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समलैंगिकता मामले में सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

समलैंगिकता मामले में सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को वैध घोषित करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को केंद्र को नोटिस जारी कर दिया। शीर्ष अदालत अब इस मामले में 20 जुलाई को सुनवाई करेगी।

प्रधान न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि संबंधित पक्षों को सुनने के बाद यदि जरूरत पड़ी तो उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ किसी अंतरिम आदेश पर विचार किया जाएगा।

शीर्ष अदालत ने गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन और अन्य को भी नोटिस जारी किए जो दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष पक्ष थे। उच्चतम न्यायालय ज्योतिषी सुरेश कुमार कौशल की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिन्होंने दो जुलाई के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी है।

ज्योतिषी की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि जब से दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला आया है, तब से लेकर अब तक समलैंगिक विवाहों के सात मामले सामने आ चुके हैं। वकील ने इसे लेकर बहुत से सवाल उठाए और कहा कि इस चलन का विवाह संस्था पर असर पड़ेगा। पीठ ने हालांकि कहा कि हमने विवाह की परिभाषा नहीं बदली है।

संक्षिप्त सुनवाई के दौरान जब वकील ने सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने वाले फैसले के प्रतिकूल प्रभावों को गिनाना शुरू किया तो पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस प्रकरण दर्ज नहीं क रती।

न्यायालय ने कहा कि हालांकि कानून 1860 से लागू है, लेकिन बच्चों के साथ यौन संबंधों को छोड़कर दंड प्रावधान के तहत ऐसे सिर्फ कुछ ही मामले दर्ज हुए हैं। पीठ ने कहा कि हमारी जानकारी के अनुसार समलैंगिक शादियों के लिए किसी पर भी अभियोग नहीं चलाया गया है । पीठ में न्यायमूर्ति पी़ सदाशिवम भी शामिल हैं।

कौशल द्वारा दायर याचिका में दो जुलाई के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करने का आग्रह किया गया है, जिसमें वयस्कों के बीच एकांत में सहमति से बने समलैंगक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था। इससे पहले समलैंगिक संबंध दंडनीय अपराध की श्रेणी में थे, जिसके तहत उम्रकैद तक की सजा हो सकती थी। याचिका में कहा गया है कि समलैंगिक गतिविधियां हर तरह से अप्राकतिक हैं, जिन्हें अनुमति नहीं दी जा सकती।

ज्योतिषी ने अपनी याचिका में कहा है कि इस तरह की अप्राकृतिक गतिविधियों के परिणाम की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता । यहां तक कि जानवर भी ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं होते। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले का परिणाम एड्स विषाणु एचआईवी के प्रसार के रूप में निकलेगा, क्योंकि पूरी तरह साबित हो चुका है कि यह संक्रमण इस तरह की यौन गतिविधियों से होता है।

कौशल ने तर्क दिया कि हमें अपने धर्मग्रंथों को देखने और उनसे सीख लेने की जरूरत है, जो समाज में इस तरह की गतिविधियों के खिलाफ हैं। यदि इस तरह की असामान्यता को अनुमति दी जाती है तो कल को लोग जानवरों के साथ सेक्स करने की इजाजत मांग सकते हैं।

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