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धीरेन्द्रनाथ बास्के का विवेक

संथाली के विद्वान और चिंतक डॉ. धीरेन्द्रनाथ बास्के ने पश्चिम बंगाल सरकार के लालगढ़ में चलाए जा रहे पुलिस ऑपरेशन के विरोध में सभी सरकारी पदों से इस्तीफा दे दिया है। डॉ. बास्के अस्सी वर्ष के हो चुके हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासी भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति और सभ्यता के अनुशीलन में लगाया। डॉ. बास्के 1956 से ही पश्चिम बंगाल के विभिन्न विभागों से सम्बद्ध रहे हैं। वे 1956 में राज्य के संस्कृति विभाग की संथाली पत्रिका ‘पछिम बांग्ला’ के संस्थापक संपादक बने थे। परवर्तीकाल में संपादक के रूप में रिटायर होने के बाद 1990 में वे इस पत्रिका के संरक्षक बने। आदिवासी भाषा-संस्कृति के क्षेत्र में डॉ. बास्के के योगदान को देखते हुए राज्य सरकार के सूचना व संस्कृति विभाग के तहत आनेवाले लोक संस्कृति व आदिवासी संस्कृति केन्द्र का सदस्य भी मनोनीत किया था।

राज्य के सूचना निदेशक को भेजे अपने त्याग पत्र में डॉ. बास्के ने लिखा है, ‘मैं 53 वर्षो से आपके विभाग से जुड़ा हूं और इस दौरान आदिवासी संस्कृति के क्षेत्र में यथासाध्य काम करने की कोशिश मैंने की लेकिन इधर मैं देख रहा हूं कि पश्चिम मेदिनीपुर के लालगढ़ में पुलिस ऑपरेशन की आड़ में आदिवासियों का दमन किया जा रहा है। राज्य पुलिस और केन्द्र के अर्धसैनिक बल जंगलपुत्रों के जीवन को तबाह कर रहे हैं। आदिवासी गांव नष्ट किए जा रहे हैं, ऐसी अवस्था में मेरे लिए राज्य सरकार के किसी पद पर रहना संभव नहीं है। अतएव लोकसंस्कृति व आदिवासी संस्कृति केन्द्र के सदस्य व ‘पछिम बांग्ला’ के संरक्षक पदों से मेरा इस्तीफा स्वीकार करें।’

ये वही बास्के हैं जिन्होंने सिंगुर व नंदीग्राम कांडों के बाद राज्य की संथाली अकादमी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। राज्य सरकार के सभी पदों से इस्तीफा देने के बाद डॉ. बास्के मेरे घर आए थे। लालगढ़ से आदिवासी दमन संबंधी आ रही खबरों से वे अंदर तक हिले हुए थे। लालगढ़ में पुलिस ऑपरेशन के दौरान संथाली में गिराए गए पर्चे पर वे बेतरह खिन्न थे। वे इस बात से भी दु:खी थे कि बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य संथाली भाषा और अलचिकी लिपि में अंतर नहीं समझते। मुख्यमंत्री अपने वक्तव्यों में अलचिकी लिपि को अलचिकी भाषा कहते हैं। मैं भी यह जानकर हैरान रह गई कि मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि संथाली भाषा की लिपि का नाम अलचिकी है। शायद मुख्यमंत्री को यह भी पता नहीं कि डॉ. धीरेन्द्रनाथ बास्के वे पहले विद्वान हैं जिन्होंने बांग्ला अक्षर में संथाली भाषा पहली बार लिखी थी। शुरुआत वहीं से है।

रही संथाली से बुद्धदेव सरकार के प्रेम की बात तो कोलकाता के साल्टलेक में संथाली अकादमी का साइन बोर्ड महीनों से टूटा पड़ा है, उसे बनवाने की जहमत भी राज्य सरकार नहीं उठा रही है। वर्षो पहले वाममोर्चा सरकार को आदिवासी समाज के इतिहास, भाषा, साहित्य की तथ्यपरक आर्काइव बनाने का प्रस्ताव दिया गया था।

डॉ. बास्के का प्रस्ताव था कि इसकी शुरुआत संथाली से हो। संथाली अकादमी के उपाध्यक्ष रहते हुए डॉ. बास्के ने नॉव्रे के ओसलो विश्वविद्यालय के पीयो बोर्डिग के ग्रंथों की माइक्रो फिल्म बहुत कठिनाई से मंगवाई। सवा सौ साल पहले पीओ बोर्डिग ने अदम्य परिश्रम कर संथाली समाज के इतिहास, साहित्य, संगीत, लोककथा, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, ज्योतिष विद्या, कृषि, सिंचाई आदि के बारे में प्रामाणिक तथ्यों का संग्रह किया था। लेकिन उन तथ्यों की माइक्रो फिल्म को प्रकाशित करने की कोई दिलचस्पी वर्ष दर वर्ष राज्य के सूचना-संस्कृति विभाग या आदिवासी कल्याण विभाग ने नहीं दिखाई। संथाल-बांग्ला और बांग्ला-संथाल शब्दकोश के क्षेत्र में भी राज्य सरकार ने उदासीनता दिखाई। यह जानते हुए भी अलचिकी लिपि में संथाली लड़कों की शिक्षा-दीक्षा जटिल है, उसे लागू कराया गया। असल में आदिवासियों की किसी भाषा-संस्कृति पर कोई काम तभी संभव है जब उसके प्रति भीतरी श्रद्धा हो। यदि इस सरकार की श्रद्धा रहती तो वह आदिवासियों पर जुल्म नहीं करती। ऐसी जुल्मी सरकार लालगढ़ में संथाली में पर्चे क्यों गिरवा रही है?

मेरी नजर में डॉ. बास्के की इज्जत और बढ़ गई है। मैं उनके विवेक को सलाम करती हूं। डॉ. बास्के के इस्तीफे ने बुद्धदेव सरकार का मुखौटा फिर उतार दिया है। अब जन गण देख सकते हैं कि वही वाममोर्चा सरकार पश्चिमी मेदिनीपुर-बांकुड़ा-पुरुलिया के आदिवासियों का ध्वंस कर रही है जिसने 37 लोधा शबरों को मारा। बुधन शबर को मारा। चुनी कोटाल को आत्महत्या करने को विवश किया। अरण्यजीवियों को अरण्य से बेदखल किया। उनका जीना मुश्किल किया। आदिवासी अंचलों को न पीने का पानी उपलब्ध कराया, न चिकित्सा का प्रबंधन, सड़क न बिजली। कोई सरकारी योजना आदिवासी अंचल नहीं पहुंचती। यदि विकास की मांग की जाती है तो दमन का सहारा लिया जाता है। लालगढ़ व आस-पास दमन चक्र तेज हुआ है। उसके देशव्यापी प्रतिवाद व प्रतिरोध की दरकार है।

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