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स्वीकार के मायने

राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने वैसे कोई ऐसी नई बात नहीं कही है, जो दुनिया को मालूम न हो। पाकिस्तान ने सामरिक हित साधने के लिए जिन आतंकवादियों को पैदा किया था, वही आज पाकिस्तान की गर्दन दबोच रहे हैं- इसे हर कोई जानता है। पाकिस्तान में भी और उसके बाहर भी। लेकिन फिर भी इस खुलासे की उम्मीद नहीं थी। हम यह इसे ऐसा सच मानकर चल रहे थे जिसे पाकिस्तान कभी खुलकर स्वीकार नहीं करेगा। पाकिस्तान तो क्या दुनिया का कोई और देश भी ऐसी गलतियों को खुलकर स्वीकार नहीं करता। ऐसे कई देश हैं, जो अपनी सदियों पुरानी गुस्ताखियों को स्वीकार करने से कतराते हैं, जबकि आसिफ अली जरदारी ने जो स्वीकार किया है, वह तो उसके मुकाबले कल ही की बात है। इसलिए उनका यह कहना सभी को चौंकाता है कि आज जो आतंकवादी पाकिस्तान में खलनायक बने हुए हैं, उन्हें कल तक नायक बनाया जा रहा था। अमेरिकी दबाव या अपनी मजबूरियों के चलते इस समय पाकिस्तान का पूरा सत्ता तंत्र तालिबान के खिलाफ मोर्चे पर खड़ा है। लेकिन यह लड़ाई सिर्फ तालिबान से ही नहीं, देश के प्रभुवर्ग, सेना और आईएसआई के बीच ऐसे तत्वों से भी है, जो कहीं न कहीं तालिबान के समर्थक हैं। ये वही लोग हैं, जो भारत के लिए आतंकवादी तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। इसे देखते हुए आने वाले दिनों में यह सवाल महत्वपूर्ण बना रहेगा कि जरदारी ने इस मौके पर यह स्वीकार करने वाला बयान क्यों दिया? क्या यह ऐसा बयान है, जो अमेरिका ने उन पर दबाव डाल कर दिलवाया है? अगर हां तो क्यों? यह साफ नहीं है कि ऐसे बयान से इस समय किसी को क्या हासिल होने वाला है। पाकिस्तान के जेहाद समर्थक लोग वे हैं, जो वहां जम्हूरी सरकार नहीं फौजी हुकूमत चाहते हैं। क्या जरदारी इस वर्ग के खिलाफ बोलकर उस दुष्चक्र को तोड़ना चाहते हैं, जो बार-बार फौज को सत्ता में ले आता है? जरदारी के बयान को कम से कम उनकी नादानी तो नहीं माना जा सकता, इसलिए यह जानना जरूरी है कि इस बयान की राजनीति क्या है? और सबसे बड़ी बात गलती स्वीकारना दुबारा उसे न करने का आश्वासन भी होता है, लेकिन क्या यह नियम जरदारी के इस बयान पर भी लागू होता है? इसलिए अभी यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि जरदारी का स्वीकार मसले कोसुलझएगा या और उलझा देगा।

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