class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

संयोग या पराशक्ति

प्रतिदिन के जीवन में कई बार अकस्मात ऐसी घटनाएं घट जाती हैं जिनके होने का कोई तर्क समझ में नहीं आता। दृश्य जगत के नियमों से परे इंद्रियातीत अनुभव किसी पराशक्ति की ओर संकेत करते हैं। ऐसी अनुभूति होती है कि सृष्टि का कण-कण हमें देख रहा है। इस कायनात का एक जर्रा भर हैं हम। फिर भी हमारे इर्द-गिर्द सभी चीजें जाने-अनजाने व्यवस्थित होती जाती हैं।

लगता है जसे कोई चेतना इस तरतीब के पीछे है, जिसे हम पहचान नहीं पाते। गहन अवसाद के क्षणों में मन अंधेरी सुरंग में धंसता चला जता है। सारी संवेदनाएं जड़ हो जती हैं। तभी अचानक रोशनी की एक किरण दिखाई पड़ती है। मेरे एक मित्र अपनी मां की मृत्यु के आघात से उबर नहीं पा रहे थे। एक दिन पत्नी ने बोझिल वातावरण को हल्का करने के लिए टीवी चला दिया। देखा क्या कि एक रोते हुए किशोर को उसके इष्ट गुरु जी समझ रहे थे ‘चांद पुत्तर! तेरी मां मर गई? रो मत। देख तेरी गाय भूखी प्यारी तुझे देख रही है। उठ उसको चारा-पानी दे। हम आएंगे दूध पीने।’ पति-पत्नी के रोंगटे खड़े हो गए। आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। पति का नाम भी ‘चांद’ था और वह भी पशुप्रेमी थी।

अक्सर लेखक बताते हैं कि जब कभी उन्हें अपने लेखन में संशय हो और प्रामाणिक आधार मिलने का कोई साधन न हो, तो अचानक कोई व्यक्ति आ जाता है, या फिर किसी संचार माध्यम से संशय का निवारण हो जाता है। स्वामी योगानन्द परमहंस की गवाही है कि वे परीक्षा की तैयारी नहीं कर पाए थे। एक दिन पहले रास्ते पर चलते-चलते कुछ पन्ने उड़ते दिखाई दिए। उठाकर देखा तो वे परीक्षा के विषय-संबंधी ही थे। उन्होंने वे सब रट लिए। दूसरे दिन प्रश्न पत्र मिलते ही देखा तो सब प्रश्न वही थे, जिन्हें वे याद कर चुके थे। यह सब क्या है? मात्र संयोग, किसी पराशक्ति का कमाल या फिर भगवत्कृपा। कुछ भी हो यह हमारी जिंदगी का एक हिस्सा ही है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:संयोग या पराशक्ति