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गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा दिव्य ज्ञान के स्रोतों को खोलने का पर्व है। अध्यात्म पिपासु अपनी साधना गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन से आरम्भ करते हैं। यह दिवस कृषकों के लिए भी बहुत महत्व रखता है, क्योंकि वर्षा,  अपनी कृपा बिखेरती है। वर्षा से खेतों में नवजीवन का संचार होता है। गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है, क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है। आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है।

गुरु अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे वह सद्मार्ग पर चल सके। साधना मार्ग के अवरोधों और बाधाओं के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है। कोई कितना भी जाज्वल्यमान क्यों न हो, उसे हमेशा ही गुरु के पथप्रदर्शन की आवश्यकता रहती है। अध्यात्म साधना के लिए गुरु का सहयोग बहुत जरूरी है। मौलिक क्षमता, प्रतिभा का अपना महत्व तो है, पर वे उपयुक्त परिस्थितियां पाकर ही उभरती हैं।

इस सहयोग को पाकर कितने ही व्यक्ति भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में योग्य, प्रतिभाशाली विद्वान बन पाएं हैं। पहाड़ों की ऊंची चढ़ाई के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है। यही प्रयोजन प्रगति के पथ पर चढ़ने वाले पथिक के लिए उसका मार्गदर्शन और साथी-सहयोगी पूरा करता है। इसी प्रयोजन को पूरा करने के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है। साधना क्षेत्र में प्रचंड पुरुषार्थी बु़द्ध कभी-कभी प्रकट होते हैं, जो बिना किसी की सहायता के ही आत्मजगृति में सफल हो जाते हैं।

लगन और भक्ति भावना के धनी रामकृष्ण परमहंस जैसे साधक का अवतरण कभी-कभी होता है जिनका अन्तप्रकाश स्वत: उनकी साधना का मार्गदर्शन करता है। समुद्र बनना कठिन है, पर उसका पानी लेकर आकाश में बादल की तरह उड़ते रहना सरल है। पारसमणि बनना कठिन है, पर लोहे को उसे छूकर सोना बन जाना सरल है। गुरु का वंदन करते हुए उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उपमा दी है। यह उपमा किसी और के लिए प्रयुक्त नहीं हो सकती, भले ही वह कितना ही सुयोग्य क्यों न हो।

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