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जननी का जीवन

जिस देश में प्रसव व गर्भ संबंधी जटिलताओं के कारण प्रत्येक सात मिनट में एक महिला की मृत्यु हो जाती हो, उस देश के बच्चों का भविष्य कैसा होगा? एक मां की मृत्यु से पूरा परिवार बिखर जाता है और इसका सबसे ज्यादा खामियाज बच्चों को भुगतना पड़ता है। बाल्यकाल में कुपोषण, कम उम्र में शादी, असमय मातृत्व और गर्भावस्था व प्रसव काल के समय अच्छी व मूलभूत सुविधाएं न मिलने के कारण साल में एक लाख महिलाएं मृत्यु की शिकार होती हैं।

सरकार मातृ मृत्यु दर में कमी लाना चाहती है। इसके लिए कई योजनाएं बनी हैं और विदेशों से सहायता भी मिल रही है, लेकिन माताओं और बच्चों की असमय मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। वजह यह है कि आज भी हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। मातृ मृत्यु दर में कमी लाने के लिए नीतियां और प्रणाली तो घोषित हुई हैं, लेकिन उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जागरूकता की कमी, सुविधाओं तक पहुंच न होना और सुविधाएं उपलब्ध कराने वालों के गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण इस पर काबू पाना कठिन हो रहा है।

गांवों में सुरक्षित प्रसव अथवा स्वच्छिक गर्भपात दोनों की ही समुचित व्यवस्था न होने, प्रशिक्षित डॉक्टरों व नर्सो की कमी, देख-रेख, खान-पान साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण 60 प्रतिशत महिलाएं अप्रशिक्षित दाइयों पर निर्भर हैं और प्राय: घर में ही बच्चे को जन्म देती हैं। प्रसव बिगड़ने पर जो महिलाएं अस्पताल जाती हैं, उन्हें भी प्राय: नजरअंदाज कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।

दुनिया में होने वाली कुल मातृ मृत्यु का 20 प्रतिशत अकेले भारत में है। जिस तरह मा और शिशु के स्वास्थ्य में संबंध है, उसी तरह मा और शिशु की मृत्यु दर में भी संबंध है। प्रसव के दौरान जिन बच्चों की मां की मृत्यु हो जाती है, उन बच्चों की दो साल के अंदर मृत्यु की आशंका अन्य बच्चों की अपेक्षा 3 से 10 गुना अधिक हो जाती है। बिना मां के एक वर्ष तक के बच्चों की मृत्यु की आशंका 7 गुना तक बढ़ जाती है।

दुखद स्थिति यह है कि अकाल के दौरान तो मौतें हम रोक पाए हैं, पर समय रहते ज्यादातर महिलाओं को आज भी मौत के मुंह से नहीं बचाया जा सकता। महिलाओं को परिवार नियोजन के आधुनिक, सुरक्षित और कारगर उपायों की जानकारी और समुचित डॉक्टरी सेवाएं मिल जाएं तो इनमें से कुछ नहीं, तो एक तिहाई महिलाओं का जीवन तो बचाया ही जा सकता है।

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