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ब्लॉग वार्ता : समलैंगिकता और लोकलाज

पहली बार हिन्दुस्तान समलैंगिकता के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बहस कर रहा है। हमारा समाज जानता तो था, लेकिन चोरी-छुपे। अखबारों और न्यूज चैनलों पर जब समलैंगिक जोड़ों की प्रणय मुद्रा में तस्वीरें घर-घर तक पहुंची तो लोग हैरान हुए। अपने आधुनिक ड्रॉईंग रूम में टीवी से उतरती ये तस्वीरें उनकी परंपरा को टक्कर देने लगीं। बहस शुरू हो गई। हिन्दी के तमाम ब्लॉग समलैंगिकता के मुद्दे पर बहस कर रहे हैं। अपने ब्लॉग हल्ला बोल पर विकास मिश्र हैरान हैं।

http:// indianvishal. blogspot. com लॉगिन करते हुए आम लोगों की उलझनें विकास के स्वर में झलकने लगती हैं। विशाल मिश्र लिखते हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट ने वयस्क समलैंगिकता को मंजूरी देकर अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया है। विशाल को लगता है कि समलैंगिकता परिवारवाद और मनुष्य जाति पर खतरा है। चिकित्सक भले ही समलैंगिकता को सामान्य बतायें, लेकिन यह अप्राकृतिक ही है। कहते हैं टीवी और इंटरनेट की वजह से लड़कियां लड़कियों से और लड़के लड़कों से प्रेम कर रहे हैं। मुझे याद नहीं कि टीवी पर ऐसा कौन सा शो आता है, जो लोगों को समलैंगिक बना रहा है। जाहिर है, हम यहां-वहां से दलीलें पैदा कर रहे हैं। विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन पता नहीं कि क्यों कर रहे हैं।

http:// chitthacharcha. blogspot. com पर मसिजीवी ने समलैंगिकता पर चल रही बहस का अध्ययन किया है। मसिजीवी लिखते हैं कि ब्लॉग जगत पर समलैंगिकता का अंध विरोध नजर नहीं आता।

http:// anshurastogii. blogspot. com पर अंशुमाल रस्तोगी कहते हैं कि अब धर्मगुरु तय करेंगे कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। अंशुमाल लिखते हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर मेरी सहमति है। इंटरनेट एक पब्लिक स्पेस है। यहां इस तरह खुल कर समलैंगिकता के प्रति समझ और सहमति जाहिर करना आसान नहीं। ब्लॉग पर लिखने वालों के रिश्तेदार भी आते हैं। साफ है कि हम इस तरह के मुद्दों पर बात करने के लिए साहस जुटा पा रहे हैं।

लेकिन ऐसा भी नहीं कि हिंदी समाज आज इस तरह की हिम्मत जुटा पा रहा है। 1924 में स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र ने चॉकलेट लिखी थी। चॉकलेट में दो लड़कों के बीच स्वाभाविक प्रेम का जिक्र है। प्रेमी लड़के को चॉकलेट कहा गया है। 1940 के शुरुआती साल में इस्मत चुगताई की कहानी लिहाफ आ चुकी थी। इसमें दो स्त्रियों के बीच प्रेम के पलों में रजाई के बदलते आकार से इस्मत पूरी कथा कह गई थी।

दिनेश राय त्रिवेदी अंशुमाल रस्तोगी के लेख पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि सच तो यह है कि धर्म के लिबासों में ही यह प्रवृत्ति सर्वाधिक मिलेगी। रचना सिंह भी समलैंगिकता का समर्थन करती हैं। मगर बहस कहीं पहुंचती नहीं दिख रही है। सब अपने-अपने खेमे में दलीलें भांज रहे हैं। डॉ. कुमारेंद्र सिंह सेंगर उलझन में हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इस मुद्दे पर क्या कहें।

http:// kumarendra. blogspot. com पर डॉ. कुमारेंद्र  लिखते हैं कि हमारे देश में विवाह को सिर्फ शारीरिक संतुष्टि के लिए नहीं स्वीकार किया गया है। आज दो पुरुषों के बीच संबंध होंगे तो क्या इससे परिवार की धारणा खंडित नहीं होगी। विवाह और परिवार के भविष्य को लेकर खूब बहस हो रही है।

http:// abhayaism. blogspot. com पर मुंबई के अखबार सामना में काम करने वाले पत्रकार अभय हाईकोर्ट के फैसले के संदर्भ में लिखते हैं कि अब दुनिया पक्के दोस्तों को शक की नजर से देखेगी। गाय, गीता और गंगा के देश में गे, नीचता और नंगा का बोलबाला होगा। नेपाल में चार दलों में अपने घोषणा पत्र में गे अधिकारों की बात की थी। वो भी तो हिंदू राष्ट्र है। नेपाल की एक कम्युनिस्ट पार्टी ने गे उम्मीदवार खड़ा किया। सुनील पंत ने जनता को बता कर चुनाव लड़ा कि मैं गे हूं।

नेपाल के पहले गे सांसद होने का खिताब भी मिल गया। अपने जीवन में कोई ऐसा है जो किसी गे को नहीं जानता हो। हमारे धार्मिक प्रतीकों में क्या स्त्रैण रूपों वाले पात्र नहीं हैं? ठीक है कि हम उनमें काम भावना नहीं, बल्कि भक्ति भावना देखते हैं। अठारहवीं सदी में महान शायर मीर तकी मीर ने अपने पिता और उनके चेले के संबंध के बारे में जिक्र किया है।

1861 में कानून बनने से पहले  इस तरह के हजारों किस्से हिंदू-मुस्लिम परंपराओं में मिलते हैं। धर्म की किताब में नहीं लिखा गया है लेकिन धार्मिक परंपराओं को ढोने वाले समुदायों में इसका जिक्र मिलता है। सती प्रथा और बाल प्रथा को भी कभी हम धर्म का ही हिस्सा मानते थे। आज गर्व करते हैं कि हमने बुराइयों को खत्म किया। इस मामले में भी समाज को वक्त मिलना चाहिए।

ravish@ ndtv. com

लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

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