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बावरी साहिबा

वह प्रेम दीवानी थीं। उनका नाम तो कुछ और रहा होगा, किन्तु उनकी साधना और भक्ति में जो दीवानापन था, जो प्रेम का उदात्त रूप था- उस कारण उन्हें लोगों ने ‘बावरी’ कहा होगा। और चूंकि उनकी भक्ति, उनका तप, उनकी साधना उच्चकोटि की थी, इसलिए लोगों ने उन्हें ‘साहिबा’ कहकर आदर दिया। बावरी साहिबा की भक्ति प्रेम-मार्गी थी। वह निर्गुण ब्रह्मा की उपासक थीं और सूफियों के ‘आत्मा’-‘परमात्मा’ की साधना-पद्धति को भी मानती थीं। परमात्मा प्रेमी है और आत्मा प्रेमिका। बस प्रेम के इसी दीवानेपन में बावरी साहिबा खो गई थीं। वह प्रेम को ही सर्वस्व मानती थीं। प्रेम को ही जीवन की उदात्त अवस्था मानती थीं। उस परमतत्व से अपना रिश्ता जोड़कर वह कहती थीं- ‘मैं बंदी हौं परमतत्व की, जग जनत की भोरी।’

बावरी साहिबा का पूरा जीवन-वृत्तान्त नहीं मिलता। इतना अवश्य कहा जाता है कि उनका काल बादशाह अकबर से पूर्व का ही कोई समय था। यह भी कहा जाता है कि वे दिल्ली के किसी उच्च कुलीन घराने की थीं। किन्तु परमात्मा के प्रति इनकी प्रीत ने इन्हें भक्ति का दीवाना बना दिया। वह संसार के सारे सुख-ऐश्वर्य, घर-द्वार, लोकलाज त्याग कर ‘प्रेम दीवानी’ होकर घूमने लगीं। परमात्मा को ‘प्रीतम’ मानकर उसके प्रेम में पागल होकर वह निकल पड़ी थीं। वह न किसी विशेष पहनावे में विश्वास करती थीं, न ही कोई तिलक लगातीं, न ही पूज पाठ करती थीं। वह निर्गुण उपासना करती थीं। परमात्मा से मिलने की प्रार्थना करतीं उसी का ध्यान करती थीं।

बावरी रावरी का कहिये, मन ह्वै कै पंतग भरै नित भांवरी।
भांवरी जनहिं संत सुजन जिन्हें हरिरूप हिये दरसाव री।
सांवरी सूरत, मोहनी मूरत, दैकर ज्ञान अनन्त लखाव री।
खावरी सौंह, तिहारी प्रभू गति रखरी देखि भई मति बावरी।

बावरी साहिबा का अद्भुत परमात्मा-प्रेम और अलौकिक साधना ने जो साधना पद्धति चलाई उसे बीरू साहब, यारी साहब, बुल्ला साहब, गुलाल साहब, जगजीवन साहब, भीखा साहब, पल्टू साहब जैसे संतों ने आगे बढ़ाई।

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