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आम आदमी के बजट पर ऐसा होगा असर

सोमवार को देश का आम बजट पेश होने जा रहा है। बजट में जो भी हो उसका सीधे या परोक्ष रूप से आपके बजट पर असर पड़ना लाजिमी है। पिछले कुछ दिनों से मिल रहे संकेतों के मुताबिक यहां आम आदमी के बजट पर संभावित असर का लेखा-जोखा पेश कर रहे हैं राकेश तनेजा

एक्साइज ड्यूटीः छूट मिली तो मौज
हजार सपने, हजार ख्वाहिशें। कार, फोन, कंप्यूटर, माइक्रोवेव, लैपटॉप, मोटरसाइकिल, टीवी, फ्रिज और न जाने ख्वाहिशों की लिस्ट में कितनी चीजें शामिल हैं जिन्हें हर आदमी खरीदना चाहता है। अब तो बस बजट का इंतजर किया जा रहा है वह भी बड़ी बेसब्री के साथ। उम्मीद है कि सरकार ऑटो सेक्टर के साथ-साथ उपभोक्ता बाजर में रौनक फिर से लौटाने के लिए एक्साइज ड्यूटी में छूट दे सकती है।

जानकारों और विशेषज्ञों की राय में मंदी का तोड़ यही है कि उपभोक्ता की जेब में पैसा छोड़ा जाए और बाजार को आकर्षक बनाया जाए। ऐसे में आम आदमी का बजट पेश करने का दावा करने वाली सरकार आपके लिए बाजार को आकर्षक बना सकती है। बड़ी कारों पर लगने वाली 24 फीसदी की एक्साइज को घटाकर छोटी कारों के समान 8 फीसदी करने की मांग लंबे समय से चल रही है। यदि आम बजट में ऐसा हुआ तो आपकी कार का सपना तो सच होगा ही और साथ ही आपके बजट में फिट सकती है बड़ी कार।

सर्विस टैक्सः घटा तो मजा, वरना सजा
ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि बजट में सर्विस टैक्स में परिवर्तन कर सकती है। फरवरी में तीसरे प्रोत्साहन पैकेज के तहत सरकार ने सर्विस को 12 फीसदी से घटा कर 10 फीसदी कर दिया था। लेकिन अब कहा जा रही है कि सरकार अपनी विभिन्न परियोजनाओं और विकास कार्यक्रमों के लिए बजट जुटाने के लिए सर्विस टैक्स को फिर से पुरानी दर पर ला सकती है।

यह भी हो सकता है कि सरकार आर्थिक मंदी को ध्यान में रखते हुए बीच का रास्ता अपनाते हुए सर्विस टैक्स की दर तो 10 फीसदी रहने दे, लेकिन इसके दायरे में आने वाली सेवाओं की सूची में कुछ और नाम जोड़ दे। ध्यान रहे कि फोन बिल, रेस्तरां, टैंट, कैटरिंग इत्यादि रोजमर्रा की 100 से ज्यादा सेवाओं पर लागू सर्विस टैक्स पहले से ही आपके बजट को निचोड़ रहा है और अगर इसमें कुछ अन्य सेवाएं जोड़ दी गईं तो फिर आपके बजट में छेद होना तय है।

एजुकेशन सैस व सरचार्जः यानी अतिरिक्त भार
सरचार्ज की माया आम आदमी की समझ से परे है। जब कभी भी किसी प्रकार की राष्ट्रीय आपदा आई तो सरकार ने इनकम टैक्स देने वालों पर सरचार्ज लगाकर उसकी भरपाई करने की कोशिश की है लेकिन पिछली बार सरकार ने जब 10 फीसदी का सरचार्ज लगाया तो वह उसे जानबूझ कर हटा नहीं रही है। दरअसल, 10 लाख से ज्यादा की आय वाले सभी व्यक्तिगत या एचयूएफ टैक्सपेयर्स को 10 फीसदी की दर से अपनी आय पर अतिरिक्त सरचार्ज देना होता है।

ऐसा ही मामला एजुकेशन सैस (2 प्रतिशत) और हायर एजुकेशन सैस (1 प्रतिशत) का भी है। हो सकता है कि सरकार इस बजट में इस आवाज पर ध्यान दे। टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया ने तो इस मामले में यह भी सुझव दिया है कि सरकार एजुकेशन सैस को खत्म कर हायर एजुकेशन के लिए डोनेशन देने वालों को ज्याद डिडक्शन की सौगात देकर इस कार्य के लिए पैसा जुटा सकती है। अगर बजट में सरचार्ज और सैस से पिंड छूटा तो यकीनन आपकी जेब भारी हो जाएगी।

एसटीटीः निवेशक की जेब का छेद हो सकता है बंद
एसटीटी यानी सिक्यूरीटीज ट्रांजक्शन टैक्स का नाम लेते ही आम निवेशक के मुंह का स्वाद बिगड़ जता है। आमतौर पर शेयर बाजर में किए गए सौदे के खर्च का 50 फीसदी इसी खाते में समा जाता है। इसका हिसाब-किताब रखना तो और भी पेचीदा मामला है। एसटीटी को लगाना बिल्कुल बेतुका है क्योंकि निवेशक कमाए चाहे न कमाए एसटीटी का भूत उसके हर सौदे से चिपका रहेगा।

बजट से पहले मिले संकेतों को माना जाए तो सरकार इस बार एसटीटी को चलता कर सकती है यो उसमें कुछ कमी ला सकती है। इससे ज्यादा निवेशक बाजर में उतर सकेंगे। वसे भी शेयर ट्रांजक्शन कॉस्ट के मामले में भारत काफी महंगा देश है। इस मद में कमी होने या फिर पूरी तरह से इसे खत्म किए जने से आपकी जेब और बजट पर नाहक पड़ता बोझ कम हो सकता है। दुनियाभर में भारतीय बाजारों को आकर्षक बनाने के लिए सौदे के खर्च में कमी लाने के लिए सरकार कदम उठा सकती है।

इनकम टैक्सः स्टैंडर्ड डिडक्शन बहाली की उम्मीद
इनकम टैक्स के मामले में बजट में राहत मिलने की उम्मीद कम ही व्यक्त की जा रही है। पिछले साल ही सरकार ने इनकम टैक्स की सीमा में बढ़ोतरी की थी और आर्थिक तंगी से जूझ रही सरकार के लिए इस मामले में राहत देना वैसे भी मुश्किल प्रतीत होता है। लेकिन हो सकता है कि सरकार स्टैंडर्ड डिडक्शन की फिर से बहाली कर टैक्सपेयर की जेब में थोड़ा पैसा ज्यादा छोड़ने की सिफारिश को मान ले।

उद्योग चैंबर्स की भी यह राय है कि टैक्सपेयर की जेब में पैसा छोड़ने से ही बाजर में मंदी दूर की जा सकती है। रही बात सरकार के राजस्व की वह उसे सर्विस टैक्स के रूप में हर आदमी दिन-रात लगभग हर खर्च पर दे ही रहा है। साथ ही एफबीटी को चलता कर कारोबारियों और वेतनभोगियों की लंबे समय से चली आ रही मांग मानी तो जेब भारी होने का रास्ता खुल सकता है। वैसे सेलेरी रिस्ट्रक्चर के रूप में कंवेयेंस, ट्रांसपोर्ट खर्च पर छूट आदि भी मिल सकती है।

जीएसटीः घट सकते हैं झंझट
इस समय आदमी कई तरह के टैक्सों से की मार ङोल रहा है। सेल्स टैक्स, सर्विस टैक्स, मनोरंजन कर और न जने ऐसे अनेक टैक्स हैं जिनसे आम आदमी हर रोझ जूझता है। इन तरह-तरह के टैक्सों से परेशान उद्योग जगत और विषय के जनकारों ने समय-समय पर इनका विरोध किया है। इन्हीं सब प्रयासों के चलते सरकार जल्द ही इन सबको एक टैक्स में शामिल करने जा रही है जिसे जीएसटी कहा जाता है।

दुनियाभर के करीब 150 देशों में यह जीएसटी लागू है। इन देशों में इस टैक्स की औसत दर 16 फीसदी के आसपास है। उम्मीद है कि भारत में भी इसे 16 फीसदी के आसपास रखा जाएगा। वैसे तो इसे पहली अप्रैल 2010 से लागू होना है, लेकिन बजट में इसे लागू करने का रोड मैप पेश किया जा सकता है। इसके लागू होते ही आम आदमी और कारोबारियों की टैक्स संबंधी कई मुश्किलों का अंत हो जाएगा और सभी तरह के टैक्स एक ही टैक्स में समा जाने से आम आदमी पर पड़ने वाल बोझ भी काफी हद तक कम हो जाएगा।

होम लोन, एजुकेशन लोनः मिल सकती राहत
इस समय हाउसिंग सेक्टर पूरी तरह से सुस्त पड़ा है। मकान बन तो रहे हैं लेकिन बिक नहीं रहे। खरीदार पैसे की तंगी से बाजार से नदारद हैं। कई बिल्डर और प्रमोटर फंड्स और कर्ज की कमी के कारण अपने प्रोजेक्ट टालने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में इस सेक्टर को फिर से उबारने के लिए सरकार हाउसिंग इंडस्ट्री में छाई मंदी को दूर करने के लिए बैंकों से लिए जाने वाले होम लोन की दरें तो घटाने की सिफारिश कर ही रही है।

वहीं हो सकता है कि टैक्स छूट के स्तर पर होम लोन में 1.5 लाख की सीमा को बढ़ाकर 2.5 लाख कर दिया जए। सरकार की मंशा इस कदम से आम टैक्सपेयर की जेब में पैसा डालकर अर्थव्यवस्था खासकर हाउसिंग सेक्टर को मंदी से उबारने की है। ऐसा ही संकेत एजुकेशन लोन के मामले में भी मिल रहा है। सरकार ने संकेत दिया है कि होम लोन के लिए गारंटी की शर्त को खत्म किया जा सकता है और साथ ही ब्याज पर छूट की कई योजनाओं का भी खुलासा बजट में हो सकता है।

डीडीटीः हट सकता है कमाई में लगा घुन
शेयर बाजार के निवेशकों की कमाई में टांका कहे जाने वाले डीडीटी यानी डिवीडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स की विदाई का वक्त आ गया है। इस कानून को पहले दिन से ही विरोध किया जा रहा है। निवेशक वर्ग इसे लेकर काफी खफा रहे हैं। कंपनियों ने भी अपने शेयरों के आकर्षण में कमी के लिए इसी डीडीटी को जिम्मेदार ठहराया है। कुछ समय पहले कंपनियों द्वारा मिलने वाले डिवीडेंड पर टैक्स टैक्सपेयर को देना पड़ता था।

अगर वह टैक्स के दायरे में होता था तो टैक्स देता था, लेकिन सरकार ने डिवीडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स लगाकर सीधे कंपनी को ही कुल डिवीडेंड पर टैक्स लगा दिया जिसका असर हर आदमी पर पड़ा और डिवीडेंड का प्रतिशत कम होने लगा। लेकिन माना जा रहा है कि उद्योग जगत ने वित्तमंत्री से अनुरोध किया है कि वह डीडीटी को खत्म करें। अगर ऐसा हुआ तो शेयर बाजार से होने वाली डिवीडेंड इनकम बढ़ सकती है।

न्यू पेंशन स्कीमः निकासी पर टैक्स का झोल
वर्ष 2004 में सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू की गई एनपीएस यानी न्यू पेंशन स्कीम को अब आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया है। पिछले साल इस पेंशन स्कीम ने करीब 14.5 प्रतिशत का हैंडसम रिटर्न दिया है। लेकिन फिर भी इसे लेकर निवेशक ज्यादा रुचि नहीं ले रहे। सरकार द्वारा पेश की गई न्यू पेंशन स्कीम में बाकी सब तो ठीक दिखता है लेकिन इसका ईईटी यानी एग्जेम्पट, एग्जेम्पट, टैक्स की रूपरेखा खटकती है।

इसमें निवेश करने और निवेश को बढ़ाते जाने के स्तर पर तो टैक्स छूट का प्रावधान है पर पैसा निकालते समय यह इनकम टैक्स के दायरे में आ जाएगा, इस बात का विरोध व्यापक तौर पर हो रहा है। शायद यही प्रावधान इसकी लोकप्रियता के रास्ते का रोड़ा भी है। हो सकता है सरकार इस बजट में इसे ट्रिपल ई का दर्जा दे दे जैसा अन्य बचत स्कीमों में लागू है। इससे यकीनन आपके निवेश पर बेहतर रिटर्न पाने का एक नया रास्ता और खुलेगा।

तेल-गैस रेगुलेटरः यानी हर समय लटकती तलवार
सरकार ने बजट से ऐन पहले पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि कर इस बात के संकेत दे दिए कि कच्चे तेल को लेकर इंटरनेशनल मार्केट में होने वाली उठा-पटक को अकेले झेलने को तैयार नहीं है। और साथ ही वह कीमतें बढ़ाने के लेकर होने वाली फजीहत को भी सीधे अपने सिर पर भी नहीं लेना चाहती। सरकार बजट में तेल और गैस सेक्टर के लिए रेगुलेटर लाने की घोषणा कर सकती है।

यह रेगुलेटर समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों के हिसाब से पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम बढ़ाएगा या कम करेगा। इसका मतलब तो यह होगा कि सरकार के नियंत्रण से निकलने के बाद पेट्रो प्रोडक्ट्स की कीमतों में हर समय फेरबदल की गुंजइश रहेगी जिससे आपका बजट कभी भी डांवाडोल हो सकता है। ऐसे में आपको अपने बजट में तेल-गैस के लिए स्पेशल प्रोविजन करके रखना होगा। और तैयार रहना होगा रेगुलेटर के फैसले के झटके खाने के लिए।

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