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फिल्मी पर्दे पर बदलता मुसलमान

फिल्मी पर्दे पर बदलता मुसलमान

पिछले साल नवम्बर के महीने में 27 तारीख को अमेरिका में फिलाडेल्फिया की लोकेशन पर एक फिल्म क्रू ने आतंकवादी हमले का दृश्य फिल्माते हुए काम शुरू किया था। इस फिल्म के डायरेक्टर रेंसिल डिसिल्वा समेत तकरीबन सभी क्रू मेंबर मुंबई से वहां गए थे। लोकेशन पर जाने से ठीक पहले डायरेक्टर ने सीएनएन पर कई घंटों तक 26/11 के मुंबई के ताज होटल और अन्य ठिकानों पर आतंकवादी नरसंहार की खबरें देखीं थीं, जिनसे कई दिन तक मानो पूरी मुंबई की रफ्तार ही ठहर गई थी। ज़ाहिर है, इससे डायरेक्टर समेत तमाम क्रू मेंबरों के लिए हाई-डेफिनिशन कैमरों के आगे किसी आतंकवादी हमले का दृश्य फिल्माना बहुत ही कठिन और रोंगटे खड़े कर देने वाला काम हो गया था।

हम बात कर रहे हैं प्रोड्यूसर करन जौहर (धर्मा प्रोडक्शन्स) की आने वाली फिल्म ‘कुर्बान’ की, जिस पर 26/11 का असर पडम्ना एक तरह से लाजिमी हो गया था। फिल्म में नायक का किरदार जिसे सैफ अली खान ने अदा किया है। किरदार एक शहरी, पढ़े-लिखे और उदार मुसलमान युवक का है, जो एक हिंदू लड़की (करीना कपूर) से प्रेम करता है। लेकिन ऐसे ही एक आतंकवादी हमले की वजह से इस प्यार के अफसाने में खूब खलल पड़ गया है। डिसिल्वा कहते हैं, ‘मैं उस शूट को कभी नहीं भूल सकता।’

डिसिल्वा से हमारी मुलाकात इस शूटिंग के करीब छह महीने बाद उस एड एजेंसी में हुई थी, जिसके साथ वे बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर जुड़े हुए हैं। वे कहते हैं, ‘लेकिन अब जब मैं पीछे मुडम्कर देखता हूं, तो मुङो यकीन हो जाता है कि ये फिल्म, खासकर इसके तमाम किरदार आज पहले से कहीं ज्यादा मौजू हो गए हैं- क्योंकि पूरी दुनिया ने 26/11 को बेहद करीब से देख रखा है।’ और खास बात ये कि इस फिल्म को इस साल 26 नवम्बर की तारीख को ही थिएटरों में उतारने की तैयारी है, जो ईद के तत्काल बाद पड़ने वाली है।

बॉलीवुड का नया मुसलमान
‘कुर्बान’ का स्क्रीनप्ले डिसिल्वा ने ही लिखा है। हीरो उन आम मुसलमान लडम्कों जैसा ही है, जिनसे अक्सर वे मुबई में मिलते-जुलते रहते हैं। इसे आप ‘बॉलीवुड का नया मुसलमान’ नाम भी दे सकते हैं, जिसे हिंदी फिल्मी पर्दे के अब तक के मुसलमान किरदारों से अलग रख कर देखने की ज़्ारूरत है। ये हीरो न तो किसी नवाबी खानदान का है, जो हरदम हरम में इश्क फरमाते नज़र आता है, न कोई खान चाचा है, जो फैज टोपी पहन कर नेकी करने के लिए कहानी में ठूंस दिया गया है, न कोई पीडिम्त या जुनूनी जिहादी, और न ही कोई अंडरवर्ल्ड डॉन या उसका गुर्गा।

विडम्बना ये है कि जिस इंडस्ट्री में मुसलमान डायरेक्टरों, प्रोड्यूसरों, कंपोजरों, गीतकारों, एक्टरों और जूनियर आर्टिस्टों की तूती बोलती है, उसका कोई मुसलमान किरदार शायद ही ऊपर बताई गई लिस्ट से अलग हटकर हो। ऐसा एक नाम जो फौरन जेहन में आता है, वह है अस्सी के दशक में बनी सईद मिज़्रा की फिल्म ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ का, जिसमें गरीबी की दुनिया की हकीकत दिखाने के लिए मुसलमान स्टीरियोटाइप किरदार से किनारा किया गया था। ये  फिल्म मुंबई की गरीब बस्ती के ऐसे युवक की दास्तान है, जो अपने वजूद और रोजी को लेकर इतना मायूस और मजबूर हो जाता है कि समाज के प्रति अपना गुस्सा जताने के लिए जबरन वसूली और अन्य अपराधों को ही अपना पेशा बना लेता है। नागेश कुकुनूर की फिल्म ‘इकबाल’ में भी समाज के हाशिए पर पडम एक युवक अपनी मजहबी पहचान से बेपरवाह हो जाता है।
मगर साल 2009 रवायत बदलने वाला साबित हो सकता है। इस बार तीन अलग-अलग फिल्मों में- उमर, रिजवान और आसिफ के ऐसे किरदार नजर आने वाले हैं, जिन्हें आमतौर पर बॉलीवुड में राज, राहुल या प्रेम जैसे आम हिंदू किरदारों के तौर पर खान एक्टर आमिर, शाहरुख, सलमान, सैफ या फिर फरहान अख्तर लंबे अरसे से पूरी सहजता और कामयाबी के साथ निभाते आ रहे हैं। शाहरुख खान ने तो पहली बार 2007 में ‘चक दे इंडिया’ में मुसलमान हीरो कबीर खान का किरदार अदा किया था।

इस साल आने वाली बड़े बजट की तीन फिल्मों- ‘न्यूयॉर्क’, ‘कुर्बान’ और ‘माई नेम इज खान’ (जिसकी शूटिंग सान फ्रांसिस्को में चल रही है) में शहरी मुसलमान किरदार केंद्रीय भूमिका में हैं। तीनों न केवल किसी हालात के गुलाम या जुर्म की दुनिया में मसरूफ़ शख्स हैं, बल्कि ये रोमांटिक हीरो भी हैं, जो किसी आम भारतीय की तरह ज़िंदगी की हर खुशी और सहूलियत की तलाश में तमाम मुसीबतों से लोहा लेते रहते हैं। इनका मुसलमान होना केवल फिल्म के कथानक का हिस्सा है, न कि इनके किरदार का। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे ‘अमर अकबर एंथोनी’ के अकबर (षि कपूर) को जींस पहनाकर सूत्रधार की तरह पेश कर दिया गया हो। यानी कि बिग बजट बॉलीवुड ने लिबरल मुसलमान को शानदार सिनेमास्कोप में पहली बार अपनी बात कहते कहानी को आगे बढमते हुए दिखाया है।
‘न्यूयॉर्क’ से शुरू हुआ सिलसिला
यशराज बैनर तले बनी हाल में रिलीज़्ा कबीर खान की फिल्म ‘न्यूयॉर्क’ दिल्ली के लाजपत नगर से न्यूयॉर्क में पढम्ने आए कॉलेज स्टूडेंट उमर (नील नितिन मुकेश) की कहानी है, जो अमेरिका में ही पले-बढम्े अपने मुसलमान दोस्त सैम (जॉन अब्राहम) और माया (कैटरीना कैफ) के साथ अक्सर सेंट्रल पार्क और सोहो इलाके में मस्ती करने निकल पडम्ता है। कबीर खान कहते हैं, ‘हमारी फिल्मों में मुसलमान किरदारों को कैसे दिखाया जाता है, इसे मैं काफी ध्यान से नोट करता था। फिल्म में मुसलमाल किरदार के सामने आते ही हम समझ जाते हैं कि ये तो यूं ही है, और इसके साथ कुछ उल्टा-सीधा ही होने वाला है। या तो कोई इसे जुल्म का शिकार बनाएगा, या ये गद्दार निकलेगा और फिर जल्दी ही मार दिया जाएगा।’ लेकिन ‘न्यूयॉर्क’ में उमर और सैम का मुसलमानपन महज प्लॉट के तौर पर अहमियत रखता है, उनके किरदार को दिखाने के
लिए नहीं। ‘न्यूयॉर्क’ फिल्म का शुरुआती आधा हिस्सा कैम्पस पर फोकस है, जहां नाच-गाने-मस्ती के साथ दोस्तियां परवान चढम्ती हैं, जबकि बाकी हिस्से में अमेरिका के 9/11 आतंकवादी हमले का बैकग्राउंड आ जाता है। सैम को एफबीआई हिरासत में ले लेती है, और इस नाइंसाफी के खिलाफ उमर हिंसा के रास्ते पर चल पड़ता है। फिल्म का ये हिस्सा गाविन हुड की 9/11 के बाद हिरासत की पीडम पर 2007 में बनी हॉलीवुड फिल्म ‘रैंडिशन’ से किसी मायने में कम नहीं है। कबीर खान याद करते हैं, ‘9/11 के बाद मेरे नाम की वजह से मेरा यूएस वीज़ा कई बार नामंजूर कर दिया गया था। वे कहते थे कि मेरा लास्ट नेम ठीक नहीं है। इसने मुझे मुसलमान के तौर पर अपनी पहचान के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया।’ (संयोग से नील नितिन मुकेश को भी इस फिल्म की शूटिंग के लिए न्यूयॉर्क पहुंचने पर इमिग्रेशन अधिकारियों ने रोक लिया था, क्योंकि उन्हें यकीन ही नहीं आ रहा था कि कोई भारतीय इतना गोरा चिट्टा भी हो सकता है।)
‘माई नेम इज खान’ और नस्लवाद
‘माई नेम इजखान’, जिसका निर्देशन करन जौहर कर रहे हैं, संभवत: अगले साल 20 फरवरी को रिलीज होगी। ये रिजवान खान (शाहरुख खान) नामक शख्स की कहानी है, जिसे मुंबई के बोरीवली में उसकी मां ने पाल पोस कर बड़े किया है। वह बड़े होकर अमेरिका जाता है, जहां उसे मंदिरा (काजोल) से प्रेम हो जाता है। रिजवान एस्पर्जर सिंड्रोम (ऑटिज्म्म का एक प्रकार) का शिकार है, जिससे मरीज का सामाजिक व्यवहार गड़बड़ हो जाता है। 9/11 आतंकवादी हमले के बाद उसके रोग को गलती से संदिग्ध व्यवहार समझकर एफबीआई उसे गिरफ्तार कर लेती है। शाहरुख खान के शब्दों में,‘ये दुनिया भर में मौजूद आतंकवाद, नफरत और मारकाट जैसी विकलांगताओं के खिलाफ एक विकलांग शख्स की जंग की कहानी है।’

शायद यह सिर्फ संयोग नहीं है कि इन तीनों ही फिल्मों की पृष्ठभूमि अमेरिका या न्यूयॉर्क है। 11 सितंबर 2001 का आतंकवादी हमला सिनेमाई लिहाज से भी ऐसी ट्रेजेडी थी, जिसने सारी दुनिया में कई फिल्मों के लिए प्रेरणा का काम किया- और नस्ली पहचान के मुद्दे को सबके जेहन में ला दिया। भारत के फिल्म निर्माता तो इस मौके का इस्तेमाल करने में सात साल पिछडम् चुके हैं, बावजूद इसके कि हमारा हाल का इतिहास काफी हद तक सांप्रदायिक हिंसा और भेदभाव से ही सना और बना हुआ है।

क्या ऐसा होने की वजह यह भी है कि जब कोई कहानी अमेरिका के संदर्भ में कही जाती है, तो मुसलमानों को जिस ढंग से पेश किया जाता है, उसे एक ग्लोबल और व्यापक संदर्भ में देखा जाता है और फिल्म बनाने वालों को स्थानीय भारतीय समुदाय की भावनाओं को आहत किए बगैर अपनी बात कहने की छूट मिल जाती है? कबीर खान का जवाब है, ‘उस वक्त मैं अफगानिस्तान में था, और जब 9/11 के बाद वहां अमेरिका ने बम बरसाने शुरू कर दिए, तो मैंने गौर से देखा कि किस तरह आतंक के खिलाफ जंग के नाम पर बर्बर कार्रवाइयों को अंजाम दिया गया। आगे चलकर जब आदित्य चोपड़ा ने मुझे न्यूयॉर्क के तीन लड़कों की कहानी बताई, तो मैंने इसे 9/11 के बाद के अमेरिका पर फिल्म का आधार बनाने का फैसला कर लिया।’ वे चाहते हैं कि फिल्म ‘न्यूयॉर्क’ को लोग इंसान की फिल्म के तौर पर देखें, न कि 9/11 की फिल्म की तरह। कबीर खान के शब्दों में, ‘किसी इंसानी कहानी में सियासी मतलब ढूंढने की जरूरत नहीं है।’

कुर्बान : मुसलमान की सचकही
कबीर खान कुछ भी कहें, मगर लगता है ‘कुर्बान’ के डायरेक्टर डिसिल्वा का मकसद न्यूट्रल रहने का नहीं था। वे कहते हैं, ‘नस्ली भेदभाव और आतंकवाद जैसे मसलों पर आप बिल्कुल निष्पक्ष कैसे रह सकते हैं? हो सकता है बहुत से गोरे लोगों को मेरी फिल्म पसंद न आए। मगर वे यहां उस मुसलमान की बात सुनेंगे, जो  कट्टर इस्लाम के खिलाफ राय रखता है, और जिसे आम तौर पर कभी भी फिल्म में सही ढंग से नुमाइंदगी नहीं दी जाती।’ डिसिल्वा की फिल्म एक सियासी रूमानी थ्रिलर है, जिसके एक दृश्य में सैफ अली खान के किरदार की उग्र इस्लाम के पैरोकार दूसरे शख्स से जबर्दस्त गर्मागर्मी हो जाती है।

अमेरिकी बैकड्रॉप जहां एक तरफ विषयवस्तु को विश्वव्यापक बनाता है, वहीं दूसरी तरफ इसकी कुछ हदें भी हैं। जैसे कि भारत के संदर्भ में खास मुद्दों को बगैर छुए निकल जाना। चेन्नै के इस्लामी विद्वान सैयद अली मुज्म्तबा कहते हैं कि ‘न्यूयॉर्क’ जैसी फिल्म एनआरआई ऑडिएंस को कहीं ज्यादा अपील करेगी, क्योंकि भारत में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान तो शिक्षा और रोजगार जैसे बेहद बुनियादी लेवल पर भेदभाव से रूबरू होते हैं।

हाल में सन 2007 की पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ में स्थानीयता और विश्वव्यापकता का मेल देखने को मिला था, जिसकी पृष्ठभूमि 9/11 के बाद के अमेरिका और पाकिस्तान की थी।  ‘न्यूयॉर्क’ की तरह ‘खुदा के लिए’ में भी मुसलमानों को नाजायज तौर पर हिरासत में लेने और पाकिस्तान की सोसायटी के ढोंग, भेदभाव और पिछडम्ेपन को मुद्दा बनाया गया है। इसमें नसीरुद्दीन शाह का भी एक किरदार है। नसीर कहते हैं, ‘मैं इस फिल्म में इसीलिए काम करने को तैयार हुआ कि मुझे कट्टर इस्लाम का विरोध करने वाले एक मौलवी का रोल दिया गया।
 

पर्दे पर कुछ, पीछे कुछ और
पचास के दशक के बाद से लेकर अब तक हिंदी फिल्मों के हर दौर में (पर्दे पर और पर्दे के पीछे) मुसलमानों के अलग-अलग स्टीरियोटाइप सामने आते रहे हैं। हिंदी सिनेमा के साथ मुसलमानों का सबसे गहरा और सार्थक रिश्ता तो शायरों और स्क्रिप्ट राइटरों का रहा है। पचास और साठ के दशक में यूपी और पंजाब के कई नौजवान शायरों और राइटरों ने अपने तजुर्बो और गीतों से हिंदी फिल्मों में गहरी जान डाल दी थी। इनमें आप नौशाद, मज़्ारूह सुल्तानपुरी और साहिर लुधियानवी को शुमार कर सकते हैं। लेकिन पर्दे पर उनको आम तौर पर ऐय्याश नवाबों और पियक्कड़ शायरों के स्टीरियोटाइप रोल में ही दिखाया जाता रहा।

सत्तर के दशक में जब बॉलीवुड में बच्चन नौजवान हुआ करते थे, तो ज्यादातर फिल्मों में मुसलमान किरदारों को शेरवानी पहनकर पान चबाते और बात-बात पर गालिब के शेर पढम्ते हुए ही पेश किया जाता था। इनमें ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘शोले’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं। फिर अस्सी और नब्बे के दशक में मुसलमान स्क्रीन पर डॉन, उसका गुर्गा, शिकार या आम अपराधी बनकर नमूदर होने लगा, और ज़ुर्म और अंडरवर्ल्ड की कहानी ज़्ाोर मारने लगी। पिछले साल बनी राजकुमार गुप्ता की फिल्म ‘आमिर’ में तो पीडिम्त मुसलमान की इकतरफा दास्तान ही पेश कर दी गई। यहां तक कि डैनी बोएल ने भी ‘स्लमडॉग मिलैनियर’ में बॉलीवुड के औज़ार का ही इस्तेमाल कर लिया। हिंदी सिने-इतिहासकार और डॉक्युमेंट्री-मेकर नसरीन मुन्नी कबीर के शब्दों में, ‘मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकती कि हिंदी फिल्मों में मुसलमान को किसी बिगड़ैल किरदार या दहशतगर्द के अलावा भी कुछ दिखाया जाता है। यहां मुसलमान किरदार अब भी कमोबेश वैसे के वैसे हैं।’

नसरीन का कहना गलत नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि क्या आने वाली तीन फिल्में मुसलमान के सालों साल पुराने स्टीरियोटाइप रोल को बदलने में कामयाब होंगी? या फिर वे भी एक वक्ती चमक बिखेरकर उसी स्याह दौर के चलते रहने की तसदीक करने वाली साबित होंगी? बहरहाल,  कबीर खान तो कहते हैं कि उन्होंने पुराना सांचा तोड़ डाला है। वे पूछ रहे हैं, ‘हमारी फिल्मों में आखिर कबीर नाम का हीरो कब आएगा, जिसके मजहब का कहानी में उसकी मौजूदगी से कोई मतलब नहीं रहेगा? हां, मैं मानता हूं कि मैं भी अपनी फिल्म के किरदार उमर के मुसलमान होने की पूरी तरह अनदेखी नहीं कर पाया।’पिछले साल नवम्बर के महीने में 27 तारीख को अमेरिका में फिलाडेल्फिया की लोकेशन पर एक फिल्म क्रू ने आतंकवादी हमले का दृश्य फिल्माते हुए काम शुरू किया था। इस फिल्म के डायरेक्टर रेंसिल डिसिल्वा समेत तकरीबन सभी क्रू मेंबर मुंबई से वहां गए थे। लोकेशन पर जाने से ठीक पहले डायरेक्टर ने सीएनएन पर कई घंटों तक 26/11 के मुंबई के ताज होटल और अन्य ठिकानों पर आतंकवादी नरसंहार की खबरें देखीं थीं, जिनसे कई दिन तक मानो पूरी मुंबई की रफ्तार ही ठहर गई थी। ज़ाहिर है, इससे डायरेक्टर समेत तमाम क्रू मेंबरों के लिए हाई-डेफिनिशन कैमरों के आगे किसी आतंकवादी हमले का दृश्य फिल्माना बहुत ही कठिन और रोंगटे खड़े कर देने वाला काम हो गया था।

हम बात कर रहे हैं प्रोड्यूसर करन जौहर (धर्मा प्रोडक्शन्स) की आने वाली फिल्म ‘कुर्बान’ की, जिस पर 26/11 का असर पडम्ना एक तरह से लाजिमी हो गया था। फिल्म में नायक का किरदार जिसे सैफ अली खान ने अदा किया है। किरदार एक शहरी, पढ़े-लिखे और उदार मुसलमान युवक का है, जो एक हिंदू लड़की (करीना कपूर) से प्रेम करता है। लेकिन ऐसे ही एक आतंकवादी हमले की वजह से इस प्यार के अफसाने में खूब खलल पड़ गया है। डिसिल्वा कहते हैं, ‘मैं उस शूट को कभी नहीं भूल सकता।’

डिसिल्वा से हमारी मुलाकात इस शूटिंग के करीब छह महीने बाद उस एड एजेंसी में हुई थी, जिसके साथ वे बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर जुड़े हुए हैं। वे कहते हैं, ‘लेकिन अब जब मैं पीछे मुडम्कर देखता हूं, तो मुङो यकीन हो जाता है कि ये फिल्म, खासकर इसके तमाम किरदार आज पहले से कहीं ज्यादा मौजू हो गए हैं- क्योंकि पूरी दुनिया ने 26/11 को बेहद करीब से देख रखा है।’ और खास बात ये कि इस फिल्म को इस साल 26 नवम्बर की तारीख को ही थिएटरों में उतारने की तैयारी है, जो ईद के तत्काल बाद पड़ने वाली है।

बॉलीवुड का नया मुसलमान
‘कुर्बान’ का स्क्रीनप्ले डिसिल्वा ने ही लिखा है। हीरो उन आम मुसलमान लडम्कों जैसा ही है, जिनसे अक्सर वे मुबई में मिलते-जुलते रहते हैं। इसे आप ‘बॉलीवुड का नया मुसलमान’ नाम भी दे सकते हैं, जिसे हिंदी फिल्मी पर्दे के अब तक के मुसलमान किरदारों से अलग रख कर देखने की ज़्ारूरत है। ये हीरो न तो किसी नवाबी खानदान का है, जो हरदम हरम में इश्क फरमाते नज़र आता है, न कोई खान चाचा है, जो फैज टोपी पहन कर नेकी करने के लिए कहानी में ठूंस दिया गया है, न कोई पीडिम्त या जुनूनी जिहादी, और न ही कोई अंडरवर्ल्ड डॉन या उसका गुर्गा।

विडम्बना ये है कि जिस इंडस्ट्री में मुसलमान डायरेक्टरों, प्रोड्यूसरों, कंपोजरों, गीतकारों, एक्टरों और जूनियर आर्टिस्टों की तूती बोलती है, उसका कोई मुसलमान किरदार शायद ही ऊपर बताई गई लिस्ट से अलग हटकर हो। ऐसा एक नाम जो फौरन जेहन में आता है, वह है अस्सी के दशक में बनी सईद मिज़्रा की फिल्म ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ का, जिसमें गरीबी की दुनिया की हकीकत दिखाने के लिए मुसलमान स्टीरियोटाइप किरदार से किनारा किया गया था। ये  फिल्म मुंबई की गरीब बस्ती के ऐसे युवक की दास्तान है, जो अपने वजूद और रोजी को लेकर इतना मायूस और मजबूर हो जाता है कि समाज के प्रति अपना गुस्सा जताने के लिए जबरन वसूली और अन्य अपराधों को ही अपना पेशा बना लेता है। नागेश कुकुनूर की फिल्म ‘इकबाल’ में भी समाज के हाशिए पर पडम एक युवक अपनी मजहबी पहचान से बेपरवाह हो जाता है।
मगर साल 2009 रवायत बदलने वाला साबित हो सकता है। इस बार तीन अलग-अलग फिल्मों में- उमर, रिजवान और आसिफ के ऐसे किरदार नजर आने वाले हैं, जिन्हें आमतौर पर बॉलीवुड में राज, राहुल या प्रेम जैसे आम हिंदू किरदारों के तौर पर खान एक्टर आमिर, शाहरुख, सलमान, सैफ या फिर फरहान अख्तर लंबे अरसे से पूरी सहजता और कामयाबी के साथ निभाते आ रहे हैं। शाहरुख खान ने तो पहली बार 2007 में ‘चक दे इंडिया’ में मुसलमान हीरो कबीर खान का किरदार अदा किया था।

इस साल आने वाली बड़े बजट की तीन फिल्मों- ‘न्यूयॉर्क’, ‘कुर्बान’ और ‘माई नेम इज खान’ (जिसकी शूटिंग सान फ्रांसिस्को में चल रही है) में शहरी मुसलमान किरदार केंद्रीय भूमिका में हैं। तीनों न केवल किसी हालात के गुलाम या जुर्म की दुनिया में मसरूफ़ शख्स हैं, बल्कि ये रोमांटिक हीरो भी हैं, जो किसी आम भारतीय की तरह ज़िंदगी की हर खुशी और सहूलियत की तलाश में तमाम मुसीबतों से लोहा लेते रहते हैं। इनका मुसलमान होना केवल फिल्म के कथानक का हिस्सा है, न कि इनके किरदार का। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे ‘अमर अकबर एंथोनी’ के अकबर (षि कपूर) को जींस पहनाकर सूत्रधार की तरह पेश कर दिया गया हो। यानी कि बिग बजट बॉलीवुड ने लिबरल मुसलमान को शानदार सिनेमास्कोप में पहली बार अपनी बात कहते कहानी को आगे बढमते हुए दिखाया है।
‘न्यूयॉर्क’ से शुरू हुआ सिलसिला
यशराज बैनर तले बनी हाल में रिलीज़्ा कबीर खान की फिल्म ‘न्यूयॉर्क’ दिल्ली के लाजपत नगर से न्यूयॉर्क में पढम्ने आए कॉलेज स्टूडेंट उमर (नील नितिन मुकेश) की कहानी है, जो अमेरिका में ही पले-बढम्े अपने मुसलमान दोस्त सैम (जॉन अब्राहम) और माया (कैटरीना कैफ) के साथ अक्सर सेंट्रल पार्क और सोहो इलाके में मस्ती करने निकल पडम्ता है। कबीर खान कहते हैं, ‘हमारी फिल्मों में मुसलमान किरदारों को कैसे दिखाया जाता है, इसे मैं काफी ध्यान से नोट करता था। फिल्म में मुसलमाल किरदार के सामने आते ही हम समझ जाते हैं कि ये तो यूं ही है, और इसके साथ कुछ उल्टा-सीधा ही होने वाला है। या तो कोई इसे जुल्म का शिकार बनाएगा, या ये गद्दार निकलेगा और फिर जल्दी ही मार दिया जाएगा।’ लेकिन ‘न्यूयॉर्क’ में उमर और सैम का मुसलमानपन महज प्लॉट के तौर पर अहमियत रखता है, उनके किरदार को दिखाने के
लिए नहीं। ‘न्यूयॉर्क’ फिल्म का शुरुआती आधा हिस्सा कैम्पस पर फोकस है, जहां नाच-गाने-मस्ती के साथ दोस्तियां परवान चढम्ती हैं, जबकि बाकी हिस्से में अमेरिका के 9/11 आतंकवादी हमले का बैकग्राउंड आ जाता है। सैम को एफबीआई हिरासत में ले लेती है, और इस नाइंसाफी के खिलाफ उमर हिंसा के रास्ते पर चल पड़ता है। फिल्म का ये हिस्सा गाविन हुड की 9/11 के बाद हिरासत की पीडम पर 2007 में बनी हॉलीवुड फिल्म ‘रैंडिशन’ से किसी मायने में कम नहीं है। कबीर खान याद करते हैं, ‘9/11 के बाद मेरे नाम की वजह से मेरा यूएस वीज़ा कई बार नामंजूर कर दिया गया था। वे कहते थे कि मेरा लास्ट नेम ठीक नहीं है। इसने मुझे मुसलमान के तौर पर अपनी पहचान के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया।’ (संयोग से नील नितिन मुकेश को भी इस फिल्म की शूटिंग के लिए न्यूयॉर्क पहुंचने पर इमिग्रेशन अधिकारियों ने रोक लिया था, क्योंकि उन्हें यकीन ही नहीं आ रहा था कि कोई भारतीय इतना गोरा चिट्टा भी हो सकता है।)
‘माई नेम इज खान’ और नस्लवाद
‘माई नेम इजखान’, जिसका निर्देशन करन जौहर कर रहे हैं, संभवत: अगले साल 20 फरवरी को रिलीज होगी। ये रिजवान खान (शाहरुख खान) नामक शख्स की कहानी है, जिसे मुंबई के बोरीवली में उसकी मां ने पाल पोस कर बड़े किया है। वह बड़े होकर अमेरिका जाता है, जहां उसे मंदिरा (काजोल) से प्रेम हो जाता है। रिजवान एस्पर्जर सिंड्रोम (ऑटिज्म्म का एक प्रकार) का शिकार है, जिससे मरीज का सामाजिक व्यवहार गड़बड़ हो जाता है। 9/11 आतंकवादी हमले के बाद उसके रोग को गलती से संदिग्ध व्यवहार समझकर एफबीआई उसे गिरफ्तार कर लेती है। शाहरुख खान के शब्दों में,‘ये दुनिया भर में मौजूद आतंकवाद, नफरत और मारकाट जैसी विकलांगताओं के खिलाफ एक विकलांग शख्स की जंग की कहानी है।’

शायद यह सिर्फ संयोग नहीं है कि इन तीनों ही फिल्मों की पृष्ठभूमि अमेरिका या न्यूयॉर्क है। 11 सितंबर 2001 का आतंकवादी हमला सिनेमाई लिहाज से भी ऐसी ट्रेजेडी थी, जिसने सारी दुनिया में कई फिल्मों के लिए प्रेरणा का काम किया- और नस्ली पहचान के मुद्दे को सबके जेहन में ला दिया। भारत के फिल्म निर्माता तो इस मौके का इस्तेमाल करने में सात साल पिछडम् चुके हैं, बावजूद इसके कि हमारा हाल का इतिहास काफी हद तक सांप्रदायिक हिंसा और भेदभाव से ही सना और बना हुआ है।

क्या ऐसा होने की वजह यह भी है कि जब कोई कहानी अमेरिका के संदर्भ में कही जाती है, तो मुसलमानों को जिस ढंग से पेश किया जाता है, उसे एक ग्लोबल और व्यापक संदर्भ में देखा जाता है और फिल्म बनाने वालों को स्थानीय भारतीय समुदाय की भावनाओं को आहत किए बगैर अपनी बात कहने की छूट मिल जाती है? कबीर खान का जवाब है, ‘उस वक्त मैं अफगानिस्तान में था, और जब 9/11 के बाद वहां अमेरिका ने बम बरसाने शुरू कर दिए, तो मैंने गौर से देखा कि किस तरह आतंक के खिलाफ जंग के नाम पर बर्बर कार्रवाइयों को अंजाम दिया गया। आगे चलकर जब आदित्य चोपड़ा ने मुझे न्यूयॉर्क के तीन लड़कों की कहानी बताई, तो मैंने इसे 9/11 के बाद के अमेरिका पर फिल्म का आधार बनाने का फैसला कर लिया।’ वे चाहते हैं कि फिल्म ‘न्यूयॉर्क’ को लोग इंसान की फिल्म के तौर पर देखें, न कि 9/11 की फिल्म की तरह। कबीर खान के शब्दों में, ‘किसी इंसानी कहानी में सियासी मतलब ढूंढने की जरूरत नहीं है।’

कुर्बान : मुसलमान की सचकही
कबीर खान कुछ भी कहें, मगर लगता है ‘कुर्बान’ के डायरेक्टर डिसिल्वा का मकसद न्यूट्रल रहने का नहीं था। वे कहते हैं, ‘नस्ली भेदभाव और आतंकवाद जैसे मसलों पर आप बिल्कुल निष्पक्ष कैसे रह सकते हैं? हो सकता है बहुत से गोरे लोगों को मेरी फिल्म पसंद न आए। मगर वे यहां उस मुसलमान की बात सुनेंगे, जो  कट्टर इस्लाम के खिलाफ राय रखता है, और जिसे आम तौर पर कभी भी फिल्म में सही ढंग से नुमाइंदगी नहीं दी जाती।’ डिसिल्वा की फिल्म एक सियासी रूमानी थ्रिलर है, जिसके एक दृश्य में सैफ अली खान के किरदार की उग्र इस्लाम के पैरोकार दूसरे शख्स से जबर्दस्त गर्मागर्मी हो जाती है।

अमेरिकी बैकड्रॉप जहां एक तरफ विषयवस्तु को विश्वव्यापक बनाता है, वहीं दूसरी तरफ इसकी कुछ हदें भी हैं। जैसे कि भारत के संदर्भ में खास मुद्दों को बगैर छुए निकल जाना। चेन्नै के इस्लामी विद्वान सैयद अली मुज्म्तबा कहते हैं कि ‘न्यूयॉर्क’ जैसी फिल्म एनआरआई ऑडिएंस को कहीं ज्यादा अपील करेगी, क्योंकि भारत में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान तो शिक्षा और रोजगार जैसे बेहद बुनियादी लेवल पर भेदभाव से रूबरू होते हैं।

हाल में सन 2007 की पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ में स्थानीयता और विश्वव्यापकता का मेल देखने को मिला था, जिसकी पृष्ठभूमि 9/11 के बाद के अमेरिका और पाकिस्तान की थी।  ‘न्यूयॉर्क’ की तरह ‘खुदा के लिए’ में भी मुसलमानों को नाजायज तौर पर हिरासत में लेने और पाकिस्तान की सोसायटी के ढोंग, भेदभाव और पिछडम्ेपन को मुद्दा बनाया गया है। इसमें नसीरुद्दीन शाह का भी एक किरदार है। नसीर कहते हैं, ‘मैं इस फिल्म में इसीलिए काम करने को तैयार हुआ कि मुझे कट्टर इस्लाम का विरोध करने वाले एक मौलवी का रोल दिया गया।
 

पर्दे पर कुछ, पीछे कुछ और
पचास के दशक के बाद से लेकर अब तक हिंदी फिल्मों के हर दौर में (पर्दे पर और पर्दे के पीछे) मुसलमानों के अलग-अलग स्टीरियोटाइप सामने आते रहे हैं। हिंदी सिनेमा के साथ मुसलमानों का सबसे गहरा और सार्थक रिश्ता तो शायरों और स्क्रिप्ट राइटरों का रहा है। पचास और साठ के दशक में यूपी और पंजाब के कई नौजवान शायरों और राइटरों ने अपने तजुर्बो और गीतों से हिंदी फिल्मों में गहरी जान डाल दी थी। इनमें आप नौशाद, मज़्ारूह सुल्तानपुरी और साहिर लुधियानवी को शुमार कर सकते हैं। लेकिन पर्दे पर उनको आम तौर पर ऐय्याश नवाबों और पियक्कड़ शायरों के स्टीरियोटाइप रोल में ही दिखाया जाता रहा।

सत्तर के दशक में जब बॉलीवुड में बच्चन नौजवान हुआ करते थे, तो ज्यादातर फिल्मों में मुसलमान किरदारों को शेरवानी पहनकर पान चबाते और बात-बात पर गालिब के शेर पढम्ते हुए ही पेश किया जाता था। इनमें ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘शोले’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं। फिर अस्सी और नब्बे के दशक में मुसलमान स्क्रीन पर डॉन, उसका गुर्गा, शिकार या आम अपराधी बनकर नमूदर होने लगा, और ज़ुर्म और अंडरवर्ल्ड की कहानी ज़्ाोर मारने लगी। पिछले साल बनी राजकुमार गुप्ता की फिल्म ‘आमिर’ में तो पीडिम्त मुसलमान की इकतरफा दास्तान ही पेश कर दी गई। यहां तक कि डैनी बोएल ने भी ‘स्लमडॉग मिलैनियर’ में बॉलीवुड के औज़ार का ही इस्तेमाल कर लिया। हिंदी सिने-इतिहासकार और डॉक्युमेंट्री-मेकर नसरीन मुन्नी कबीर के शब्दों में, ‘मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकती कि हिंदी फिल्मों में मुसलमान को किसी बिगड़ैल किरदार या दहशतगर्द के अलावा भी कुछ दिखाया जाता है। यहां मुसलमान किरदार अब भी कमोबेश वैसे के वैसे हैं।’

नसरीन का कहना गलत नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि क्या आने वाली तीन फिल्में मुसलमान के सालों साल पुराने स्टीरियोटाइप रोल को बदलने में कामयाब होंगी? या फिर वे भी एक वक्ती चमक बिखेरकर उसी स्याह दौर के चलते रहने की तसदीक करने वाली साबित होंगी? बहरहाल,  कबीर खान तो कहते हैं कि उन्होंने पुराना सांचा तोड़ डाला है। वे पूछ रहे हैं, ‘हमारी फिल्मों में आखिर कबीर नाम का हीरो कब आएगा, जिसके मजहब का कहानी में उसकी मौजूदगी से कोई मतलब नहीं रहेगा? हां, मैं मानता हूं कि मैं भी अपनी फिल्म के किरदार उमर के मुसलमान होने की पूरी तरह अनदेखी नहीं कर पाया।’

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  • Web Title:फिल्मी पर्दे पर बदलता मुसलमान