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इज्जत की इमेज

मुझे अब जा के पता चला कि कुछ फिल्मी अभिनेत्रियों की एक कोई ऐसी निजी इमेज भी होती है, जिसके खराब होने का खतरा बना रहता है। अपनी इमेज की सुरक्षा के लिए अक्सर वे कुछ चुनिंदा सीन किसी ऐसी डुप्लीकेट से करवाती हैं, जो महिला होते हुए भी ऐसे सीन देने से परहेज नहीं करती। हो सकता है वो ऐसी जरूरतमंद महिला हो, जिसे अपनी इमेज से कोई लेना-देना न हो। अभाव और मजबूरियां उनकी कोई इमेज बनने ही नहीं देतीं।

कुछ वर्ष पहले ‘बैन्डिट क्वीन’ नामक एक फिल्म में भी ऐसी ही किसी विवश महिला ने फूलन देवी के किरदार के डुप्लीकेट के रूप में कुछ ऐसे सीन दिए थे, जो फिल्म की असली हीरोइन की इमेज बिगाड़ते लगते थे। सुना है इसकी एवज में असली हीरोइन ने डुप्लीकेट महिला की आर्थिक मदद भी की थी। ये भी तो संभव है कि गरीबों के पास सिर्फ इज्जत हो, जिसे वो गाहे बगाहे बेच सकें और अमीर हीरोइनों के पास सिर्फ इमेज हो, जिसे वे पैसे देकर बचाए रहें। अमीर हीरोइन की इमेज करोड़ों में होती है, किन्तु गरीब की आबरू लगभग दो कौड़ी की समझो। कुछ ऐसी जीरो साइज वाली मगर टू पीस बिकनी पहने फिल्म हीरोइनों को हमने कमबख्त इश्क करते देखा है कि कहानी की मांग के अनुसार कभी-कभी कुछ न पहने होने से भी उनके इमेज को बट्टा नहीं लगता। पार्टियों और उत्सव-समारोहों में वे अपनी डुप्लीकेटों के भरोसे नहीं रहतीं। देह का खुल्ला खेल फरुखाबादी मुहावरे की तर्ज पर वे एंकरिंग करती हैं या ऑस्कर-फॉस्कर जैसा अवार्ड लेकर जैसे ही अंगड़ाई लेती हैं, मीडिया के कैमरे ललचाई जीभ की तरह चमकने लगते हैं। ऐसे सीन में डुप्लीकेट अवांछित ही नहीं, अंग्रेजी में अनवान्टेड होते रहे हैं। साहित्य में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श जैसे। कुछ समय पहले एक अमीर और विराट इमेज वाली हीरोइन ने अपने उत्तेजक शरीर पर केवल चित्रकारी कराई थी। कपड़ों की जगह वहां भांति-भांति के रंगों की उत्तेजना थी। वो देह हुसैन साहब का चित्र फलक जैसी थी, जिसमें बुद्धिजीवियों को रंगों की स्वतंत्रता और रेखाओं की प्रगाढ़ प्रतीकात्मकता लगती थी और सांप्रदायिक दर्शकों को देवी-देवताओं व सरस्वती आदि की अश्लीलता दिखाई देती थी। लोग लड़े मगर हीरोइन की इमेज में इजाफा हो गया।

यदि आप मेरी उमर के हों तो आपको याद होगा कि कुछ समय पहले एक मॉडल-हीरोइन ने अपने शरीर पर सिर्फ एक सांप पहन कर तहलका मचाया था। सांप चूंकि नकली था, अतः जगह से सरका नहीं। इमेज बाल-बाल बच गई। भाषा के भाष्य में जाएं तो इंसान अपनी इज्जत खुद बनाता है, मगर उसकी इमेज लोगबाग बनाते हैं। इमेज को हिंदी में छवि कहते हैं, इसीलिए इसमें सच नहीं सच का वहम होता है।

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