रारंभिक भाषण में जी-14 बनाने का सुझाव दिया और कहा कि जी-8 और जी-5 करीब 80 फीसदी विश्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और हम इसे भविष्य के लिए एक स्थिर संरचना मान सकते हैं।

यह विचार तब सामने आया जब ब्राजील के राष्ट्रपति लुला डिसिल्वा ने भी जी-14 के बारे में बात की और समूचे वैश्विक शासन की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया। पहली बार फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति मित्तरलैंड के न्योते पर एवियन में आए उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले जी-8 देशों के सहयोगी राष्ट्र ‘आउटरिच कंट्रीज’ भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और मैक्सिको अब नियमित तौर पर शिखर बैठकें करते हैं। इन्हीं के साथ औद्योगिक रूप से विकसित देश जी-8 भी शामिल रहते हैं।

मीडिया को ब्योरा देते हुए विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने कहा कि शिखर सम्मेलन में नेताओं ने वैश्विक आर्थिक दुरूस्तगी और जलवायु परिवर्तन तथा भूमंडलीय तापमान में वृद्धि की चुनौती से निपटने के लिये संसाधनों को वित्तीय मदद देने के मुद्दे पर चर्चा की।

मौजूदा आर्थिक संकट के विशेषकर गरीब देशों पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा केंद्रित रही। यह मुद्दा भी केंद्र में रहा कि इससे निपटने और खासकर गत अप्रैल में लंदन में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में किये गये फैसलों के कार्यान्वयन के लिये किस तरह से समन्वित नजरिया अपनाया जाये। इस कार्यान्वयन पर इस वर्ष के अंत में पीटसबर्ग में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन में चर्चा रखने के बारे में भी बात हुई।

संकट के मुद्दे पर जी-8 में संरक्षणवादी उपायों का सहारा लेने के मोह से बचने तथा जी़-8 तथा जी-5 के बीच साझा समझौते की जरूरत पर चर्चा हुई। यह भी महसूस किया गया कि लंदन शिखर सम्मेलन में तय किए गए व्यवहार्य उपायों के कार्यान्वयन पर ठहराव विकसित देशों के कारण है और यह स्थिति बदलना चाहिए।

मेनन ने कहा कि चर्चा का अंतिम नतीजा यह रहा कि देशों को अब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना तथा व्यापक वैश्विक व्यवस्था के दोबारा गठन और राजनीतिक मुद्दों के निपटारे की दिशा में काम करने की जरूरत है।

शिखर सम्मेलन में मौजूदा वैश्विक स्थिति तथा वास्तविकताओं से निपटने के तरीकों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संरचना में विश्व बैंक तथा मुद्रा कोष में मतदान के अधिकार के बारे में 2012 तक लिये जाने वाले फैसलों की पृष्ठभूमि में सुधार लाने की जरूरत के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।

यह पर्याप्त रूप से महसूस किया गया कि वैश्विक व्यवस्था इस तरह नहीं चल सकती। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने भी समान तरह के विचार जाहिर किये।

शिखर सम्मेलन में वार्ता के लिये भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मौजूदा मंदी से निपटने के लिये विश्व स्तर पर शुरुआत करने के तरीकों पर बात की।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि वैश्विक आर्थिक संकट से पहले के दिनों में नहीं लौटा जा सकता। अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था को दोबारा जिंदा करना है तो उनके देश में उपभोग के रुझानों को भी दोबारा सक्रिय करना होगा।

उन्होंने कहा कि उनका आकलन यह है कि अमेरिका की मंदी से उबरने की प्रक्रिया गत अप्रैल की तुलना में अब बेहतर है। ओबामा ने परमाणु सुरक्षा पर शिखर सम्मेलन का भी उल्लेख किया जिसका वह आयोजन करने की योजना बना रहे हैं।

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