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हार के कारण

15वीं लोकसभा के चुनावों में मिली हार के बाद भाजपा के नेतागण आजकल चिंतन टाइप की बैठकें करने में व्यस्त हैं। होनी भी चाहिए कि आखिर ‘दृढ़ नेतृत्व-निर्णायक सरकार’ का वायदा और हिन्दुत्व की पूरी ताकत झोंक देने पर भी जीत क्यों न हुई। मेरे विचार में बाकी कारण चाहे और भी रहे हों (जेसे कि कुछ भाजपा नेताओं का आपसी मतभेद, भाजपा प्रवक्ताओं का हर विषय पर ‘नान-स्टाप’ बोलना, लोकसभा के सत्रों के दौरान भाजपा नेतृत्व का नकारात्मक रवैया विशेषकर परमाणु संधि पर इत्यादि), मुख्य कारण है जनता को ‘बोर’ कर देने वाले चुनावी नारे। जैसे कि दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान- ‘महंगी पड़ी कांग्रेस’, ‘अब होगी दिल्ली सुरक्षित’।

2009 लोकसभा चुनावों में दौरान- ‘मनमोहन सिंह कमजोर है, सोनिया के हाथ सरकार की बागडोर है’, ‘जय हो नहीं, भय हो’ वगैरा। आजपा को चाहिए कि ऐसे बोर नारे गढ़ने वाले को तो जरूर बदल दे। सरदार मनमोहन सिंह जसे कुशल और शालीन प्रधानमंत्री को बलहीन कहने वाले यह क्यों भूल गए कि देश के रहबरों की ताकत गर्दन से ऊपर होती है नीचे नहीं। मुझे डर यह है कि बीजेपी ‘बोर जनता पार्टी’ न बन जाए।

डॉ. आर. के. मल्होत्रा
179, नीलगिरी अपार्टमेंट्स, अलकनंदा, नई दिल्ली

 

पहली महिला गृहमंत्री नहीं

आपके समाचार पत्र में राधा विश्वनाथ द्वारा लिखित लेख ‘आंध्र प्रदेश : महिला गृहमंत्री की चुनौतियां’ शीर्षक पढ़ने को मिला। उसमें उन्होंने लिखा है कि सविता इन्द्र रेड्डी पर भारतीय महिलाओं को गर्व होना चाहिए कि वे किसी भी राज्य की पहली महिला गृहमंत्री बनीं हैं। इस संदर्भ में मात्र संज्ञान में लाना है कि उत्तर प्रदेश में 80 के दशक में ही स्वरूप कुमारी बक्शी को गृहमंत्री रहने का गौरव प्राप्त है। अत: यह संदर्भ सही नहीं है कि सविता इन्द्र रेड्डी किसी प्रदेश की पहली गृह मंक्षत्री बनीं हैं। चूकि यह समाचार लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित हुआ है, अत: अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए यह पत्र मैं लिख रहा हूं।

प्रमोद तिवारी, नेता, कांग्रेस विधान मंडल दल, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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