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शिक्षा : वैकल्पिक दसवीं बोर्ड से आगे

दसवीं बोर्ड परीक्षाओं को वैकल्पिक बनाने के सुझाव के विरोध में इधर कई राजनीतिक और गैर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आई हैं। लेकिन जो लोग शिक्षण गतिविधि का अनुभव रखते हैं, उनमें से ज्यादातर इस सुझाव का स्वागत ही करेंगे। इसमें शक नहीं कि देश के शिक्षण तंत्र पर और बच्चों पर परीक्षाओं का बोझ कम करने के नजरिए से यह सुझाव काफी कारगर साबित हो सकता है। लेकिन इस सुझाव के फायदों का पूरी तरह दोहन करने के लिए परीक्षाओं के अखिल भारतीय संचालन की मौजूदा प्रणाली में कुछ और संशोधनों की जरूरत होगी। अभी स्थिति यह है कि दसवीं की परीक्षाओं के लिए राज्य बोर्डो के साथ केंद्रीय बोर्ड भी है और दोनों अपनी परीक्षाएं आयोजित करते हैं। उसके बाद बारहवीं की परीक्षाओं के लिए भी राज्य बोर्डो के साथ-साथ केंद्रीय बोर्ड भी है। यह गैरजरूरी दोहराव है। होना यह चाहिए कि दसवीं के स्तर पर भले ही दो स्तरों के बोर्ड (राज्य स्तर और केंद्रीय स्तर) हों। लेकिन बारहवीं के स्तर पर सिर्फ और सिर्फ एक केंद्रीय बोर्ड ही होना चाहिए। आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं।

दसवीं के स्तर पर राज्य बोर्डों की जरूरत कई वजहों से है। देश भर के स्कूलों के स्तर और बुनियादी सुविधाओं में फर्क है। पहली बार स्कूल जाने वाले बच्चों का अनुपात विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। कहीं यह अनुपात बहुत ज्यादा है, तो कहीं बेहद कम। वहीं कई स्कूलों की स्थिति तो ऐसी है कि वहां ब्लैकबोर्ड तक नहीं हैं। शिक्षकों की काबलियत और शिक्षण का स्तर भी एकसमान नहीं है।

ऐसे में सभी के लिए इकलौता यूनीवर्सल बोर्ड बनाना टेढ़ी खीर साबित होगा। राज्य परीक्षा बोर्ड इन क्षेत्रीय विषमताओं का अच्छा ध्यान रख सकते हैं। राज्य बोर्ड क्षेत्रीय विषमताओं के साथ विभिन्न प्रांतों में बोली जाने वाली बोलियों को भी ध्यान में रखेंगे और उसी के आधार पर छात्रों का शक्षिक और मानसिक विकास होगा। अगर छात्र हाईस्कूल के बाद अपना बोर्ड बदलना चाहता है, तो वह आराम से अपना बोर्ड बदल सकेगा, यदि जहां वह पढ़ रहा है, वहां सेंट्रल बोर्ड उपलब्ध हो तो।

अगर हाईस्कूल तक बोर्ड परीक्षाओं को वैकल्पिक बना दिया जएगा, तो फिर दसवीं बोर्ड की परीक्षा में वही छात्र बैठेंगे जिनकी बहुत उच्च शिक्षा में रुचि नहीं होगी और जिनकी प्राथमिकता परीक्षा के बाद अपनी क्षमता के मुताबिक वोकेशनल ओर पोलिटेकनिक कोर्सो में जाने की होगी। यह एक आदर्श स्थिति होगी, क्योंकि करियर की शुरूआत में वह अपने भविष्य, करियर, रोजगार के क्षेत्रों के प्रति असमंजस की स्थिति में नहीं पड़ेंगे। वह वोकेशनल कोर्स, पोलिटेकनिक या तकनीकी संस्थान जैसे कि ईसीसीई (अर्ली केयर एंड चाइल्डहुड एजूकेशन) में ट्रेनिंग प्रोग्राम, कारपेंटरी, फैशन टेक्नोलॉजी, नíसंग आदि का कोर्स कर अपना भविष्य संवार सकेंगे। इससे देश में विभिन्न सेक्टरों में प्रशिक्षित और योग्य लोगों की कमी नहीं रहेगी, जो कि देश की अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक साबित होगा। एक फायदा यह होगा कि वे बच्चे जबरदस्ती बारहवीं परीक्षा देने और कम नंबर आने से पैदा होने वाली हीन भावना वगैरह से बच जाएंगे। परीक्षा के बाद की निराशा से होने वाली आत्महत्याओं की घटनाओं में भी इससे कमी आएगी।

लेकिन बहुत से छात्र-छात्राएं ऐसे होंगे, जिनकी रुचि उच्च शिक्षा की तरफ होगी और जो सीधे बारहवीं की ही परीक्षा देना चाहेंगे। ऐसे वर्ग के लिए मौका होगा कि वे दसवीं की परीक्षाओं के तामझम पर वक्त और ऊर्जा बर्बाद न करें। चूंकि ऐसे छात्र परीक्षा में नहीं बैठेंगे इसलिए दसवीं बोर्ड परीक्षा का प्रशासनिक खर्च और कार्यभार काफी कम हो जाएगा। इस बिंदु पर मानव संसाधन मंत्री का सुझाव उनके बड़े काम आएगा।

लेकिन यहीं एक दूसरी समस्या पैदा होती है, जिसकी ओर अभी बहुत ध्यान नहीं दिया गया है। देश में बारहवीं के जो अलग-अलग परीक्षा बोर्ड (राज्य स्तरीय या केंद्रीय) बने हुए हैं, उनकी परीक्षाओं का स्तर एक नहीं है। इसीलिए कॉलेज में दाखिले के वक्त दिक्कत होती है।

सही हो या गलत हो, लेकिन एक बोर्ड के परीक्षा परिणाम और छात्रों के स्तर को लेकर दूसरे बोर्ड से जुड़े लोगों में असंतोष होता है। स्थानीय छात्रों को अमूमन यह शिकायत दूसरे राज्यों से आए छात्रों से रहती है।

लिहाज, जब दसवीं बोर्ड परीक्षाओं को वैकल्पिक बनाने पर विचार हो रहा है तो बारहवीं बोर्ड की परीक्षाओं के लिए सिर्फ और सिर्फ एक अखिल भारतीय केंद्रीय परीक्षा बोर्ड बनाने पर भी विचार होना चाहिए। इससे समूचे देश में बारहवीं की परीक्षाओं के लिए एक ही पाठ्यक्रम और प्रतिभा स्तर सुनिश्चित किया जा सकेगा।

लेखक दिल्ली के रुकमणी देवी शिक्षण संस्थान समूह के अध्यक्ष हैं।

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