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अब पेटेंट हुई लखनऊ की अनूठी चिकनकारी हस्तकला

हस्तकला की अनूठी विधा में पारंगत लखनऊ के चिकनकारी उद्योग से जुड़े़ कारीगरों की कला पर अब डाका नहीं पड़ सकेगा और बौद्धिक सम्पदा अधिकार के तहत जीआईएक्ट (भौगोलिक उपदर्शन सूचकांक एक्ट) में चिकनकारी कला के पेटेंट की मंजूरी मिल गयी है।

नजकत और नफासत का शहर लखनऊ यूं तो नबावों की पुरानी दास्तान को अपने में सजोये हुए है और यहां जहां पुरानी ऐतिहासिक इमारतें तथा अवध की शाम की रौनक कमोवेश आज भी बरकरार है। वहीं,परम्परागत पुस्तैनी कला से तैयार चिकन के कपड़े देश और विदेश के पर्यटकों को अपनी तरफ ही खींच लेते है।

उद्यमिता एवं आर्थिक विकास केन्द्र (नीड) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अनिल कुमार सिंह ने बताया कि चिकनकारी की कला पेंटेंट हो जाने से इससे जुड़े कारीगरों को अधिक लाभ मिल सकेगा और अब इस कला को उत्तर प्रदेश की हस्तकला के रुप में जाना जायेगा।

पुराने लखनऊ की गलियों और कूचों में फैले इस कला के माहिर हजारों कारीगर सालों से इस कला के सहारे अपनी जीविका के साथ—साथ इस कला को सुदूर देश़-विदेश में फैलाने में कामयाब रहे हैं।

परम्परागत और सबसे पुरानी कला को जीवंत रखने के लिए लखनऊ के कारीगरों की चिकन कला को अब जीआई एक्ट के तहत लोक कला मानते हुए पेंटेंट कर दिया है। इस कला से जुड़े कारीगरों की आर्थिक एवं व्यवसायिक हितों की रक्षा होगी, जिससे वे बिचौलियों से भी बच सकेंगे।

इस केन्द्र के लगभग दो तीन सालों के अथक प्रयास के बाद चिकनकारी कला को डेढ़ माह पहले ही प्रदेश को यह पहला चिकनकारी पेटेंट का अधिकार मिला है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ सहित लगभग 13 जिलों में चिकनकारी का काम होता है और लखनऊ इसका केन्द्र है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस हस्तकला में लगभग 2.5 लाख कारीगर जुड़े हुए है, लेकिन सिंह का दावा है कि इस परम्परागत कला से लगभग सवा चार लाख चिकन कारीगर जुड़े हुए है और अब पेटेंट के बाद इसका सीधा लाभ इन कारीगरों को मिलेगा।

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  • Web Title:अब पेटेंट हुई लखनऊ की अनूठी चिकनकारी हस्तकला