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बनते बिगड़ते देश में औरतों की आजादी

अफगान अस्मिता को बनाए रखने का संघर्ष हर रोज वहां की गलियों और गांवों में चल रहा है। लेकिन यह किसी ने नहीं सोचा था कि ‘आधुनिकता और परंपरा के बीच भारत और अफगानिस्तान की औरतें’ जैसे हानिरहित विषय पर काबुल में हुई सेमिनार अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति पर एक बड़ी बहस को शुरू कर देगी। सेमिनार का आयोजन इंडिया-अफगानिस्तान फाउंडेशन ने किया था।

कई दशक के गृहयुद्ध और उथल-पुथल के बाद अफगानिस्तान अब फिर से खड़े होने की कोशिश में जुटा है। एक नया संविधान बनाने की कोशिश चल रही है, नया मीडिया कानून भी बनना है जो संसद और सरकार की खींचतान में फंस गया है। अगले महीने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं, जिसमें एक दो नहीं पूरे 44 उम्मीदवार मैदान में हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्थिरिता और निजी स्वतंत्रता की बहस ने नया तेवर अख्तियार कर लिया है। वहां हालात कैसे हैं, इसे देखना हो तो शहर के बीचो बीच शहर-ए-नउ के किनारे खड़े हो जाएं। अंधेरा होते ही यह सड़क बहुत तेजी से सुनसान हो जाती है। पूरे काबुल में कई जगमगाते सुपर मार्केट खुल गए हैं, जो राजधानी में बढ़ते कारोबार का प्रतीक हैं। यहां 48 इंच के फ्लैट टेलीविजन सेट सजे हुए हैं, कीमत दस हजर रुपये। होटल साफी लैंडमार्क में एक पश्चिमी ढंग का कैफे खुला है। जिसमें हमेशा ही अफगान नौजवान भरे रहते हैं, लेकिन ज्यादातर लड़के ही। शाम आठ बजे कर्फ्यू लग जाता है पर तब तक इसकी सारी पेस्ट्री बिक चुकी होती हैं। इसके बाहर की सड़कें भी काफी तेजी से खाली हो जाती हैं। कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था। पर अब तालिबान के बम धमाकों को लेकर दहशत है। बुलेटप्रूफ गाड़ियां बढ़ रही हैं लेकिन हर रोज अपहरण और फिरौती की दो तीन घटनाएं हो रही हैं। पांच साल पहले हामिद करजई के राष्ट्रपति बनने से जो उम्मीदें बनी थीं, अब वे अनिश्चितता में बदल चुकी हैं। इसका सबसे बुरा असर अफगान औरतों पर पड़ा है।

अफगानिस्तान में जो सेमिनार हुई, उसका एक बड़ा हिस्सा औरतों के पहनावे को लेकर था। मसला यह था कि क्या औरत का बुर्का पहनना उसके परंपरा के गुलाम होने का प्रतीक है। जाहिर है कि अफगानियों का इस पर एक सुर में जवाब था- नहीं। कुछ का कहना था कि आधुनिकता और परंपरा की यह बहस भी एक तरह की भेड़चाल ही है, यह बहुत कुछ झूठे देवताओं के बीच किसी एक को चुनने जैसा ही है।

इसके बाद नंबर आया हज और धार्मिक मामलों की मंत्री मुहम्मद सादिक चकरी का। और वे जो बोले उसका तो कहना क्या ही। उन्होंने इस्लाम पूर्व के समाज यानी बुद्धकाल वगैरह पर बोलना शुरू किया। उनका कहना था कि उस दौर में औरतों और लड़कियों को जिंदा जला दिया जाता था, उन्हें उनके अधिकार नहीं दिए जाते थे। उन्होंने तर्क दिया कि ‘बौद्ध धर्म में औरतों को पुरुष को फंसाने की चाल भर माना जाता है।’ शायद उनका इशारा उन अप्सराओं की तरफ था, जिनके बारे में मान्यता है कि वे देवताओं और संत, साधुओं की तपस्या को भंग करने के लिए आती थीं। इसके बाद जब वे अफगानी समाज पर बोलने लगे तो पूरी रौ में आ गए, ‘कोई जपानी लड़की तीन दिन में एक किताब तैयार कर देती है तो कोई जपानी लड़की इस काम को पांच दिन में कर लेती है, लेकिन यहां अफगानिस्तान में हम अपना 90 फीसदी समय टेलीविजन पर भारतीय सीरियल देख कर बर्बाद कर देते हैं। और फिर भी हम कहते हैं कि हम आधुनिक होना चाहते हैं।’

कॉफी ब्रेक के दौरान मैंने उनके उनकी टिप्पणी के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि वे बॉलीवुड के विरोधी नहीं हैं। चकरी ने कहा, ‘अफगानिस्तान एक बीमार समाज है। जब मैं बीमार होता हूं और मेरे पास समय कम होता है तो पहले मैं दवा लेता हूं और उसके बाद ही फिल्म देखने का काम करता हूं।’ दिलचस्प बात यह थी कि इस्लाम पूर्व समाज की बात सेमिनार में बार- बार आती रही, यहां तक कि महिला वक्ताओं के भाषण में भी। बाल अधिकारों पर राष्ट्रपति की सलाहकार अमीना अफजली का कहना था, ‘हमें अपने मजहबी और पारिवारिक उसूलों को बचाना होगा।’ लेकिन उन्होंने हाल ही में बने शिया परिवार कानून का कोई जिक्र नहीं किया। यह कानून शिया मर्द को यह अधिकार देता है कि वह अपनी बीवी से चार दिन में एक बार शारीरिक संबंध बना सकता है। कई औरतें इसे ववाहिक जीवन का बलात्कार कहती हैं। इस कानून को हाल में ही करजई प्रशासन ने पास किया है। अफजली का कहना था, ‘समस्या हमारे साथ है, इस्लाम के साथ नहीं। अगर इस्लाम को सही ढंग से लागू किया जाए तो औरतों के साथ कोई समस्या नहीं रह जाएगी।’

चकरी के भाषण के बाद मंच पर काबुल की सांसद शुक्रिया बरकाजी आईं। (250 सीटों वाली अफगान संसद में औरतों के लिए 25 फीसदी आरक्षण है) उन्होंने अपनी एक मुस्कान से ही चकरी की सारी दलीलों को ध्वस्त कर दिया। उनका कहना था कि कोई कैसा दिखता है, इससे उसकी आधुनिकता नहीं तय होती। उनकी दलील थी कि जिन लोगों को इस बात की चिंता है कि इस्लाम पूर्व के समाज में औरत को जिंदा दफन कर दिया जाता था, उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि आज के अफगानिस्तान में यह कहीं न हो। उन्होंने कहा, ‘आज के अफगानिस्तान में औरतों को जिंदा दफन नहीं किया जाता, लेकिन हर रोज उन्हें मारा जाता है और कई तरह से उनकी बेइज्जती की जाती है। अफगानिस्तान के कई इलाकों में हम आज भी अतीत में जी रहे हैं। इसे बदलना होगा।’

अकादमिक दुनिया से जुड़े असलम अफजली अकेले ऐसे पुरुष थे जो औरतों के हक में बोले। उनका कहना था, ‘मजहब के नाम पर हम हर रोज औरतों से बुरा सुलूक करते हैं। इस्लाम पूर्व के समाज में अगर उन्हें जिंदा दफन किया जाता था तो आज भी हम उन्हें जिंदा ही दफन कर रहे हैं। हम उन्हें बुर्के के नीचे दफन कर रहे हैं।’ अफजल ने जो सवाल उठाया वह सिर्फ अफगानिस्तान के लिए ही नहीं, कई देशों और दुनिया के बहुत से हिस्सों के लिए महत्वपूर्ण है। बल्कि हमें खुद से भी पूछना चाहिए कि आजादी के साठ साल बाद भी क्या हमारा दिमाग पूरी तरह आजाद हो पाया है।

jomalhotra@ gmail. com
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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