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दफ्तर की दोस्ती

कार्यस्थल पर सहकर्मियों के साथ दोस्ती का रिश्ता कायम हो, तो क्या कहने! इससे न केवल आप ऑफिस में आराम से टिके रह सकते हैं, बल्कि आपको किसी प्रकार की मानसिक अशांति का सामना भी नहीं करना पड़ता। आखिर बचपन से लेकर लड़कपन, और फिर कॉलेज के दिनों में भी तो हम दोस्तों की संगत में हमेशा बेफिक्र और मस्त रहते आए हैं। क्या इससे जिंदगी को आसान बना लेने का तजुर्बा करियर में नहीं अपनाना चाहिए? मित्रता से हमें हर काम में सहयोग, सहारा और नैतिक बल मिलता है। ऐसे में दफ्तर में मित्रता का माहौल जरूरी है।

ये दोस्ती अलग है
आम दोस्ती से कार्यस्थल के साथियों की दोस्ती जरा अलग होती है। यहां आप स्कूल-कॉलेज के यार-दोस्तों की तरह बिंदास दोस्त नहीं बना सकते। बचपन के दोस्तों के साथ आप का विकास होता है, और आपकी उनके साथ परस्पर-निर्भरता होती है। लेकिन ऑफिस की दोस्ती कॉमन इंटरेस्ट पर आधारित होती है। मसलन आपके सेक्शन के लोग, आसपास वाले या फिर आपके काम से सीधे ताल्लुक रखने वाले लोगों से ही आपका मित्रता का रिश्ता बनता है और इस रिश्ते में मजबूती दोनों पक्षों के व्यवहार पर निर्भर करती है।

दोस्त-मिजाज
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो ऑफिस के सभी लोगों से दोस्ताना रिश्ता कायम कर लेते हैं। लेकिन ऐसे लोग एक हद तक ही दोस्ती को आगे ले जाते हैं, और किसी विवाद की सूरत में किसी का पक्ष लेने से परहेज करते हैं। दफ्तर की दोस्ती की खास बात ये है कि ये उम्र, वरिष्ठता वगैरह का खयाल नहीं रखती। इसकी बुनियाद में मानसिक और वैचारिक मेल ज्यादा होता है, और इससे आपकी उत्पादकता बढ़ती है।

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  • Web Title:दफ्तर की दोस्ती