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ईको फ्रैंडली टूरिज्म: क्यों ना बनें एक जिम्मेदार सैलानी

ईको फ्रैंडली टूरिज्म: क्यों ना बनें एक जिम्मेदार सैलानी

ईको फ्रैंडली टूरिज्म आज नई अवधारणा नहीं है, बल्कि वर्तमान परिस्थितियों ने इसे पर्यटन का एक अनिवार्य अंग बना दिया है। सामान्य शब्दों में कहें तो ईको फ्रैंडली टूरिज्म का अर्थ है, किसी भी स्थल की यात्रा और सैर-सपाटे के दौरान अपने क्रियाकलापों से उस स्थान विशेष के पर्यावरण और पारिस्थितिकी को किसी भी प्रकार की क्षति न पहुंचाना।  सच्चाई तो यह है कि यह बात हम सबकी सिविक सेंस से भी जुड़ी है।
 
पर्यटन के बढ़ते शौक के कारण पर्यटन स्थलों पर भीड़ बढ़ने लगी और उसके साथ व्यवसायीकरण भी। लंबे समय तक मौज-मस्ती के शौकीन पर्यटकों के गैर जिम्मेदारीपूर्ण रवैये के बने रहने और व्यवसायीकरण के बढ़ते अनपेक्षित दबाव ने ऐसे स्थलों के पर्यावरण पर विपरीत असर डाला ही, साथ ही वहां की सुंदरता को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया। पर्यावरणविद् और शोधकर्ताओं ने इसके खतरनाक परिणामों को जब सबके सामने रखना प्रारंभ किया, तब ‘ईको-फ्रैंडली टूरिज्म’ की धारणा ने जन्म लिया। ‘हमारा पर्यावरण सुरक्षित है तो हमारी पृथ्वी सुरक्षित है’। इस शाश्वत सत्य को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र ने सदस्य राष्ट्रों का ध्यान ईको टूरिज्म की ओर आकर्षित किया।
   
इन सभी प्रयासों के बावजूद सच्चाई यह है कि सरकारी व गैर सरकारी संगठनों द्वारा किए जा रहे इन प्रयासों से तभी सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं, जब सैलानी भी इस धारणा को समझते हुए अपनी जिम्मेदारी को समझे और तथा अपने व्यवहार और गतिविधियों को पर्यावरण के अनुकूल बनाएं, जिसके लिए सुधार की शुरुआत हमें खुद से करनी होगी।
 
पर्वतीय सैरगाहें सैलानियों को सबसे अधिक आकर्षित करती हैं। बर्फीले पहाड़, झर-झर बहते झरने, उन्मुक्त नदियां, हरे भरे घने वन और शहरी कोलाहल से दूर प्रकृति का सान्निध्य हर सैलानी को भाता है, इसलिए सबसे अधिक खतरा पहाड़ी स्थलों को ही है। ऐसी स्थिति में प्रकृति प्रेमी पर्यटकों का कर्तव्य बनता है कि वे ईको टूरिज्म की भावना को अपनाएं। शीतल जलवायु में स्वास्थ्य लाभ उठाने के अलावा पर्वतारोहण, ट्रैकिंग, राफ्टिंग, माउंटेन साइकिलिंग करने वाले साहसी पर्यटक भी प्रकृति के पास पहुंचते हैं। ये लोग कैंप लगा कर रहते हैं तथा प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग करते हैं। इन्हें पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत रहना चाहिए। ऐसे पर्यटकों को यहां-वहां कूड़ा फेंकने की प्रवृत्ति को बदलना होगा। प्लास्टिक बोतलें, पॉलिथिन, टिन के डिब्बे या कांच का सामान पर्यावरण के सबसे बड़े शत्रु हैं। ऐसे में कूड़े-कचरे का निपटान उन स्थानों पर करना चाहिए, जहां पर इसकी व्यवस्था की गई हो, अन्यथा इसे अपने साथ ही लेकर जाएं। पर्वतीय स्थानों पर जल स्रोतों को दूषित होने से बचाना चाहिए। इसी प्रकार पहाड़ी वृक्ष एवं वनस्पति, पहाड़ों के अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार हैं। ये मृदाक्षरण एवं भूस्खलन रोकने में सहायक होते हैं। इनकी सुरक्षा करना हमारी जिम्मेदार बनती है। कैंप साइट पर आग जलाने के लिए टूटी पड़ी टहनियों का प्रयोग करना बेहतर रहता है। जलती हुई आग को जाते समय बुझा देना चाहिए, जरा-सी चिंगारी भी कभी-कभी भयंकर आग का कारण बन जाती है। यात्रा के दौरान ‘शेयर टैक्सी’ का प्रयोग अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण कम करने में सहायक होता है और पर्यटकों की बचत भी होती है।
 
पहाड़ी स्थानों की तरह सैलानियों को राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों, नदियों, समुद्र तटों पर भी पर्यावरण के संरक्षण का बेहद ध्यान रखना होता है। सोचने में यह सब बातें सामान्य हैं, लेकिन इन्हें अपनी यायावरी सोच और पर्यटन की आदतों में शामिल करके सैलानी पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों में सहायक बनते हैं। इसी प्रकार ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा पर भी सैलानी एक पर्यावरण-मित्र के रूप में ही जाएं तो बेहतर होगा। इतिहास की ये धरोहरें राष्ट्र के अतीत की पहचान हैं। बहुत सी धरोहरों को तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व विरासत का दर्जा दिया है, ताकि वहां आने वाला हर पर्यटक उसके महत्त्व को समझ सके। ऐसे स्मारकों की दीवारों, मूर्तियों आदि पर नाम उकेरना, अपने देश की छवि को नुकसान पहुंचाने से अधिक और क्या हो सकता हैं।

पर्यटक अपने माहौल से निकल कर अन्य स्थान पर पहुंचते हैं, जहां उन्हे अलग परिवेश, अलग जनजीवन और अलग संस्कृति के दर्शन होते हैं, इसलिए यह हमारा कर्तव्य  है कि हम वहां की जीवनशैली और परंपराओं का सम्मान करें। वहां की लोककलाओं का लोकगीतों और लोकनृत्यों का सम्मान करना चाहिए। ऐसे स्थानों की यात्रा के दौरान पर्यटकों को स्वयं भी सभ्य और शालीन व्यवहार व पहनावे  का ध्यान रखना चाहिए, ताकि स्थानीय लोगों पर गलत प्रभाव न पड़े। पर्यावरण पर्यटन की भावना से सैरसपाटे पर चलने वाले जागरूक सैलानियों को ऐसे टूर ऑपरेटर और होटल आदि का बहिष्कार करना चाहिए, जिनके द्वारा पर्यावरण को कोई क्षति पहुंचाई जाती है। हालांकि पर्यटन उद्योग से जुड़े संस्थान भी अब इस ओर काफी ध्यान देने लगे हैं। ये लोग सैलानियों को भी इस विषय में सचेत करते रहते हैं।

ईको फ्रैंडली टूरिज्म ने प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा पर्यटन विकास में रचनात्मक योगदानकर्ता के रूप में विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। हमारा देश दुनिया के सर्वाधिक जैव विविधता वाले सात देशों में से एक है। अपनी समृद्घ एवं प्राचीन विरासत के कारण यह बहुत से देशों के पर्यटकों को आकर्षित करता है, इसलिए हमारे यहां ईको फ्रैंडली टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं। देश के पर्यावरण मंत्रालय, पर्यटन मंत्रालय, होटल एसोसिएशन, टूर ऑपरेटर आदि ईको फ्रैंडली  टूरिज्म को आधार बना कर पैकेज घोषित करते हैं। ऐसे पैकेज टूर के दौरान पर्यावरण संरक्षण का तो ध्यान रखा ही जाता है, साथ ही पर्यटकों को ईको फ्रैंडली बनने के लिए प्रेरित किया जाता है। गौरतलब है कि विदेशी पर्यटकों की तुलना में स्थानीय पर्यटकों के लिए यह एक बड़ा दायित्व है। यह हमारी धरती है। इसका पर्यावरण एक सांझी विरासत है, जिसे हमें आने वाली पीढ़ी के लिए संजो कर रखना है। प्रकृति, सभ्यता और संस्कृति ने जो हमें दिया है, वो हमें अपनी आने वाली पीढि़यों को उसी रूप में सौंपना है।               

बनें पर्यावरण मित्र

पर्यटन स्थलों पर किसी प्रकार का प्रदूषण न फैलायें।
 
पॉलीथिन बैग, वॉटर बॉटल जैसा कचरा पहाड़ों पर न छोड़ें। उन्हें कूड़ेदानों में ही डालें।

पर्यटन स्थल की संस्कृति और स्थानीय परंपराओं का आदर करें।

वहां के पेड़-पौधों को नुकसान न पहुंचाएं। 

जल स्रोतों को दूषित न करें।

स्मारकों की दीवारों पर थूकें नहीं, उन पर कुछ लिखें नहीं।

अभ्यारण्यों और बर्ड सेंक्चुरी में ध्वनि प्रदूषण न फैलाएं।
 
धार्मिक स्थलों पर वहां के नियमों का पालन करें।

 


 

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