class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

उर्दू मीडिया : एक रपट से उठे गुबार

बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच कर रहे लिब्राहन आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट पेश करने पर दैनिक ‘हमारा समाज’ ने ‘एक रिपोर्ट, उम्र 17 साल’ के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि छह दिसम्बर 1992 को हिन्दू अतिवादियों के हाथों बाबरी मस्जिद की शहादत के मात्र नौ दिन बाद कायम किए गए इस आयोग को तीन महीने के अंदर रिपोर्ट पेश करने की हिदायत दी गई थी। लेकिन गनीमत है कि तीन महीने के बजाए 30 साल नहीं, बल्कि 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।

यदि 30 साल बाद भी यह आयोग अपनी रिपोर्ट पेश करता तो भी कोई आश्चर्य नहीं होता, इसलिए कि यह मामला मुस्लिम अल्पसंख्यक से जुड़ा हुआ था। अखबार आगे लिखता है कि यह यदि इंसाफ की ओर बढ़ता कदम है तो निश्चय ही हर ओर से इसका स्वागत किया जना चाहिए, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जैसे ही इस ओर कदम बढ़ेगा, भाजपा, आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और शिवसेना के अलावा स्वयं कांग्रेस की भूमिका भी घेरे में आएगी। इसलिए यह घटना जब हुई थी उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी और नरसिंह राव देश के प्रधानमंत्री थे।

दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने अपने ‘दस्तावेज’ को ‘लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट’ से प्रकाशित किया है। मासिक पत्रिका ‘अफकारे मिल्ली’ के सम्पादक डॉ. कासिम रसूल इलियास ने अपने लेख ‘क्या इस देरी की भरपाई हो सकेगी?’ के शीर्षक से लिखा है कि आयोग के वकील अनुपम गुप्ता ने लगभग दो वर्ष पूर्व आयोग से यह कह कर त्यागपत्र दे दिया था कि आयोग की रिपोर्ट जस्टिस लिब्राहन और इनको मिल कर तैयार करनी थी, लेकिन उन्हें इसमें शामिल नहीं किया जा रहा है।

अनुपम गुप्ता ने अपने एक बयान में जस्टिस लिब्राहन से अपने मतभेद भी जहिर किए थे। उनका कहना था कि आयोग की रिपोर्ट उस समय तक पूरी नहीं हो सकती, जब तक बाबरी मस्जिद की शहादत की पृष्ठभूमि में शामिल वैचारिक पहलू को स्पष्ट न किया जाए। उनका कहना था कि बाबरी मस्जिद की शहादत कोई अचानक पेश होने वाली घटना नहीं है, बल्कि इस षड्यंत्र के ताने-बाने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा से जाकर मिलते हैं, वह पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की भूमिका को भी स्पष्ट करना जरूरी समझते थे।

‘क्या दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा’ के शीर्षक से बाबरी मस्जिद मुकदमा लड़ रहे जफरयाब जिलानी एडवोकेट लिखते हैं कि इस रिपोर्ट से यह पता चलेगा कि मस्जिद की हिफाजत न कर पाने अथवा गिराने वालों के साथ षड्यंत्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव का क्या हाथ रहा है। रिपोर्ट में भाजपा के वरिष्ठ नेता एल. के. आडवाणी और तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की क्या भूमिका रही।

इसके अलावा भाजपा और इसके सहयोगी संगठन ने मस्जिद को शहीद करने में क्या गतिविधियां दिखाई, इस सब का विस्तृत विवरण जरूर होगा। रिपोर्ट में सरकारी अधिकारी भी सामने आएंगे। इसमें तत्कालीन फैजबाद के जिला मजिस्ट्रेट और एसएसपी मिस्टर राय की गतिविधि का भी विवरण होगा, क्योंकि एसएसपी मिस्टर राय आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल हो गए थे और इसके टिकट पर चुनाव लड़कर संसद पहुंचे थे।

‘लिब्राहन आयोग रिपोर्ट पुर फरेब (धोखा), बेसूद अमल (बेकार कार्य) है’ में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता वसी अहमद नोमानी लिखते हैं कि अब तक जो कुछ सामने आया है और रिपोर्ट के जो भी निष्कर्ष हों, इसकी बुनियाद पर किसी भी अपराधी को सजा नहीं दी जा सकती, केवल एक ‘सूचना’ है जो सरकार को दी गई है। किसी भी आयोग की रिपोर्ट किसी भी अपराधी को सजा नहीं दिला सकती है। इसकी हैसियत तो इतनी भी नहीं है कि किसी भी दूसरे मुकदमे में रिपोर्ट को ‘बहस’ अथवा हवाले के तौर पर इस्तेमाल करें।

सभी आयोगों का गठन समय गुजरने और मामले को टालने के लिए होता है। वरिष्ठ स्तंभकार महफजरुर रहमान अपने लेख ‘अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं’ में लिखते हैं कि मस्जिद की शहादत के दूसरे दिन मलबा साफ करके अस्थायी मंदिर का निर्माण राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद ही बना था और जहिर है यह नरसिंह राव की योजना का ही हिस्सा हो सकती थी।

30 मई 2003 को सीबीआई ने आडवाणी और अन्य आरोपियों के खिलाफ एक नई चाजर्शीट दाखिल करके इनके खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र का आरोप खुद ही अपने तौर पर वापस ले लिया है, अब इनके खिलाफ आईपीसी की धारा 120-बी के तहत कोई मुकदमा नहीं चलाया जएगा। लिब्राहन आयोग अपनी रिपोर्ट में आडवाणी आदि के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र के आरोप को भी चिह्न्ति करती है तो क्या सीबीआई और भारत सरकार इसका नोटिस लेगी? क्या सीबीआई एक और नई चार्ज शीट दाखिल करने की बात सोचेगी?

लेखक स्तंभकार हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:उर्दू मीडिया : एक रपट से उठे गुबार