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अब बैड नहीं रही बैड गर्ल्स

अब बैड नहीं रही बैड गर्ल्स

अंग्रेजी में कहावत की तरह एक बात कही जाती है - गुड गर्ल्स स्वर्ग में जाती हैं और बैड गर्ल्स कहीं भी जा सकती हैं। और आज के इस दौर में लड़कियों को कहीं भी जाना ज्यादा सूट करता है। बजाय इस बात के कि वे पूरा जीवन घर की चारदीवारी में काटें, इस उम्मीद पर कि मरने के बाद उन्हें जन्नत नसीब होगी। वास्तव में सत्तर-अस्सी के दशक को याद करें तो उसमें अपने बेटों के लिए लड़कियों की तलाश करने वाले अभिभावक यही कहा करते थे कि उनकी पुत्रवधू सुंदर, सुशील और गुणवान होनी चाहिए। लड़के भी ऐसी ही लड़कियों को प्राथमिकता देते थे, जो सुंदर हों, शालीन हों, घर के कामकाज जानती हों और कभी -कभार पारिवारिक गैदरिंग में कोई भजन या इसी तर्ज पर कोई अन्य गाना सुना सकें। यहां तक कि बॉलीवुड में उस दौर में विलेनिश किरदार निभाने वाली लड़कियों को भी समाज अच्छी निगाहों से नहीं देखता था। हेलेन जैसी अद्भुत डांसर अपने पूरे जीवन इसी ग्रंथि का शिकार रहीं। उनके उत्तेजक परिधान, इरोटिक डांस और बार में पुरुषों को उनका शराब परोसना कुछ ऐसे काम थे, जिन्हें कभी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली। यहां यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि हेलेन नायिका के रूप में परदे पर दिखाई नहीं देती थीं। तब भी उसे ‘बैड गर्ल’ ही कहा जाता था और मध्यवर्गीय परिवारों में हेलेन जैसी बनना किसी ‘अपराध’ से कम नहीं था।  लेकिन आज ऐसा नहीं रहा। आज एक ओर जहां समाज की सोच में बदलाव आया है, वहीं लड़कों की सोच भी बदली है। मामला चाहे आधुनिक किस्म के परिधान पहनने का हो, लड़कियों की बोल्डनेस का हो या फिर लड़कियों के डिस्को जाने और कभी कभार ड्रिंक करने का हो, समाज ने इन बदलावों को स्वीकार किया है। रील लाइफ में भी और रियल लाइफ में भी।

‘दिल्ली 6’ में काम करने वाली अभिनेत्री और मॉडल गीता बिष्ट का मानना है, ‘यह सच है कि समाज की सोच में बदलाव आया है। पहले लड़के भावी पत्नी में केवल तीन ही गुण देखते थे - सुंदर, सुशील और गुणवान। लेकिन आज  वे चाहते हैं कि उनकी भावी पत्नी बोल्ड हो, कामकाजी हो, साहसी हो और ऐसी हो, जो उनके कंधे से कंधा मिला कर चल सके।’ गुड़गांव के एक स्कूल में थियेटर की क्लासेज लेने वाले 25 वर्षीय नरेश चौधरी मानते हैं, ‘हां, मैं एक ऐसी ही पत्नी चाहता हूं, जो बोल्ड हो और जिसके साथ कभी-कभार बैठकर बियर पी जा सके।’

लेकिन सवाल यह उठता है कि समाज और पुरुषों की यह सोच क्या अचानक बदल गयी? वास्तव में पिछले दो-तीन दशकों में भारत में अनेक स्तरों पर बदलाव आया। आर्थिक उदारीकरण से ना केवन विदेशी पैसा यहां आया, बल्कि विदेशी सोच भी आयी। इसके साथ ही लड़कियों ने घर से बाहर कदम रखना शुरू किया। जाहिर है जब लड़कियां काम के लिए घर से बाहर निकलीं तो उनका पहनना-ओढ़ना बदला। वे जींस, टी-शर्ट जैसे कम्फर्टेबल परिधानों को पसंद करने लगीं। बाहर की दुनिया में लड़कों से मिलना-जुलना आम होता चला गया और लड़कियों ने पहली बार खुद को आजाद महसूस किया। टेलीविजन के विस्तार और इंटरनेट ने एक बहुत बड़ी दुनिया से अचानक परदा हटा दिया। इस परदे के हटने ने सदियों से चली आ रही अनेक मान्यताओं और मूल्यों को ध्वस्त कर दिया। लड़कों-लड़कियों दोनों को लगने लगा कि यह नयी दुनिया ज्यादा रोमांचक है। लिहाजा दोनों ही रोमांच की इस पगडंडी पर चलने के लिए लालायित रहने लगे। युवाओं को लगने लगा कि पति-पत्नी का रिश्ता कोई औपचारिक रिश्ता नहीं है, इसलिए वे इस रिश्ते में भी रोमांच ढूंढने लगे। लड़कों को यह समझ में आने लगा कि उनकी पत्नी, उनकी दोस्त, प्रेमिका और उनकी सच्ची हमसफर हो। एक ऐसी हमसफर जो, सुंदर हो, कामकाजी हो, जरूरत पड़ने पर बोल्ड भी हो, डिस्को जाने से जिसे गुरेज ना हो और जिसे बाहर की दुनिया में किसी से भी मिलवाने में कोई शर्मिदगी ना हो। युवा लड़कों और लड़कियों दोनों ही इस बदलाव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

उधर जब समाज ने देखा कि अब तक वे जिसे ‘बैड गर्ल’ कहा करते थे, वही लड़कियां चारों ओर अच्छी पोजिशन में दिखाई दे रही हैं, तो उसने भी ‘बैड गर्ल’ की अपनी तय छवि को तोड़ा। टेलीविजन पर हेलेन की तरह अब आम नायिकाएं भी डांस करने लगीं और तो और प्राइवेट अलबमों ने दकियानूसी चादर को अचानक टुकड़े-टुकड़े कर दिया। समय लगा, लेकिन समाज इन चीजों को स्वीकार करने लगा। अब वह भी मानने लगा कि छोटे कपड़े पहनना, पति के साथ डिस्को जाना या कभी-कभार ड्रिंक कर लेना कोई बुराई नहीं है। यानी अच्छी और बुरी लड़कियों के जो मानदंड थे, वे तेजी से बदलने लगे और हर कोई उन्हें स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होता गया और ‘बैड गर्ल’ गुड होती चली गयीं।

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