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रेल बजट : नए नजरिये की पटरी बिछाना जरूरी

भारतीय रेल का भविष्य एक ही सूरत में महत्वपूर्ण हो सकता है कि अगर इसका नेतृत्व दूरदर्शिता से काम ले, यथोचित योजनाएं बनाकर उनको तय समय के भीतर पूरा करें। पर हाल में ही संसद में पेश किया गया बजट इसका कोई पक्का आश्वासन नहीं देता। नए रेल बजट के अनुसार इस वर्ष का परिचालन अनुपात 92.5 प्रतिशत से भी अधिक हो सकता है। इस तरह से रेल के स्वास्थ्य का सिग्नल तो लाल होता ही जा रहा है। आने वाले समय में भारतीय रेल की कार्यक्षमता और साथ ही वित्तीय स्थिति की विषमताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती।

रेलों की माल और सवारी यातायात की आवश्यकता से कहीं कम क्षमता चिंताजनक है। भारतीय रेलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है रेल की क्षमता बढ़ाना। देश में माल लदान और यात्रिक मांग मौजूदा क्षमता से कहीं ज्यादा है। भारतीय रेल के ब्रॉड गेज को 822 खंडों में बांटकर देखने से पता लगता है कि इनमें से 173 खंडों में ही क्षमता का उपयोग शतप्रतिशत से ज्यादा हो रहा हे। 136 खंडों में 90 से 100 प्रतिशत का ही वास्तविक उपयोग हो रहा है और 91 अन्य खंडों में 80 से 90 प्रतिशत के बीच उपयोग का स्तर है।

देश भर के राष्ट्रीय राजमार्गो पर अंतरनगरीय रास्तों पर चलते लाखों ट्रक यही बताते हैं कि रेलवे क्षमता का शीघ्र विस्तार प्राथमिक आधार पर होना चाहिए। आयात निर्यात से संबंधित कन्टेनरों में भरे माल के यातायात में, विशेषकर पश्चिमी तट पर स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट से जुड़े उत्तर और उत्तर पश्चिमी भारत के अनेक केन्द्र रेल यातायात - क्षमता की कमी अनुभव करते रहे हैं।

जाहिर है कि इस क्षमता को बढ़ाने के लिए कई काम करने होंगे- नई लाइनें बिछानी होंगी, कुछ लाइनों का दोहरीकरण करना होगा, सिग्नल प्रणाली का आधुनिकीकरण करना होगा, माल डिब्बों और इंजनों का कायाकल्प करना होगा। टर्मिलन सुविधाएं बहुत पिछड़ी हुई हैं, उनको शीघ्र ही इंटीग्रेटेड मल्टीमॉडल टर्मिनल कम्पलेक्स और लौजेस्टिक पाक्र्स में सभी सुविधाएं के साथ जुटाना होगा।

यह भी जरूरी है कि रेलवे स्वयं अनुशासित होते हुए एक्सप्रेस माल गाड़ियों को सुनिश्चित टाइम टेबल के अनुसार चलाए। रेल विभाग अपने सभी बड़े ग्राहकों और उपभोक्ताओं के सहयोग और सामंजस्य से पारस्परिक हित में कार्य करने का वातावरण बनाए। साथ में यात्रा सुविधाओं को भी ध्यान में रखना होगा। अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति के कारण जनता की आकांक्षाएं निरंतर बढ़ रही हैं, उपभोक्ताओं का खर्च लगातार बढ़ रहा है जिससे देश में आवागमन की बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है।

दुनिया के लगभग 30 देशों में हाईस्पीड (250-350 कि.मी. प्रति घंटा) सवारी गाड़ियां चलाई ज रही हे। अपने देश में भी ऐसी गाड़ियों की शरुआत करना अब अनिवार्य सा हो गया है। प्राय: सभी ऐसी गाड़ियां रेलों के लिए भी फायदेमंद रही हैं और दुर्घटना रहित भी। क्षमता बढ़ाने के साथ ही यह भी जरूरी है कि रेलें अपनी आमदनी बढ़ाएं, मुनाफा बढ़ाएं, खर्च कम करें, बचत के अनेक संभव उपाय और साधन जुटाएं। क्षमता बढ़ाने और आधुनिकीकरण के लिए बृहद धनराशि की आवश्यकता है। रेलवे में खर्च घटाने के अनेक उपाय सुझए जाते रहे हैं। नई टेक्नोलॉजी के आधार पर दुनिया भर में खर्चे बहुत कम किए गए हैं।

दिक्कत यह है कि ममता बनर्जी ने जो रेल बजट पेश किया है, उसने इन सब चीजों पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। कोई भी बजट तभी अर्थ रखता है, जब देश की भावी जरूरत को ध्यान में रखकर  एक व्यापक आर्थिक नीति के साथ बने। हम जो रेल बजट बनाते हैं, उनमे कंसेशन और राहत जैसी कई राजनैतिक चीजें होती हैं, लेकिन किसी दीर्घकालिक नजरिये का पूरी तरह से आभाव रहता है।

मसलन कुछ साल पहले हमें रेल बजट में यह बताया गया था कि देश के 22 रेलवे स्टेशनों को विश्व स्तरीय बनाया जएगा। उसके बाद के बजट में यह संख्यां बढकर 24 हो गई, इस बार के बजट में ममता बनर्जी ने यह संख्या बढ़ाकर 50 कर दी है।

हालांकि नई दिल्ली स्टेशन से इस काम की शुरूआत होनी थी, लेकिन वहां भी यह काम एक हद से आगे नहीं बढ़ सका। इस सूची में नए स्टेशन शामिल करने के बजए बेहतर यह होता कि रेलमंत्री यह बताती कि पहले से तय स्टेशनों में यह काम कब निश्चित रूप से पूरा हो जाएगा। यही हाल रेलवे के डेडीकेटेड फ्रेट कैरिडोर का है जिसकी हर बजट में जोरदार चर्चा होती है लेकिन होता कुछ भी नहीं।

आम लोगों के लिए रेल बजट एक अच्छी खबर होती, अगर रेलमंत्री यह वादा और व्यवस्था करती कि रेल परिवहन में किसी प्रकार की यांत्रिक नाकामी के लिए टालरेंस जीरो रहेगा, वगनें, कोच, इंजनों, रेल पथ, सिग्नल और ऊपर लगे बिजली तारों में जीरो फेलियोर का नया अध्याय प्रारंभ होना चाहिए।

लेखक कंटेनर कापरेरेशन के पूर्व प्रबंध निदेशक हैं

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