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चीन से सीमा समझौते की बाधाएं

नए विदेश मंत्री के सामने चीन के साथ सीमा-विवाद पर वार्ता एक बड़ा मसला है। वार्ताओं की शुरुआत 2003 में हुई थी और दो साल बाद दोनों पक्षों में इस विवाद को सुलझने के लिए ‘राजनीतिक मानदंडों और दिशा-निर्देशक सिद्धांतों’ पर सहमति हो गई थी। वार्ता के तेरहवें दौर के बाद भी समझौते की कोई संभावना नहीं बनी थी। विवाद का मुख्य मुद्दा था, चीन का अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके पर दावा करना। सन् 2005 में निर्धारित के अनुसार ‘अंतिम समझौते में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सीमावर्ती इलाकों में बसे लोगों के हितों की रक्षा हो।’ यानी तवांग जैसे बसे हुए इलाकों पर कोई सौदेबाजी नहीं की जाएगी, लेकिन बीजिंग तवांग के अपने दावे पर डटा हुआ है।

चीन के पक्ष को समझने के लिए इस विवाद के ऐतिहासिक पहलू को समझना उपयोगी होगा। अप्रैल, 1960 में चीन और भारत के प्रधानमंत्री सीमा के मसले पर चर्चा करने के लिए नई दिल्ली में मिले थे, इस मौके पर चाउ एन लाई ने संकेत दिया था कि यदि भारत पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख और अक्सई चीन) में चीन के दावे को स्वीकार कर ले तो वे भी पूर्वी क्षेत्र (आज के अरुणाचल प्रदेश) पर मैकमोहन रेखा को लेकर युक्तिसंगत रुख अपना लेंगे।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि यद्यपि चीन मैकमोहन रेखा को सीमा के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता, फिर भी उससे कुछ भिन्न सीमा रेखा को तो स्वीकार कर ही सकता है। मैकमोहन रेखा को पहले ही नकारने और फिर स्वीकारने पर उसे अपने ही देश में भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। मैकमोहन रेखा 1914 के शिमला सम्मेलन से ही उपजी थी। जिसमें ब्रिटिश, भारतीय और चीनी और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इसे स्वीकारने का अर्थ यह होगा कि वह तिब्बत को भी सम्प्रभुता का समान दर्जा देना।

चीन ने ‘अपरिभाषित’ से लगने वाले पूर्वी क्षेत्र के इन इलाकों में ही अपनी दिलचस्पी दिखाई है। 1914 के मानचित्र में इस इलाके को मैकमोहन रेखा के उत्तरी भाग में दर्शाया गया है, जबकि वास्तव में ये इलाके इस क्षेत्र में स्थित सबसे ऊंची पर्वतमाला (जलागम क्षेत्र) के दक्षिणी भाग में थे। जवाहरलाल नेहरू ने पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों को साथ जोड़ने के चाउ एन लाई के इस प्रयास को नकार दिया था और मांग की थी कि इन दावों की क्षेत्रवार छानबीन की जानी चाहिए।

पश्चिमी क्षेत्र में बीजिंग ने न केवल अक्सई चिन पर अपना दावा पेश किया, बल्कि उस क्षेत्र के दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी इलाकों पर भी अपना दावा ठोक दिया। यद्यपि सन् 1959 में चीन ने आगे बढ़कर इसके कुछ हिस्सों पर कब्जा तो कर लिया, लेकिन जिन इलाकों पर उसका दावा है, वह समूचा इलाका पहले उसके कब्जे में नहीं था। इस पूरे इलाके को चीन ने 1962 के युद्ध के समय ही अपने कब्जे में लिया था।

समझौता-वार्ताएं जब फिर शुरू हुईं तो नई दिल्ली क्षेत्रवार समझौते के अपने रुख पर कायम रहा। आशय यही था कि यदि चीन भारत के रुख को स्वीकार कर लेता है तो राजनैतिक दृष्टि से भारत सरकार के लिए पश्चिम में कुछ रियायत देना आसान हो जाएगा। घरेलू राजनीति का भी यही दबाव था कि भारत सबसे पहले चीन से 1962 में हथियाई गई लद्दाख की तीन हजार एकड़ वर्ग मील की जमीन वापस ले। चीन ने भारत के इस रुख को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन अरुणाचल प्रदेश और खास तौर पर तवांग इलाके के अपने दावे पर जोर देना जारी रखा।

चीन के दावे का गणित बहुत सीधा है। यदि एक क्षेत्र की रियायत का लाभ उसे दूसरे क्षेत्र में कुछ नहीं मिलता है तो इसका अर्थ यह निकाला जाएगा कि प्रत्येक क्षेत्र में अधिकतम समझौता-वार्ताएं करने का रुख ही अपनाया गया है। समझौता-वार्ताओं का रुख पहले की तुलना में अब कई मायनों में काफी बदल गया है। भारत अब एक व्यापक पैकेज वाले समझोते पर सहमत हो गया है। दोनों पक्ष इस पर भी राजी हैं कि ऐतिहासिक दावों को पूरी तरह छोड़कर एक राजनैतिक समझौता कर लिया जाए। दिल्ली चाहती है कि चीन पश्चिमी क्षेत्र में कम से कम 3000 वर्गमील के इलाके को खाली कर दे, बदले में चीन पूर्वी क्षेत्र में कुछ रियायत चाहता है। लेकिन भारतीय नेता लगातार यही दोहराते रहे हैं कि पहले से बसे लोगों को विस्थापित करने का कोई प्रस्ताव उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा।

तवांग के दावे से बीजिंग को यह लाभ है कि वह इससे न केवल इलाके के जलागम क्षेत्र के दक्षिणी भाग में और अधिक रियायतें पा सकता है, बल्कि पश्चिमी क्षेत्र में अपने कब्जे का बहुत अधिक हिस्सा छोड़ने से भी बच सकता है। दूसरे तवांग पर दावा छोड़ने के एवज में चीन चाहता है कि भारत तिब्बत के मामले में उसे कुछ ठोस आश्वासन दे। चीनी मानते हैं कि तिब्बत की समस्या को हल करने के लिए समय ही उनका सबसे अच्छा मित्र हो सकता है।

दलाई लामा न रहे तो बीजिंग उनका उत्तराधिकारी नियुक्त कर देगा और समस्या अपने-आप ही हल हो जाएगी। लेकिन उन्हें यह सफलता तभी मिलेगी जब वे तिब्बत के विस्थापितों के आंदोलन को कमजोर करने में कामयाब हो जाएंगे और उसका सबसे बड़ा निशाना होगी भारत से चलने वाली निर्वासित सरकार। भारत सरकार ने इस निर्वासित सरकार को मान्यता नहीं दी है और साथ ही यह भी घोषित किया है कि इस संगठन को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की इजजत नहीं है। लेकिन चीन को भारत पर भरोसा नहीं है। इसी अविश्वास के कारण ही चीन ने सन् 1962 में भारत पर हमला किया था। इसलिए चीन समझोते के एक अंग के रूप में भारत से यह अपेक्षा करता है कि वह तिब्बती विस्थापितों को कुचल दे और निर्वासित संसद को भी भंग करवा दे।

इस गतिरोध के बावजूद यदि दोनों पक्ष इच्छुक हों तो दोनों साथ मिलकर एक विवेकसम्मत समझौता कर सकते हैं। भारत के पास पूर्वी क्षेत्र में बिना आबादी वाले इलाकों में रियायत देने की गुंजइश है और चीन पश्चिमी क्षेत्र में अपने कब्जे की कुछ जमीन छोड़ सकता है। ऐसे समझोते में कुछ वक्त जरूर लग सकता है। किसी भी समझोते को देश के अंदरूनी राजनीतिक बाजर में लोगों के गले उतारना इतना आसान नहीं होता। सीमा के समझोते के लिए संविधान में संशोधन करना होगा और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की और कम से कम राज्यों की आधी विधानसभाओं के समर्थन की भी आश्यकता होगी।


लेखक राष्ट्रीय उच्च अध्ययन संस्थान, बैंगलोर में सहायक फैलो हैं

युनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के ‘सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया’ के सहयोग से प्रकाशित। इस लेख को मूलरूप से अंग्रेजी में आप इस साइट पर पढ़ सकते हैं http :  //casi.ssc. upenn. edu

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