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..और इंडिया का

उद्योग व्यापार क्षेत्र के लिए इस बजट में बहुत खुश होने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन उन्हें विशेष शिकायत भी नहीं होगी। दरअसल इस बजट के केन्द्र में वह आम मतदाता है, जिसने लोकसभा चुनावों में संप्रग को उम्मीदों से कहीं बड़ी जीत दिलवाई। यह बजट उस मतदाता को ‘शुक्रिया’ कहने की सरकार की कोशिश है। लेकिन उद्योग व्यापार जगत को शिकायत इसलिए नहीं होनी चाहिए कि इसी शुक्रिया अदा करने में उनकी सबसे बड़ी समस्या का हल भी है।

इस वक्त उद्योगों की सबसे बड़ी समस्या बाजार में मांग की कमी है और बुनियादी ढांचे में भारी सरकारी निवेश का एक अर्थ मांग बढ़ना भी है। यह पिछले दिनों के अनुभव ने सिद्ध किया है कि आम आदमी पर सरकारी खर्च अच्छी राजनीति ही नहीं, अच्छा अर्थशास्त्र भी है। जब बड़े पैमाने पर सरकारी पैसा विभिन्न योजनाओं के जरिये जमीन पर आएगा तो घरेलू बाजर में मांग बढ़ेगी। विदेशी मांग में वृद्धि के लिए सरकार ज्यादा कर नहीं सकती, लेकिन निर्यातकों को कुछ राहत देने के लिए कोशिश तो इस बजट में है ही।

नौ प्रतिशत वृद्धि दर पाने का साहसिक लक्ष्य रखने का भी एक फायदा होगा। इससे जो आशाजनक संकेत विश्व बाजारों में जाएंगे, उससे भारतीय उद्योग व्यापार को बेहतर निवेश मिलने में जरूर मदद मिलेगी। अगर घोर मंदी के दौर में 6.7 प्रतिशत वृद्धि दर है और नौ प्रतिशत का लक्ष्य है तो ऐसी अर्थव्यवस्था इस जमाने में निवेशकों को और कहां मिलेगी। बुनियादी तौर पर मरहूम जॉन मेनार्ड कीन्स के बताए रास्ते पर वृद्धि दर बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं, इसलिए इन दिनों मौद्रिक घाटा 2.7 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत हो गई और इस पर कोई भी आशंकित नहीं है।

अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक आर्थिक पुनरुद्धार पूरी तरह न हो जाए, उसके पहले कतरब्योंत का मतलब वापस मंदी में फंसना होता है। इसलिए सारी आशा इस बात पर टिकी है कि भरपूर सरकारी खर्च से आम आदमी का भला भी होगा और अर्थव्यवस्था में भी ऐसी तेजी आएगी कि सारे घाटे की भरपाई हो सके। दो बेहद अलोकप्रिय टैक्स एफबीटी और सीटीटी हटा लेने पर भी लोग खुश होंगे, हालांकि मध्यवर्ग को उसके आयकर में कुछ खास छूट नहीं है। यह नई सरकार का पहला बजट है और इसमें अगर अगले पांच साल के नक्शे को ढूंढ़ने की कोशिश की जाए तो हम कह सकते हैं कि सरकार बिना विवादों में फंसे अर्थव्यवस्था के सुधार पर जोर दे रही है।

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