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श्रम का सम्मान

आर्थिक उदारीकरण ने इस बात का ढिंढोरा पीटा कि अफसरों, कर्मचारियों के वेतन में कितनी वृद्घि हुई। लेकिन यह बात बताना भूल गए कि काम के घंटों में जो वृद्घि हुई, उससे श्रम-शक्ति को कितना भारी नुकसान उठाना पड़ा? शरीर हो या मन की ताकत एक हद तक ही सही तरह से काम करती है। उसके बाद उसकी उम्र कम हो जाती है। सरकार ने अगर छह दिन की जगह पांच दिन ही काम के लिए तय किए तो उसके पीछे शरीर और मस्तिष्क को बोझमुक्त होने से बचाना था।

वीकएंड को लोग एंज्वाय करें और जब सोमवार से काम पर लौटें तो उनके अंदर ताजगी भरी हुई हो। यह जीवन को देखने और समझने का मानवीय पहलू भी था। लेकिन पैसे की भूख ने निर्मम बना दिया और पैसे की जरूरत ने श्रमिकों को हर कदम पर झुकने के लिए बाध्य कर दिया।

एक बार एक कंपनी के निदेशकों की बैठक में प्रस्ताव आया कि कर्मचारियों को जो दोपहर में खाने का डेढ़ घंटे का विश्राम काल मिलता है, उसे कम कर दिया जाए। उससे पांच आदमी द्वारा उतना काम हो सकता है, जितना आठ आदमी करते हैं। अर्थ-विशेषज्ञों की इस सिफारिशों को वहां के निदेशकों ने मानने से इंकार कर दिया। जब कर्मचारियों को यह जानकारी मिली तो वे इतने प्रसन्न हुए कि छुट्टी के समय काम करके अपने उत्पादन को दुगुना कर दिया। हमारी कंपनियों और उद्योगपतियों के लिए यह अकल्पनीय है।

लेकिन इस सच को स्वीकार करना पड़ेगा कि भारत में किसी भी तरह से अरबपति-करोड़पति बनने की इस समय होड़ लगी हुई है। क्या ये पैसे सही रास्ते से आते हैं? जवाब ढाई हजार वर्ष पूर्व महावीर ने दिया था- दूसरों की विपन्नता पर विलास के प्रासाद खड़े करना हिंसक विप्लवों की अटूट श्रृंखला को आमंत्रित करना है। महावीर के इस संकेत को समझना चाहिए मालिक और श्रमिक, पूंजी और समाज के बीच अगर असंतुलन बना तो सारी व्यवस्था चरमरा जाएगी। श्रम का सम्मान किया जाना चाहिए, व्यक्ति का तन-मन स्वस्थ रहा तो समाज भी स्वस्थ रहेगा।

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