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एक मौका, जो हाथ से निकल गया

संसद में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने 2009-10 का जो बजट पेश किया है, वह एक तरह से इस साल का दूसरा अंतरिम बजट ही है। इसलिए भी कि अंतरिम बजट में जिन नीतियों की घोषणा की गई थी वे नीतियां इस बजट में भी जारी रखी गई हैं। और इसलिए भी कि जो आंकड़े दिए गए हैं वे अंतरिम बजट जैसे ही हैं। वित्तमंत्री का पूरा दस्तावेज बजट अनुमानों पर ही आधारित है, पुन:अनुमानों पर नहीं। जबकि किसी भी पूर्ण बजट में सभी घोषणाओं का आधार पुन:अनुमान ही होते हैं।

अगर करों के लिहाज से देखें तो यह बजट बहुत सकारात्मक है। एक तो इसमें करों को तर्कसंगत बनाने की प्रक्रिया को बरकरार रखा गया है। आयकर पर जो सरचार्ज था, उसे हटाना इस नजरिये से काफी महत्वपूर्ण है। फ्रिंज बेनफिट टैक्स को हटाने से कंपनियों और कर्मचारियों दोनों को ही फायदा मिलेगा। इससे होने वाले राजस्व की भरपाई कुछ हद तक प्रिक्विटी चार्ज से हो सकेगी, लेकिन यह नया कर उन्हीं मामलों में लागू होगा जहां कर्मचारियों को कंपनियों में हिस्सेदारी दी जती है। सरकार ने कंपनी करों में कोई बदलाव नहीं किया, जो कि यह दिखाता है कि देश की कर नीति में एक तरह की स्थिरता आ गई है।

अप्रत्यक्ष करों को देखें तो सरकार ने उसमें भी कोई बड़े बदलाव नहीं किए हैं। एक्साइज डयूटी में थोड़ी सी राहत जरूर दी है। इसके अलावा मंदी की मार ङोल रही कंपनियों और क्षेत्रों को सरकार ने राहत के जो दो पैकेज दिए थे, सरकार ने उन्हें भी बरकरार रखा है। सरकार ने अपने इस संकल्प को भी दोहराया है कि वह गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स को वायदे के अनुसार अगले वित्तवर्ष में ही लागू कर देगी। इस तरह की नीति से विकास को गति मिलेगी।

लेकिन बजट में सब कुछ इतना अच्छा नहीं है। खासतौर पर कुछ जगहों पर यह वित्तीय संघवाद की धारणा का उल्लंघन करता दिखाई देता है। राज्यों की वित्तीय मदद के मामले में पूरी तरह से राजनैतिक नजरिया अपनाया गया है। मसलन सरकार ने पश्चिम बंगाल में आए समुद्री चक्रवात के लिए राहत की घोषणा की है, जबकि बिहार जसे राज्यों में हर साल बाढ़ आती है उसके बारे में नहीं सोचा गया। इसी तरह की विशेष मदद महाराष्ट्र को भी दी गई है और केरल को भी।

ये सभी वे राज्य हैं, जहां पिछले दिनों आम चुनाव में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं था इसलिए उस पर बजट में कोई विशेष कृपा नहीं की गई। हालांकि राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद हुई बहस में प्रधानमंत्री ने कहा था कि वे क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करने की कोशिश करेंगे। लेकिन यह बजट कहीं भी उस वादे को पूरा करता नहीं दिखाई देता। बजट में जो आंकड़े दिए गए हैं, उसमें सबसे चिंताजनक स्थिति वित्तीय घाटे की है। यह घाटा 6.8 फीसदी तक पहुंच गया है।

इसके अलावा राज्यों का वित्तीय घाटा पहले ही चार फीसदी तक पहुंच चुका है। इसके अलावा अन्य मदों में होने वाला इस तरह का घाटा दो फीसदी से ज्यादा ही होगा। इन सबको जोड़ दें तो कुल वित्तीय घाटा 13 फीसदी के आस-पास बैठता है। यह ठीक है कि दुनिया भर में मंदी है और अर्थव्यवस्था पर उसका बुरा असर पड़ा है। लेकिन 13 फीसदी का घाटा इस असर के मुकाबले बहुत बड़ा है। इसमें कई और परेशानियां भी जुड़ी हुई हैं।

सरकार ने कहा है कि वह इस घाटे की भरपाई नोट छाप कर नहीं करेगी, इसकी भरपाई के लिए वह बाजर से उधार लेगी। यह बहुत बड़ी रकम है और अगर सरकार बाजर से पैसा उठाती है तो बाजर में निजी क्षेत्र के लिए बहुत कम धन बचेगा। हम अगर नौ फीसदी विकास दर की बात कर रहे हैं तो यह काम निजी क्षेत्र के भरोसे ही हो सकेगा, लेकिन अगर निजी क्षेत्र के संसाधन सूखते हैं तो उसके लिए मुश्किलें खड़ी होंगी और इस विकास दर को हासिल कर पाना आसान नहीं रह जाएगा। इस तरह का घाटा वित्तीय उत्तरदायित्व कानून का भी उल्लंघन करता है, मंदी की मजबूरियां समझी ज सकती हैं, लेकिन सरकार को यह तो बताना ही चाहिए था कि वित्तीय उत्तरदायित्व कानून का पालन कैसे हो सकता है। इतना भर कहना काफी नहीं है कि वित्त आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही इसकी रणनीति तैयार होगी।

अभी तीन दिन पहले सरकार ने जो आर्थिक सव्रेक्षण पेश किया था उसमें आर्थिक सुधारों के बारे में बहुत कुछ कहा गया था। लेकिन बजट में उसकी जरा भी झलक नहीं दिखाई दी। लगता है जसे बजट और आर्थिक सव्रेक्षण में कोई तालमेल ही नहीं है। पिछले पूरे पांच साल तक यह कहा जता रहा कि सरकार बहुत सारे आर्थिक सुधार सिर्फ इसलिए नहीं कर पा रही है, क्योंकि वह वामपंथियों के समर्थन पर टिकी है।

लेकिन इस बार वामपंथी सरकार में नहीं थे, इसलिए उसके पास एक बहुत बड़ा अवसर था, लेकिन लगता है कि सरकार ने यह अवसर खो दिया है। यह ठीक है कि सरकार ने किसी भी सुधार के लिए मना नहीं किया है। सरकार ने यह नहीं कहा है कि वह विनिवेश नहीं करेगी, लेकिन इसे काफी कुछ भविष्य के लिए टाल दिया गया है। यह ठीक है कि बजट ही समाधान नहीं होता और आर्थिक नीतियों को साल भर आते रहना चाहिए, उन्हें बजट पेश होने की तारीख का इंतजर नहीं करना चाहिए। लेकिन बजट में जगह-जगह ऐसा लगता है कि सरकार बहुत सी जरूरी चीजों को टाल गई है।

ऐसी नीतियां तो आती रहेंगी, लेकिन आने वाले महीनों में बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर किस तरह से आती है। भारत में नहीं पूरी दुनिया में। फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता यही है और उस लिहाज से देखें तो यह बजट काफी कुछ निराश ही करता है।

nandu@ nksingh. com

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केन्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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