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प्रोजेक्ट वर्क के लिए खुली दुकानें

प्रोजेक्ट वर्क के लिए खुली दुकानें

जुलाई आते ही गर्मियों की लंबी छुट्टियां समाप्त हो जाती हैं और स्कूल खुलने लगते हैं। अंजलि कपूर की बेटी निदिमा दिल्ली पब्लिक स्कूल, रोहिणी और बेटा शिवाय जे.डी. गोयनका पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। छुट्टियां शुरू होते ही अंजलि कपूर होमवर्क देख कर खासी परेशान हुईं। कहती हैं, ‘मेरी बेटी नौवीं में पढ़ती है। उसे मैथ्स के टर्म्स की एक वर्ग पहेली बनाने, अंकों का इतिहास, क्रिकेट के मैदान में दिलचस्प पैटर्न ड्रा करने बगैरह का काम छुट्टियों में होमवर्क के रूप में मिला। ये तो सिर्फ मैथ्स के प्रोजेक्ट्स हैं, दूसरे विषय अलग से हैं। दूसरे प्रोजेक्ट्स में इंसानी जिन्दगी में पेड़ों की अहमियत, ग्लोबल वार्मिंग वगैरह शामिल हैं। मैं तो इतना मुश्किल होमवर्क देख कर ही हैरान-परेशान हुई। लेकिन बच्चों के ट्यूटर आशु माट्टा ने होमवर्क करने की हामी भरी, तो सांस में सांस आई।’

ऐसी दिक्कतें डोलती अंजलि कपूर आज अकेली मां नहीं हैं। तमाम अभिभावक शुक्रगुजार हैं घर-घर ट्यूशन पढ़ाने वाले सर या मैडम और कॉलोनी की स्टेशनरी शॉप व किनारी-गोटा बेचती दुकानों के, जिनकी मदद से छुट्टियों का होमवर्क बच्चे कर पाए हैं या कर रहे हैं। हाल के दो-चार सालों से दिल्ली में बाजारों में खुली ऐसी वर्क-शॉप्स से होमवर्क निपटाने का बिजनेस चल निकला है। उधर बच्चे भी खुश हैं। एक तो, बैठे-बैठे होमवर्क हो गया और दूसरा, टीचरों की शाबाशी बटोर ली।
 
बताते हैं कि आज के होमवर्क क्रिएटिव एक्टिविटी को बढ़ावा देते हैं, नई कुशलता विकसित करने का मौका मुहैया कराते हैं। फिर भी होमवर्क मुसीबत खड़ी कर रहा है। बच्चे और बड़ों दोनों चार्ट पेपर, पोस्टर, रंग, टेप, गोंद, कैंची, पुरानी-नई किताबों वगैरह में उलझे रहते हैं। ऐसे में अब बाहर से होमवर्क कराने का ट्रेंड चल पड़ा है। साथ ही होमवर्क कराने सिखाने की क्लासें तक लग रही हैं। एक अलग विचारणीय पहलू है कि होमवर्क में इतने मुश्किल प्रोजेक्ट-मॉडल आखिर दिए क्यों जाते हैं कि बच्चों को चित्रशाला या वर्क-शॉप्स या फिर दुकानों के आसरे की जरूरत महसूस हुई।

मालती जैन का बेटा देव 7वीं कक्षा में पढ़ता है। उसे छुट्टियों में एक्वेरियम बनाने का होमवर्क मिला। होमवर्क का पेपर पढ़ते ही उसका और उसकी मम्मी का सिर घूम गया। कुछ नहीं समझ आया कि यह कैसे बनेगा? पूछते-पूछते उन्हें पता चला कि कमला नगर की कोल्हापुर रोड स्थित ‘जगदम्बा स्टोर’ छुट्टियों के प्रोजेक्ट बनाते हैं। दक्षिण दिल्ली से उन्होंने उत्तरी दिल्ली का रुख लिया और एक्वेरियम का ऑर्डर दिया। कुछ सौ रुपए अदा कर थर्मोकोल से बना एक्वेरियम घर ले आए और बेफिक्र हो गए।

‘जगदम्बा स्टोर’ के 60 पार मालिक ओम प्रकाश बताते हैं, ‘हालांकि पिछले 38-40 सालों से स्कूली मॉडल और प्रोजेक्ट बनाने का काम कर रहा हूं, लेकिन हाल के 2-4 सालों में इस पेशे में जोरदार इजाफा हुआ है। गर्मी, सर्दी या दशहरे की छुट्टियां ही नहीं, अब तो कई त्योहारों और सालाना पेपरों से पहले भी मॉडल बनाने का काम रात-दिन चलता है।’

स्कूली प्रोजेक्ट और मॉडल बनाने वाले सारी दिल्ली में हैं। मोटे अनुमान के मुताबिक 1,500 तो हैं ही। क्या करोलबाग, क्या कमला नगर, ज्यादातर कॉलोनियों की स्टेशनरी, गोटा-किनारी, सजावटी  सामान वगैरह बेचने वाली दुकानों पर स्कूली होमवर्क से जुड़ा काम भी खूब होने लगा है। मोती नगर में तो एक साथ 5-6 दुकानें इसी काम में लगी हैं। अमूमन नॉन वर्किंग मॉडल बनाने की फीस 50 से 250 रुपये है और वर्किंग मॉडल बनाने के दुगुने यानी 500 रुपए तक वसूल किए जाते हैं। ज्यादा जटिल मॉडल बनाने का शुल्क 1,000 रुपए तक भी है।

बच्चों को कैसे-कैसे मॉडल-प्रोजेक्ट्स का होमवर्क मिलता है? बताते हैं कि ज्यादातर प्रोजेक्ट पाठ्यक्रम से जुड़े होते हैं। मैथ्स, सोशल साइंस, साइंस, इंग्लिश वगैरह सभी विषयों के मॉडल बनाने का काम मिलता है। ‘अंशुल बुक डिपो’ की अर्चना बतरा बताती हैं, ‘कंजर्वेशन ऑफ एनर्जी, ईको सिस्टम, डिजास्टर मैनेजमेंट वगैरह के मॉडल-प्रोजेक्ट बनाना बच्चों के बस की बात नहीं होती। ऐसे में हम बच्चे की मदद करते हैं।’

अभिभावकों की मानें तो एक मॉडल या प्रोजेक्ट बनाने के मुताबिक जरूरी तामझाम इकट्ठा करना किसी कसरत से कम नहीं है। मिसाल के तौर पर, अगर पवनचक्की बनाने का होमवर्क है तो ढांचे के लिए कार्ड-बोर्ड, पेंट, पंख, मोटर, तार, बैटरी वगैरह ढेर सारा बारीक-बारीक सामान एकत्रित करना बेहद मुश्किल है।

‘जगदम्बा स्टोर’ के प्रोजेक्ट मेकर ओम प्रकाश बताते हैं, ‘बच्चे और उनके अभिभावक रोहिणी और ग्रेटर कैलाश जैसे दूरदराज इलाकों से भटकते-भटकते मेरे पास आते हैं। मैं उन्हें सीखने और बनाने की प्रेरणा देता हूं। सिखाने और समझाने के साथ-साथ उन्हें रॉ मैटीरियल यानी तामझाम का जुगाड़ भी कर देता हूं।’

फिर भी छुट्टियों के होमवर्क के बहाने, बच्चों को स्कूलों और पेशेवरों की तमाम ऐसी क्रिएटिव स्किल्स सिखाने की कोशिशों के बावजूद अभिभावकों और बच्चों के पहाड़गंज के ‘पूरण चित्रशाला’, करोलबाग के ‘सुरेन्द्र ट्रेसर’, न्यू मोतीनगर के ‘वीणा मनचंदा आर्ट गैलेरी’, पश्चिम विहार के ‘अंशुल बुक डिपो’, मोती नगर के ‘राज ट्रेसर’ या ‘सलूजा जनरल स्टोर’ जैसी दुकानों के चक्कर जारी हैं। अपना मॉडल-प्रोजेक्ट मिलते ही बच्चों-अभिभावकों के चेहरों पर पहले से छाई फिक्र की लकीरें उड़ जाती हैं और खुशी तैरने लगती है - होमवर्क निपटने की बेइंतहा खुशी!

 

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