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अटके मानसून से जुड़े सवाल

मानसून को भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार माना जाता रहा है, क्योंकि हमारे यहां खेतीबाड़ी आज भी मुख्यत: बारिश पर ही निर्भर करती है। लेकिन मानसून का ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका पहले से सही-सही अंदाजा लगाना यहां मौसम विभाग समेत किसी के बस की बात नहीं है। इस साल मानसून का आगाज तो अच्छा रहा, लेकिन पिछले एक हफ्ते से इसके रंग-ढंग अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। जाहिर है, मानसून के यूं ठिठक जाने से पूरे देश, खासकर उत्तर भारत में सूखे की आशंका पैदा हो गई है। इससे न केवल किसानों, बल्कि मंदी की मार से घायल रिटेल और इंडस्ट्रियल सेक्टर में भी गहरी चिंता का माहौल है। अगर वाकई देश सूखे या अकाल की चपेट में आ गया, तो आम आदमी को केंद्र में रखकर बड़ी मेहनत से बनाया गया केंद्र सरकार का बजट गड़बड़ा जाएगा, और सरकार को इससे निपटने के लिए बड़े पैमाने पर अलग से धन का इंतजाम करना पड़ेगा। मानसून से जुड़े इस जुए का विश्लेषण कर रहे हैं मदन जैड़ा

मानसून की बेरुखी को लेकर ग्रामीण भारत में एक कहावत है, ‘दिन का बादर राति तरैया, ना जानौ प्रभु काह करैया।’ इस बार भी यही हालत है। कहने को तो मानसून जुलाई के पहले सप्ताह में पूरे देश में दस्तक दे चुका है, लेकिन अब तक उत्तरी राज्यों में उसका नामोनिशां नहीं है। दिन में आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देखकर किसानों को उम्मींद बंधती है कि शायद रात को पानी बरसे, लेकिन जब सुबह उठते हैं तो आसमान साफ नजर आता है। बादल गायब होते हैं। मानसून की इस बेरुखी से उत्तर, मध्य तथा पूर्वी भारत के कई हिस्सों में हाहाकार मचने लगा है। खरीफ की बुवाई प्रभावित हो चुकी है। अभी तक की बुवाई के आंकड़ों के अनुसार खरीफ उत्पाद में 25 फीसदी की कमी का अनुमान है। अगले एक सप्ताह के भीतर यदि मानसून फिर सक्रिय नहीं हुआ तो स्थिति गंभीर हो सकती है। इसके साथ ही बांधों में पानी घटने से बिजली उत्पादन प्रभावित होने लगा है। जो इलाके सिंचिंत हैं, उन्हें भी पानी नहीं मिल पा रहा है। पेयजल संकट ने भी गंभीर रूप धारण कर लिया है।

इस बार क्यों बिगड़ी मानसून की चाल

मानसून ने इस बार भी देश में समय पर एंट्री की थी। केरल में एक जून की निर्धारित तिथि की तुलना में 24 मई को ही मानसून ने दस्तक दे दी। लेकिन 25 मई को आए आइला तूफान ने मानसून को ब्रेक लगा दिए। इसके मानसून पर दो दुष्प्रभाव पड़े। एक, समुद्र का तापमान गिरने से पीछे से मानसूनी हवाएं सक्रिय नहीं रह पाई। दूसरे, तूफान ने इन हवाओं की नमी को सोख लिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि 25 मई से 25 जून तक बंगाल की खाड़ी वाली मानसून की शाखा निष्क्रिय पड़ी रही। जबकि अरब सागर वाली मानसून शाखा पर तूफान का असर कम हुआ और वह थोड़ी लेटलतीफी के साथ सक्रिय होती रही।

अंतत: जून के अंत में अरब सागर वाली शाखा से सक्रिय होते हुए मानसून गुजरात से लेकर उड़ीसा तक पहुंचा तब जाकर बंगाल की खाड़ी शाखा थोड़ी सक्रिय हो पाई। लेकिन यहां बता दें कि अरब सागर की तरफ से जो शाखा सक्रिय होती है वह गुजरात-राजस्थान में तेजी से सक्रिय हुई, लेकिन 3-4 जुलाई होते-होते जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा से पाकिस्तान की तरफ आगे बढ़ गई। इस तरफ हिमालय नहीं है, इसलिए अरब सागर की तरफ से चलने वाली मानसूनी हवाएं ज्यादा समय टिक नहीं पाती। अब स्थिति यह है कि अभी भी मुंबई और दक्षिण भारत के जिन इलाकों में बारिश हो रही है वह अरब सागर वाली शाखा की सक्रियता के चलते हो रही हैं। बंगाल की खाड़ी वाली शाखा अभी भी लगभग निष्क्रिय है। कभी-कभी दूसरी शाखा से उसे थोड़ा करंट मिलता है तो कहीं-कहीं बारिश हो जाती है।

उपरोक्त उदाहरण से साफ है कि उत्तर भारत में मानसून का दारोमदार बंगाल की खाड़ी की तरफ से बनने वाले सिस्टम पर निर्भर है जो इस बार कमजोर पड़ा हुआ है। इसलिए उत्तरी राज्यों को ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

मानसून और कृषि

देश में खेती-बाड़ी का 60 फीसदी दारोमदार मानसूनी बारिश पर टिका है। सिंचाई की सुविधा सिर्फ 40 फीसदी क्षेत्र को उपलब्ध है। लेकिन इसके लिए भी बारिश चाहिए क्योंकि बारिश नहीं होने से नदियों का पानी घट जाता है जिसका असर बांधों पर पड़ता है। फलत बिजली उत्पादन कम होता है। बिजली ना होने से नलकूप नहीं चल पाते। नदियों का पानी घटने से नहरें सूखने लगती हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सिर्फ 20 फीसदी कृषि को ही सही मायने में सिंचाई का लाभ मिल पाता है।

मानसून के वैसे तो चार महीने जून से सितंबर तक के हैं। लेकिन खेती के लिहाज से जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश की जरूरत होती है। इस दौरान उत्तर और मध्य भारत में धान, गन्ने, तिलहन और दलहनों की बुवाई होती है। धान और गन्ने को जुलाई में भरपूर बारिश चाहिए जबकि तिलहन, दलहन की बुवाई के लिए खेतों में पर्याप्त नमी होनी जरूरी है। लेकिन इस बार उ.प्र., पंजाब, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान में न तो दलहन, तिलहन की बुवाई के लिए नमी मिल पाई और न ही धान और गन्ना ही लगाया जा सका है।

अलनीनो प्रभावों की आशंका का सच!

देश के उत्तरी हिस्सों में पहले से कमजोर पड़ चुके मानसून पर अब मौसम विज्ञानियों द्वारा अलनीनो प्रभावों की आशंका भी जताई जा रही है। आस्ट्रेलिया के वदर ब्यूरो ने संभावना व्यक्त की है कि प्रशांत महासागर में विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द समुद्र के तापमान में असामान्य बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही है और इससे अगले कुछ दिनों में अलनीनो उत्पन्न हो सकता है। पर भारत के मौसम विभाग ने इस पर असहमति जाहिर की है। मौसम विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक डा. एल. एस. राठौर ने कहा कि अलनीनो फैक्टर तभी होता है जब समुद्री सतह के तापमान में बढ़ोत्तरी कम से कम .2 डिग्री या ज्यादा हो। लेकिन अभी वहां सिर्फ 0.2 डिग्री की बढ़ोत्तरी है। इसलिए फिलहाल अलनीनो नहीं बना है। उधर, मौसम विभाग,  पुणे के एक वैज्ञानिक ने भी इस दावे को खारिज किया है क्योंकि अलनीनो प्रभावों को भारत द्वारा भी मॉनीटर किया जाता है।

बादल तो हो, बरसा लेंगे हम

सूखे के डर से सहमे किसानों को अगले कुछ सालों में मानसून की चिंता नहीं रहेगी। मौसम विभाग का हवाई जहाज बादलों पर रसायन छिड़केगा और झमाझम पानी बरसने लगेगा। अर्थ साइंस मिनिस्ट्री ने क्लाउंड सीडिंग की इस बेहद महत्वाकांक्षी योजना पर कार्य शुरू कर दिया है।

इस महकमे के सचिव डा. शैलेस नायक के अनुसार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रोपिकल मीटरोलॉजी (आईआईटीएम) पुणे के वैज्ञानिकों द्वारा क्लाउड सीडिंग को लेकर स्टडी शुरू कर दी गई है जो एक साल के भीतर पूरी हो जाएगी। मंत्रालय की वरिष्ठ अधिकारी स्वाति बासु के मुताबिक फिलहाल स्टडी में यह पता लगाया जा रहा है कि मानसून के दौरान किस-किस हिस्से में बादल छाए रहते हैं लेकिन बारिश नहीं होती। ऐसी लोकेशनों को चिह्नित करने के बाद वहां पर क्लाउंड सीडिंग लोकेशन को चिह्नित किया जाएगा। वहां यदि आसमान में बादल और हवा में नमी है तो वायुयान से बादलों के ऊपर सिल्वर आयोडाइड का छिड़काव किया जाता है जिससे बादल बरसने लगते हैं।

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