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मुठभेड़ पर मुकदमा

उत्तराखंड सरकार ने गाजियाबाद के युवक रणवीर सिंह के मारे जने पर अपने ही 14 पुलिस वालों पर जिस तरह से हत्या और आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है, उससे यह संदेह तो यकीन में बदल चला है कि मुठभेड़ फर्जी थी। राज्य सरकार की तत्परता सराहनीय है पर पुलिस के व्यवहार ने जो सवाल छोड़े हैं वे हमारे लोकतंत्र और नागरिक समाज के भीतर आत्मग्लानि पैदा करने वाले हैं। पहला अहम सवाल यह है कि पुलिस ऐसी मुठभेड़ क्यों करती है, जिस पर मुकदमा दर्ज करने की नौबत आए? क्या उसे मानवाधिकारों का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जता? देहरादून में पुलिस अगर पहले ही कानून के मुताबिक कार्रवाई करने का धैर्य दिखाती तो क्या यह नौबत आती? हालांकि पुलिस यह बताने में लगी हुई है कि रणवीर बदमाश था और उसके साथ चल रहे दो अन्य लोग भी बदमाश ही थे, पर इस घटना पर जिस तरह के साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि उससे तो यही लगता है कि पुलिस के इस दल ने स्वयं बहुत संदिग्ध तरह से काम किया है। इसी तरह की घटनाओं के चलते प्रथम पुलिस सुधार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आनंद नारायण मुल्ला ने ठीक ही कहा था कि पुलिस अपराधियों का सबसे संगठित गिरोह है। लेकिन आज हमारा राज्य अपनी वधता के लिए पुलिस से शायद इसी तरह की अपेक्षाएं करता है, तभी तो कहा जाता है कि जो कानून सुप्रीम कोर्ट के बड़े से बड़े आदेश से नहीं लागू होता, उसे पुलिस का एक डंडा लागू कर देता है। सवाल है कि उत्तराखंड जहां के दूरदराज के इलाकों में एक पटवारी राजस्व और पुलिस दोनों विभागों का काम देख लेता है, वहां यह सब क्यों हुआ? क्या नया राज्य बनने के बाद राजनीतिकों और नौकरशाहों ने पुलिस पर जनता से र्दुव्यवहार करने का दबाव बनाया हुआ है? इन सवालों के जवाब ढूंढे जने चाहिए। दूसरी तरफ मुठभेड़ों की सनसनी और शोहरत से मदांध होने वाली पुलिस को भी समझना चाहिए कि दिल्ली से मुंबई तक मुठभेड़ में महारत हासिल करने वाले ज्यादातर पुलिस अफसरों की वीर-गाथाओं का बुरा अंत ही हुआ है। इसीलिए पुलिस सुधारों को लागू करने की आज स़ख्त जरूरत है, ताकि पुलिस राजनीति और अफसरशाही के दबाव से मुक्त होकर कानून का राज कायम करने में अपनी स्वायत्त भूमिका निभा सके।

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