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दर्शकों को भा रही है क्षेत्रीय भाषाएं

दर्शकों को भा रही है क्षेत्रीय भाषाएं

कुछ समय पहले फिल्मों में गीत-संगीत को और प्रभावी बनाने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों एव लोकगीतों का प्रयोग किया गया तो लोगों ने उसे खासा पसंद किया। पर अब ऐसे सीरियलों की संख्या में भी दिनोंदिन बढ़ोत्तरी हो रही है, जिनमें हरियाणवी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी आदि क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। अब इसे निमार्ताओं की औरों से कुछ अलग करने की इच्छा कहें या फिर अपने सीरियलों को क्षेत्रीय लोगों से जोड़ने की तरकीब। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन ऐसे सीरियलों को दर्शक भी बड़े मजे से देखते है। फिर चाहे वो ‘बालिका वधू’ की मीठी-मीठी बातें हों या फिर एफआईआर सीरियल में मिस चौटाला की चटपटी बातें। हर कोई इन्हें बड़े मजे लेकर देखता है। ऐसे बहुतेरे दर्शकों का मानना है कि हिंदी और अंग्रेजी तो सभी बोलते हैं, लेकिन जब हम इन भाषा का इस्तेमाल करते है तो सामने वाला कहीं न कहीं इनसे खुद को जोड़कर देखता है। यही नहीं, ऐसे सीरियल्स में क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग की मदद से लोगों तक कई तरह के संदेश पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। 

भोजपुरी की झलक
आज ऐसे कई सीरियल्स चल रहे हैं, जिनमें भोजपुरी भाषा ने अपनी एक खास जगह बनाई है। अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजो, भाग्यविधाता, मितवा ऐसे कई धारावाहिक हैं, जो दर्शकों के बीच आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इन सीरियलों में भोजपुरी भाषा का इतनी कुशलता से प्रयोग किया गया है कि लोग इन कहानियों को अपने आस-पास घूमता हुआ महसूस करते हैं। फिर चाहे पुनपुन वाली के तीखे ताने हों या फिर लाली की सदगी, हर कोई इन भोजपुरी सीरियलों के जरिए यूपी, बिहार की समस्या से घर बैठे रू-ब-रू होता है।

पंजाबी तड़का
जुगनी चली जलंधर, सबकी लाडली बेबो, मेरे घर आई एक नन्ही परी जैसे कई धारावाहिक हैं, जिनमें पंजाबी तड़के का स्वाद चखने को मिलता है। इस तरह के पंजाबी धारावाहिक पहले भी प्रसारित होते रहे हैं, लेकिन उस समय इनमें पंजाब की सिर्फ झलक भर ही दिखाई देती थी। पर आज इन सीरियलों में पंजाबी भाषा और वहां के रहन-सहन के तरीके का जोर-शोर से इस्तेमाल किया जाने लगा है। कहा जा सकता है कि इन सीरियलों में पंजाबी जोश की कोई कमी देखने को नही मिलती।

राजस्थानी और हरियाणवी छाप
    क्षेत्रीय भाषा की बात हो रही हो तो ‘बालिका वधू’, और ‘ना आना इस देश लाडो’ जैसे सीरियलों को कैसे भुलाया जा सकता है, जिनमें दादीसा की दादीगीरी और अम्मा जी का लाडो पर किया जाने वाला जुल्म शामिल है। हर कोई इन सीरियलों का दीवाना है। बींदणी, लाडेसा, थारी भली होवे, म्हारी थारी जैसे कई शब्द हैं, जो दर्शकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं और लोग इन्हें अपनी बोल-चाल में शामिल भी कर रहे हैं। 

गुजराती मसाला
अन्य भाषाओं के अलावा गुजराती भाषा भी सीरियलों में जमकर इस्तेमाल हो रही है। मनीबेन डॉटकॉम, बंदीनी, बुरे भी हम भले भी हम, हमारी देवरानी जैसे कई सीरियल हैं, जो गुजराती मसाले के चलते लोगों के बीच अच्छी खासी पहचान बना चुके हैं। मोटा भाई, केम छो, जैसे कई शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल लोग करने लगे है। एमए फर्स्ट ईयर में पढ़ने वाली बिंदू का कहना है, इन सीरियलों में प्रयोग की जाने वाली भाषा मुझे बहुत पसंद है। मैं इन सीरियलों की फैन हो गई हूं। बढम्ती टीआरपी ने इन्हें और प्रभावशाली बना दिया है।


तू राजा की राजदुलारी.. फिल्म डेव-डी और फिल्म दिल्ली में गेंदा फूल सरीखा, लोकगीत काफी हिट रहे। पर जब छोटे परदे पर एक के बाद एक ऐसे सीरियल्स की शुरुआत हुई जो खासतौर पर क्षेत्रीय भाषाओं या बोली पर आधारित थे तो लोगों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। इनकी बढम्ती टीआरपी बताती है कि दर्शक इन्हें पसंद कर रहे हैं।

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