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अपने-अपने रेलमंत्री

फिलहाल उम्मीद नहीं है लेकिन अगर लालू प्रसाद यादव अंतरिक्ष अनुसंधान विभाग के मंत्री होते तो क्या होता? तब भारत का चंद्रयान कार्यक्रम ऐसे चलता कि चंद्रयान श्रीहरिकोटा से छोड़ा जाता जो पहले जमीन के समानांतर चलता हुआ पटना तक जाता और फिर आकाश की ओर मुड़कर चांद की तरफ जाता। लालू यादव या उनकी पत्नी राबड़ी देवी के राज में बिहार में सड़क भले ही न बनी हो लेकिन अंतरिक्ष यान जरूर पटना जाता। अगर रामविलास पासवान उनकी जगह होते तो अंतरिक्ष यान हाजीपुर तक जाता, अगर ममता बनर्जी होतीं तो अंतरिक्ष यान चांद पर वाया कोलकाता जाता। टीआर बालू की रुचि जहाजों को चलवाने में थी ही नहीं, उनकी रुचि के विषय दूसरे ही थे, लेकिन अगर लालू जी जहाजरानी मंत्री होते तो एक बंदरगाह पटना में होता, पासवान होते तो हाजीपुर में, ममता बनर्जी जरूर कोलकाता में माकपा के दफ्तर के सामने बंदरगाह बनवातीं। हो सकता है कि कोलकातावासी इसका भरपूर स्वागत करते। माकपा ने तो कोलकाता में कुछ बनवाया नहीं, बल्कि सारे बंगाल में ही उन्होंने अपने पार्टी के दफ्तरों के अलावा कुछ भी बनवाने में कोई रुचि नहीं दिखाई। सिंगूर, नंदीग्राम आदि में उन्होंने कोशिश जरूर की लेकिन उन्होंने पाया कि उनकी विशेषज्ञता कुछ भी बनवाने में नहीं, लोगों को पीटने में है, सो उन्होने वही किया। अगर कोई माकपा का नेता रेलवे मंत्री हो गए तो क्या हो? शायद बंगाल में अराजकता फैल जाती, क्योंकि कहीं-कहीं माकपा वाले नए रेलवे स्टेशनों के लिए जमीन कब्ज करने के लिए दूसरे लोगों को पीटते और जहां दूसरे लोगों का बस चलता, वे माकपा वालों को पीटते। लालगढ़ में यह साबित हुआ कि माकपा वाले सिर्फ पीटने में नहीं, पिटने में भी माहिर हैं। और अगर माकपा के कोई कामरेड अंतरिक्ष अनुसंधान मंत्रालय के मंत्री होते तो एक भी चंद्रयान न उड़ता, क्योंकि पार्टी लाइन यह होती कि चंद्रयान कार्यक्रम अमेरिकी साम्राज्यवादी षड्यंत्र का हिस्सा है और सिर्फ रूस और चीन का चंद्र अभियान प्रगतिशील है। हालत यह है कि अगर बिहार का रेलमंत्री हो तो दिल्ली से मथुरा जाने वाली ट्रेन वाया पटना हो कर जाए और अगर बंगाल से रेलमंत्री हो तो चंड़ीगढ़ से कालका वाया कोलकाता होकर जाए। अंग्रेजी राज में रेलवे के कर्ताधर्ताओं का कोई चुनाव क्षेत्र ही नहीं था, वरना भारत की हर रेल लाइन इंग्लैंड से होकर गुजरती। लेकिन पिछले दो रेलवे मंत्रियों लालू और पासवान की राजनैतिक स्थिति तो ऐसा नहीं दिखाती। काश कि ये सोच सकते कि सचमुच जनता के लिए ईमानदारी से काम करना भी राजनीति में फायदेमंद हो सकता है।

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