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भारी पड़े साल के पहले छह महीने

भारी पड़े साल के पहले छह महीने

एक-दो को छोड़ ज्यादातर को दर्शकों ने नकार दिया। पिछले सप्ताह रिलीज फिल्म न्यूयॉर्क को बडी ओपनिंग नहीं मिली होती तो आनेवाली बड़ी फिल्मों का भविष्य खतरे में पड़ जाता। न्यूयॉर्क को एक बडी हिट घोषित कर दिया गया है। कहने को तो इस साल के पहले छह महीनों में ताबड़तोड़ फिल्में आईं। लेकिन इनमें से ज्यादातर इस काबिल नहीं थीं कि कोई उन्हें देखता भी। अगर पिछले साल से तौल कर देखें तो जहां वर्ष 2008 के पहले छह महीनों में आई 113 फिल्मों में से दो फिल्में खासी कामयाब रहीं और 17 ने ठीक-ठाक कमाई की थी, वहीं इस साल अब तक आई 129 फिल्मों में से मात्र एक फिल्म ही बढिम्या रही और सिर्फ पांच ने औसत तक पहुंचने की हिम्मत दिखाई।

आधे साल के इस सफर में सबसे आगे खड़ी दिखती है भट्ट केंप की राज-द मिस्ट्री कंटिन्यूज पिछली वाली सुपरहिट राज से कोई नाता न होने के बावजूद इस फिल्म ने हॉरर के मसाले को कायदे से बेचा और अच्छी कमाई कर गई। इसका कम बजट में बनना भी इसके लिए फायदे का सौदा रहा। अनुराग कश्यप की देव डी ने उम्मीद से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया। देवदास की कहानी के इस आधुनिक संस्करण को आधुनिक सोच वाले दर्शकों के साथ-साथ युवा वर्ग ने काफी सराहा। रंग दे बसंती वाले निर्देशक राकेश मेहरा दिल्ली में कुछ ज्यादा उपदेशात्मक हो गए, वरना अपने चमकते चेहरों और उम्दा म्यूजिक के दम पर यह फिल्म और ज्यादा चल सकती थी। चांदनी चौक टू चाइना  जब आई थी तो ऐसा शोर था कि यह रिकॉर्ड बनाएगी। मगर  लचर पटकथा और पिलपिलेपन के चलते यह चांदनी चौक में भी हिट न हो सकी। कुछ बड़ी फिल्मों को तो उनकी कमजोरियों के चलते दर्शकों के जबर्दस्त गुस्से का शिकार होना पड़। जोया अख्तर ने लक बाय चांस में फिल्म इंडस्ट्री के अंदरूनी हालात पर अच्छी रोशनी डाली, लेकिन इसका क्लास स्वाद इस आम दर्शकों से दूर ले गया। शाहरुख खान की कंपनी से आई बिल्लू में सहजता जरूर थी, मगर दर्शकों को उनकी फिल्मों से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रहती हैं, सो यह भी पिटी। नील नितिन मुकेश-बिपाशा बसु की आ देखें जरा भी कमजोर कथानक का शिकार हुई। बॉबी दिओल की एक-द पॉवर ऑफ वन, माधवन की 13 बी, सोहैल खान वाली टीम-द फोर्स वगैरह भी कहीं-कहीं, कुछ-कुछ ही देखी गईं। ढूंढम्ते रह जाओगे और ये दोनों ऐसी कॉमेडी फिल्में थीं, जिनकी स्क्रिप्ट पर अगर थोड़ी मेहनत और की जाती तो ये जरूर अच्छी सफलता पा सकती थीं। आलू चाट’का स्वाद भी कम ही पसंद किया गया। सुभाष घई के यहां से आई पेइंग गैस्ट भी वादे के मुताबिक मसालेदार न होने के चलते जल्द ही नकार दी गई।

औंधे मुंह गिरने वाली फिल्मों में हरमन बवेजा की दूसरी फिल्म विक्टरी, मनोज वाजपेयी की जुगाडम, गोविंदा की चल चला चल, फरदीन खान-कुणाल खेमू वाली जय वीरू, अनुराग कश्यप की गुलाल आदि फिल्में रहीं। नंदिता दास की बतौर निर्देशक पहली फिल्म फिराक ने तारीफें ही पाईं, दर्शक नहीं। अक्षय कुमार की ७10 तस्वीर  ने अपने बिग बजट के चलते निर्माता को सिवाय आंसुओं के कुछ नहीं दिया। जैकी भगनानी की कल किसने देखा’ को कुछ ही लोगों ने देखा।

अभी तक की 129 फिल्मों में से 61 यहां-वहां से डब होकर आईं। इनमें से अधिकांश को हडम्ताल ने रास्ता दे दिया वरना ये डिब्बों में बंद सड़ती रहतीं। सबसे उम्दा प्रदर्शन बेशक स्लमडॉग करोडम्पति का ही रहा। यह अलग बात है कि थिएटरों में आने से पहले ही पायरेसी के चलते इसे काफी लोग देख चुके थे।

कुल मिला कर फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि आधा सफर तो आरजू और इंतजार में कट गया, उम्मीद करें कि बाकी के छह महीनों में कुछ अच्छा मनोरंजन देखने को मिलेगा।

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