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महत्वपूर्ण क्या, स्वस्थ संस्थान या करिश्माती प्रबंधक?

पचास से ऊपर की उम्र वाले हिन्दुस्तानियों को ‘महापुरुषों के मनोविनोद’ नामक एक पुराने लोकप्रिय कलेण्डरी चित्र की जरूर याद होगी जिसमें गावतकिए पर तनिक उठगे हुए देश के बड़े-बड़े नेता हसते हुए परस्पर बतिया रहे हैं। कलकत्ता के एक अखबार में बताया गया कि मुह में चुरुट दबाए वित्तमंत्री प्रणव बाबू ने प्रिय पत्रकारों से बजट पर बतियाते हुए, आगामी (बजट) भाषण में हस्बेबामूल कविता-पंक्तिया शामिल करने के बारे में पूछे जाने पर शरारतन टिप्पणी की, क्या टैगोर ने बजट पर कुछ खास लिखा है? महापुरुषों के बीच इस चुहल पर बड़े ठहाके लगे। मीडिया में रेल-बजट को लेकर भी इसी किस्म की चुहल और तंजभरी क्षेत्रवादी टिप्पणिया देखने को मिलीं। अलबत्ता इस बात पर बहुत कम चिंता या बहसें सामने आईं कि जिन संस्थाओं और उनके कर्मियों पर अंततः इन लुभावनी योजनाओं को साकार करने की जिम्मेदारी डाली जा रही है, वे भीतरखाने कितनी खस्ताहाल हैं। कौन नहीं जनता कि सरकार जिसकी हो, ज्यादातर सरकारी उपक्रमों में वर्षो से मेरिट और कार्यकुशलता की बजाए क्षेत्रवादी, जातिवादी आधारों पर नियुक्तियां की जाती रही हैं, और उनकी कार्यपद्धति की समीक्षा तथा चुस्त निगरानी भी शायद ही नियमित तौर से होती रही हो। रेलवे से लेकर स्वास्थ्य तथा शिक्षा तक के क्षेत्रों में आई.एम.सी., यू.जी.सी. या ए.आई.सी.टी. ई सरीखी ज्यादातर नियामक संस्थाए आज कमोबेश न्यस्त स्वार्थो के हितों की चौकीदार ही रह गई हैं।

शिकागो विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रघुराज राजन के अनुसार नई अर्थव्यवस्था ने भी भारत में प्रतिस्पर्धा के स्वस्थ प्रतिमान कायम करने की बजाए व्यवस्था को चंद ताकतवर धड़ों के गुटों (औलीगार्की) की थाती बनी रहने दिया है। पुरानी शली का लायसेंस-परमिट-कोटा मूलक भ्रष्टाचार भले ही खत्म हो गया हो, पर अब उसकी जगह चंद नए गुटों के हित-स्वार्थो पर टिकी सहमतियों और रेवड़ियों की बंदरबाट ने ले ली है। हर कहीं सार्वजनिक संस्थाए जंग खा रही हैं। अतः आम आदमी को ऐसे चतुर राजनेताओं की जरूरत पड़ती रहती है, जो उन्हें जसे भी हो व्यवस्था की जटिल वतरणी पार करा सकें। राजनेताओं को चंद भ्रष्ट उद्योगपति चाहिए, जो उन्हें अपने इन गरीब वोट बैंकों को फौरी राहत देने वाले कदम उठाने और चुनाव लड़ने में मदद करें, और उद्योगपतियों को भी ऐसे राजनेता चाहिए, जिनकी छत्रछाया में वे नियमों को परे कर जजर्र सार्वजनिक संस्थानों के संसाधनों तथा ठेकों को लगातार लूट सकें। लिहाज आम जन, उद्यमियों और नेताओं की एक अजीब परस्पर निर्भर व्यवस्था सरकारी अमानतें परस्पर बाट रही है कहीं सर्वशिक्षा अभियान की तहत कई निजी संस्थानों को कम दामों पर शिक्षण संस्थाओं की जमीनें कायदे-कानून छोड़ कर उपलब्ध कराकर तथा टीचर्स ट्रेनिंग कोर्स की मार्फत चादी काटने का मौका दिया जा रहा है, और कहीं विशेष औद्योगिक जोन बनाने के नाम पर कृषियोग्य जमीनें लूटने का। टेलीकॉम के (स्पेक्ट्रम) ठेके निजी सार्वजनिक भागीदारी के नाम पर मिट्टी के मोल बाटे गए हैं, और दो औद्योगिक घरानों की लड़ाई में फस कर देश की प्राकृतिक गैस का समुचित वितरण बार-बार ठप्प हुआ है। पर आम जन रेलवे, स्वास्थ्य कल्याण और शिक्षा जसे नौकरी-बहुल सार्वजनिक क्षेत्रों में जति-धर्म और नेताजी की सरमाएदारी के आधार पर बटती नौकरियों पर आखें गड़ाए खामोश है।

इसमें शक नहीं कि इस तरह के यारबाश पूजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) ने विगत में विकास की ओर बढ़ते वक्त पश्चिमी देशों को भी ऐसी ही स्थितियों से गुजरा था। लेकिन अंततः वे देश जैसे ही तरक्की कर पाए, उन्होंने बेहतर कानूनों और पारदर्शी सूचनाओं द्वारा न्यस्त स्वार्थो का आपराधिक ताना-बना पूरी तरह से तोड़ा, और सच्ची, पारदर्शी प्रतिस्पर्धा का हर क्षेत्र में वातावरण बनाया। ताकि मेहनती, कर्मठ और ईमानदार लोग सफल हो पाएं, तिकड़मी-अकुशल, सिफारिशी और भ्रष्ट लोग नहीं। हमारे यहा कई बार लोग तर्क देने लगते हैं कि किस तरह एक अकेले शेषन ने चुनाव आयोग का कील-काटा दुरुस्त कर दिया; एक ही श्रीधरन ने मेट्रो का लगभग असंभव सपना साकार कर दिया और एक कुरियन ने श्वेत-क्रांति ला दी है। इसलिए, संस्थानों से ज्यादह महत्व एक दृढ़ निश्चयी करिश्माती नेता का है। निश्चय ही इन तीनों ने शीर्ष नेतृत्व और कुशल संचालन के उजले उदाहरण पेश किए हैं। लेकिन सतत तरक्की हजारों क्षेत्रों में निरंतर और समवेत बदलाव लाने और ढाचे की लगातार पुनर्रचना की माग करती है। और उसके लिए कारगर नियामक संस्थाए बहुत जरूरी हैं। उनकी चौकसी ही सुनिश्चित कर सकती है कि नलों में पानी, बल्बों में बिजली आने और राशन की दूकानों में राशन, कक्षाओं में टीचरों, सरकारी हस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सो और सरकारी दफ्तरों तथा अदालतों में कार्यदक्ष बाबुओं, वकीलों और न्यायधीशों की निरंतर मौजूदगी की गारंटी हो। सचमुच में सफल और कारगर संस्थानों के बूते ही दमदार सरकारें और अर्थ-व्यवस्थाएं बनती हैं। एक महानायक या एकाध ड्रीम-बजट और बजटकार से नहीं। शेषन ने सुधारों की शुरुआत कर जिस तरह चुनाव-आयोग की साख बहाली की, वह निश्चय ही काबिलेतारीफ है। पर उनके बाद भी आयोग में सदस्य लगातार बदलते रहे, चंद नियुक्तियों को लेकर विवाद भी उठे पर संस्थान नहीं लड़खड़ाया। इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सफलतापूर्वक शुरू की गई, मतदाता परिचय-पत्र बने और बटे, चुनावी आचरण संहिता बनी और चुस्ती से लागू हुई। आज भारत का चुनाव आयोग दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए भी एक अनुकरणीय संस्था है। भारत सरकार की अन्य संस्थाओं के लिए तो है ही।

संस्थागत बदलाव लाना एक लंबी, कष्टकर और ग्लैमरहीन प्रक्रिया है। अक्सर चेष्टा की जाती है कि एकाध करिश्माती लोग नियुक्त कर दिए जाए, और फिर मित्र मीडिया की मार्फत धुआधार प्रचार करवा कर साबित किया जाए कि अमुक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलावों का सूत्रपात हो गया है। लेकिन हम पाते हैं कि दिल्ली और हमारी प्रांतीय राजधानियों में ऐसे कई सरकारी, अर्धसरकारी मिशनों, अकादमियों और कला-भवनों की कब्रगाहें मौजूद हैं, जिनका ढोल-पीट खर्चीला प्रचार हुआ, पर नियुक्तियों में धाधली और अवांछित राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण आज वहा धूल उड़ती दिखती है। ऐसी कुछ अप्रचारित संस्थाएं भी कायम हैं, जो बिना समय गंवाए कर्मठ चुस्ती से योजनाओं को अमली जमा पहना रही हैं। और उनके जहूरे से कुछेक क्षेत्र चमक उठे हैं। विश्वबैंक के ताज सर्वे ‘डूइंग बिजनेस इन इंडिया’ ने 17 भारतीय शहरों का अध्ययन करके जानना चाहा कि सफल आर्थिक उपक्रम किन बातों पर निर्भर हैं? नतीजों ने बताया कि यह इस पर निर्भर करता है कि नगर विशेष में धंधा शुरू करना, निर्माण परमिट पाना, प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन कराना, सीमापार सामान लाना-ले जाना, टैक्स चुकाना, कॉन्ट्रेक्ट लागू कराना और बिजनेस का समापन करना कितना आसान है। इन कामों को अंजाम देने वाले सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता के आधार पर पाच शहरः लुधियाना, हैदराबाद, भुवनेश्वर, गुड़गाव और अहमदाबाद चोटी के प्रमाणित हुए हैं। राजधानी दिल्ली का नंबर उनके नीचे छठा है। पाया गया कि दिल्ली में बिजनेस शुरू करना तो आसान है, पर उसके बाद के कार्यकारी चरण संस्थागत ढिलाई के कारण खासे दिक्कतकारी बन जाते हैं, खासकर सीमापार सामान की ढुलाई और कांट्रैक्टों का अनुपालन सुनिश्चित कराना तो बड़ा ही दुष्कर बना दिया जता है। महानगर मुम्बई दिल्ली से भी नीचे दसवीं पायदान पर है, क्योंकि वहा धंधा शुरू करना, कांट्रैक्ट का पालन और निर्माण परमिट पाना भ्रष्टाचार और सरकारी संस्थानों की शिथिलता के कारण टेढ़ी खीर बने हुए हैं, अलबत्ता वहा धंधा बंद करना काफी आसान पाया गया।
हमारी राय में विकास के नाम पर जीत कर आया और विकासपरक बजट बनाने वाला हमारा नेतृत्व अगर सचमुच सच्चे विकास के प्रति प्रतिबद्ध है, तो बजट ही नहीं, उसके बाद भी उसे जसे भी हो योजनाओं के रथ को दार्शनिक व्याख्या और सुन्दर शब्दों में (कविता की पंक्तियों समेत) की गई क्रांतिकारी ध्वनियों के आगे ले जाना होगा। सूचनाधिकार और संचार क्रांति के युग में चुनावोपरान्त भी बजटों के आगे का रास्ता नेताओं को सीधे सार्वजनिक जवाबदेही की ही ओर ले जाता है।

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