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शॉपिंग तनाव कम या ज्यादा

अकसर युवाओं की ये मान्यता होती है कि शॉपिंग, तनाव को दूर करने का कारगर टूल होता है। ऐसे में तनाव को दूर करने के लिए युवाओं में शॉपिग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हालांकि कई मामलों में शॉपिंग तनाव करने का काम करने करती है, लेकिन अगर ये लत या सनक बन जाए, तो तनाव को कम करने के बजए बढ़ा सकती है।
क्यों होता हैं शॉपिंग स्ट्रेस बस्टर ? 

सामाजिक सरोकार
आखिर शॉपिंग करने से तनाव कम कैसे होता है, पूछने पर मनोवैज्ञानिक अरुण कुमार कहते हैं कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारे पास खुद के लिए समय ही नहीं होता। धीरे-धीरे हमारा सामाजिक दायरा खत्म होता जाता है। शॉपिंग अप्रत्यक्ष रूप से किसी व्यक्ति को समाज से जोड़ती है, ऐसे में लोगों को ऐसा लगने लगता है कि शॉपिंग स्ट्रेस बस्टर है।

माहौल में बदलाव
अकसर लोगों के साथ ऐसा होता है कि रोजमर्रा की जीवनशैली बहुत उकताऊ सी हो जाती है। ऑफिस, रूटीन काम और फिर वापस घर। इसलिए शॉपिंग लोगों के माहौल में बदलाव लाती है। वह बाहरी दुनिया से जुड़ते हैं। साथ ही उनका ध्यान भी कुछ देर के लिए रोजना की उबाऊ जिंदगी से हट जाता है।

बढ़ता है आत्मविश्वास 
अधिकांश लोगों के साथ ये समस्या होती है कि वे बदलते जमाने से कदमताल नहीं कर पाते। उन्हें बाहर के बारे में जो भी जानकारी मिलती है, वह भी अखबार, मैगजीन या इंटरनेट के द्वारा। ऐसे में वह हीन-भावना से ग्रसित हो जाता है, क्योंकि चीजों के बारे में जानकारी न होने के कारण लोगों के बीच में बैठने से कतराने लगता है। लिहाज शॉपिग, उसका आत्मविश्वास बढ़ाने में भी कारगर साबित होती है। 

भावनात्मक रूप से जोड़ना
शॉपिंग के दौरान प्राय: मनपसंद चीज की खरीदारी तनावमुक्त करती है। वह किसी को बीती बातों व कड़वी स्मृतियों से मुक्त करती है। अपनों को करीब लाने लिए की गई खरीदारी आपको उनके और करीब लाती है। उपहार खरीदकर देना संबंधित व्यक्तियों से आपको भावनात्मक रूप से जोड़ता है और आपके संबंधों की मजबूती को बढ़ाता है।

खुशी में शुमार
महिलाएं प्राय: समूह में खरीदारी करने जाती हैं। वे खूब मोलभाव करती हैं, वेरायटी देखती हैं और चीजों को चुनने में अधिक समय लगाती हैं। इस बीच वे आपसी सुख-दुख और घर-परिवार के हालात पर भी चर्चा करती रहती हैं। एक दूसरे से बातें करने से तनाव कम होता है।

आज के दौर में न्यूक्लियर फैमिली का चलन बढ़ा है। जिसकी वजह से अकसर लोग अकेलापन महसूस करते हैं। शापिंग उनके लिए लोगों से मिलने और उनके सुख-दुख में शामिल होने का माध्यम भी बन जाती है।

शॉपेहॉलिक
मनोवैज्ञानिकों का ये मानना है कि जिन लोगों की कोई हॉबी नहीं होती, अकसर उनके लिए शॉपिंग तनाव दूर करने का प्रमुख माध्यम बन जाती है। मनोवैज्ञानिक यह भी सलाह देते हैं कि अपनी हॉबी जरूर बनाएं, भले ही वह बागवानी हों, किताबों या म्यूजिक का कलेक्शन करना या फिर कोई वाद्ययंत्र बजना ही क्यों न हो। साथ ही यह भी जरूरी है कि आप अपनी शॉपिंग साइकिल को बीच-बीच में ब्रेक देते रहें और इसे तनाव दूर करने के लिए हमेशा इस्तेमाल न करें। 

कहीं ज्यादा शॉपिंग मर्ज न बन जाए 
अनावश्यक शॉपिंग करना भी एक बीमारी है। यह एक ऐसी बीमारी है, जो किसी को भी हो सकती है। इस बीमारी को इंपल्स कंट्रोल डिसॉर्डर कहते हैं। यह क्लिप्टोमेनिया या पाइरोमेनिया जैसी बीमारियों की तरह ही होती है। इस रोग में लोग अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते हैं। वे अपने साथ के किसी व्यक्ति को कष्ट में तो डालते ही हैं, आपसी रिश्तों तक को बर्बाद कर डालते हैं।

दिखावे के लिए
कई बार देखा गया है कि लोग दिखावे में ज्यादा खरीदारी कर जाते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि आमतौर पर कई लोग शॉपिग के इस फोबिया के शिकार हो जाते हैं। वह दूसरे की खरीदारी को देखकर अवसाद या डिप्रेशन की स्थिति में आ जाते हैं। वह अमुक व्यक्ति से खरीदारी के मामले में तुलना करने लगते हैं। ऐसे में सोचे-समङो बिना खरीदारी करने लगते हैं।

जब जेब हो जाए हल्की
वर्तमान में आम आदमी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल पर्सनल मनी फ्रेंड के तौर पर करता है। ऐसे में आम आदमी बिना इस बात की चिंता किए कि जेब में पैसा हैं या नहीं, वह खरीदारी करता रहता है। अकसर इसकी वजह से लोग अपनी आíथक स्थिति से ज्यादा खरीदारी कर जते हैं। बाद में उम्मीद से ज्यादा बिल आने पर लोगों के लिए डिप्रेशन का कारण बन जाता है।

फिर पछताए होत क्या जब..
अकसर लोग कुछ देर की संतुष्टि के लिए शॉपिंग करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें एहसास होता है कि उन्होंने उम्मीद से ज्यादा खरीदारी कर ली है और वह इसे लेकर आत्मग्लानि का शिकार हो जाते हैं। मनोवज्ञानिक अरुण कुमार कहते हैं, कि कुछ लोगों के लिए खरीदारी एक लत या सनक होती है, उन्हें इस बात का इल्म तक नहीं होता कि वह अपनी आíथक स्थिति से ज्यादा खरीदारी कर गए हैं। वह कहते हैं कि जरूरी है कि आप मेडिटेशन, व्यायाम करें और साथ ही अनावश्यक खरीदारी की आदत पर स्वयं ही रोक लगाने का प्रयास करें।

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