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बजट अली का आगमन

सामान्य समय में अपन धर्मविहीन किस्म के इंसान हैं। शब्दकोष के अर्थ में निहायत सैक्युलर। संकट के समय अपने ओठ हनुमान चालीसा बुदबुदाते हैं। पांव खुद-ब-खुद हनुमान मंदिर की ओर रुख करते हैं। मन में जहां, फिल्मी या कभी टीवी की चड्डी-बनियान पहने सुन्दरियों के विज्ञापन उभरते थे, अब एक ही आवाज है- ‘जय जय बजरंग बली, तोड़ दुश्मन की नली।’

आज तक अपने पल्ले नहीं पड़ा है। आदमी के अंतर में एक आत्मा है, या निजी स्वार्थ का कीड़ा। इंसान से उल्लू सधे तो उसे पटाता है, नहीं तो भगवान को। यह दीगर है कि अपन इस मिशन में दोनों जगह मात खाए हुए हैं। हमें तो लगता है कि नाते-रिश्तेदारों से पानवाला अपना ज्यादा सगा है। वक्त-जरूरत, बेहिचक, सिगरेट-पान उधार तो देता रहता है।

उसी ने श्रीमान बजट अली के आगमन का हमें बताया था। अपनी रूह फना हो गई। तब से हम बेचैन हैं। हमें ख्याल आया कि सरकार सर्वशक्तिमान है। योजनाओं से ठगी की अनुमति उसने योजना आयोग को दे रखी है। वह पूरे मुल्क को सुनहरे ख्वाब दिखाकर ठगता है। एक सरकारी विभाग का जिम्मा मुद्रास्फीति के फरेबी आंकड़ों की ईजद है। हम सब उसके भुक्तभोगी हैं। इधर मुद्रास्फीति नीचे आती है, उधर कीमतें आमसान पर जाती हैं।

इसी स्टाइल में सरकार ने राष्ट्रीय गिरहकटी का परमिट वित्तमंत्री को सौंपा है। बजट सिर्फ आय-व्यय का अनुमान नहीं है, वह इस तथ्य का नायाब नमूना है कि कितने लोगों की, किस सफाई और नफासत से, वित्तमंत्री ने, जब कतरी कि तो उन्हें अहसास तक नहीं हुआ। उदाहरणार्थ, एक टैक्स है, जिसे ‘सेवा-कर’ कहते हैं। कोई रेस्त्रां में खाए तब भी यह लगता है, कोई फोन पर बतियाए तो भी। अपना दूरभाष पहले भी रामभरोसे था, आज भी है।

यही आलम सफर का है। हवाई जहाज पहले भी लेट लतीफ थे, आज भी हैं। क्या पता कल भी रहेंगे। सरकारी नजरिए से बस उनमें एक सुखद बदलाव है। सर्विस-कर बढ़ गया है। यों सरकार और सोच दो विरोधाभासी शब्द हैं। पर कौन जने शायद उसका ख्याल है कि ग्राहक की जेब पर भार बढ़े तो सेवाओं का स्तर खुद-ब-खुद ऊंचा उठता है। भारत में बिजली से अधिक मनमौजी कोई श है क्या? एक बार गई तो घंटों बाद पधारती है।

उस आती-जाती हस्ती का प्रति यूनिट दाम ही नहीं बढ़ा है, उसमें सर्विस टैक्स भी जुड़ा है। कोइ घनघोर आशावादी भी नहीं मानेगा कि इससे बिजली की आवारगी में रत्ती भर का अंतर आया है। बजरंग बली को हमने रात भर करवट बदल-बदल कर याद किया है। अब तो लगता है कि ‘बजट अली का यहां एक दिन मुयय्यन है, नींद क्यूं रात भर नहीं आती?’

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