class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जात न पूछो कुलपति की

कुछ महीने पहले एक राष्ट्रीय अखबार के बंगलुरू संस्करण में निम्न शीर्षक से एक समाचार दिखा-‘मैसूर विश्वविद्यालय के पद के लिए तीन नाम छांटे गए।’ चूंकि मेरा अकादमिक जगत से रिश्ता रहा है और मैं मैसूर विश्वविद्यालय के कई पोस्ट ग्रेजुएट और शिक्षकों को जनता हूं, इसलिए मैंने खबर को आगे पढ़ा। रपट में आगे लिखा गया था कि ‘चयन समिति ने मैसूर विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए तीन उम्मीदवारों के नाम छांटे हैं। बालावीरा के नेतृत्व में काम करने वाली इस समिति की मंगलवार को बैठक हुई। सूत्रों ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि जो उम्मीदवार छांटे गए वे लिंगायत, अनुसूचित जति और वोक्कलिंगा समुदाय के हैं। उन उम्मीदवारों के नाम सरकार को दे दिए गए हैं। ’

रपट में उन छांटे गए उम्मीदवारों के नाम दिए गए थे, जिनसे आप उनकी जति का अनुमान लगा सकते थे। रपट में उन लोगों की योग्यता का कोई जिक्र नहीं था, जो मैसूर विश्वविद्यालय के नए कुलपति बनना चाहते थे। वे किस क्षेत्र के अकादमिक विशेषज्ञ थे? उनके पास उस विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने की क्या योजना थी जो कभी अच्छा हुआ करता था, लेकिन अब बर्बाद हो चुका है। लगता है अखबार के लिए इन चीजों का कोई मतलब नहीं है, जिस तरह उस सरकार के लिए नहीं है जिसे नियुक्ति का फैसला करना है। शायद उम्मीदवारों के लिए भी उन चीजों का कोई मतलब नहीं है। मुझे लगता है कि मैसूर इस मामले में अन्य जगहों से बिल्कुल अलग नहीं है। महाराष्ट्र में भी कुलपति की नियुक्ति के समय उसकी अकादमिक और प्रोफेशनल योग्यताओं के बजय जति और सामुदायिक पहचान पर जोर दिया जता। क्या राज्य सरकार ने इससे पहले बहुत ज्यादा मराठा नियुक्त कर दिए हैं? क्या अब दलित या ब्राह्मण को मौका दिए जाने का समय है? मुंबई में मंत्रालय में बैठे मंत्री के दिमाग में यह सवाल उठते जरूर। इसी तरह का आधार उत्तर प्रदेश में भी होता। फर्क यही है कि वहां इस समीकरण में राजपूत, लोध या अन्य प्रभावशाली जतियां अपनी भूमिका निभा सकती थीं। इस बीच कई उत्तरी राज्यों में किसी विशेष मुस्लिम को भी कुलपति बनाने का दबाव होता, तो केरल में किसी विशेष ईसाई को।


कभी-कभी कुलपति बनाने के पीछे आग्रह जतिगत न हो कर विचारधारात्मक भी होता है। केरल में वाममोर्चा की सरकार ने आधुनिक भारत के एक इतिहासकार को संस्कृत विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उन्होंने बीसवीं सदी के किसान विद्रोह पर स्वयं एक किताब लिखी थी। लेकिन उन्हें यह पद एक माक्र्सवादी होने के नाते दिया गया और इसे प्रकट भी किया गया, जबकि उनके अकादमिक काम के उल्लेख को उनके विशेषज्ञता वाले ब्योरे से हटा दिया गया था। इसी तरह से जहां भारतीय जनता पार्टी सत्ता में होती है, वहां उस व्यक्ति को इस काम के लिए चुना जाता है जो चाहे अकादमिक हो या छद्म अकादमिक हो, पर उसका हिंदुत्व से नाता जरूर हो। भले ही वह व्यक्ति उस पद के लिए योग्यता न रखता हो, जिस पर वह नियुक्त किया गया हो। जबकि कांग्रेस पार्टी अकादमिक वरीयता उसे देती है जो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के प्रति वफादार हो या लंबे समय से चमचा रहा हो। इसलिए वह रपट भारतीय विश्वविद्यालय प्रणाली के सामान्य अवमूल्यन की कहानी कहती है। उदाहरण के लिए जब बीसवीं सदी के आरंभ में आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति हुए,  सर्वपल्ली राधाकृष्णन 1930 के दशक में आंध्र प्रदेश के कुलपति नियुक्त हुए, हंसा मेहता 1950 के दशक में बड़ोदा के महाराज सयाजीराव विश्वविद्यालय की कुलपति हुई या के. एन. राज को 1970 के दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बनने का प्रस्ताव दिया गया तो न तो नियुक्त करने वाले अथॉरिटी और न ही प्रेस ने उनकी जाति पूछी। उन्हें इस पद के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि उनके पास विद्वता की उपलब्धियां थी और संस्थागत दृष्टि थी।

कुछ लोग इसे ब्राह्मणवादी अभिजात विश्लेषण कह कर खारिज कर सकते हैं। पर इस बारे में मेरा कहना है कि विश्वविद्यालय को एक प्रतिनिधि संस्थान होने की जरूरत नहीं है। इसके प्रतिनिधित्व का सबसे ज्यादा मतलब छात्रों के स्तर पर ही होना चाहिए। सामाजिक उपेक्षा की पृष्ठभूमि से आने वाले दलित और आदिवासी छात्रों को एक चौथाई सीटें दे दी जानी चाहिए। आनुपातिक तौर पर पांच प्रतिशत सीटें विकलांगों के लिए आरक्षित की जानी चाहिए। विश्वविद्यालय को गरीब छात्रों को वजीफा देना चाहिए और छात्राओं के लिए साफ और सुरक्षित हॉस्टल बनाना चाहिए। इसके अलावा संस्थानों को अपने प्रदेश और जिले से बाहर के छात्रों को आकर्षित करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि वे प्रांतीय कूप मंडूकता में न डूब जाएं।

शिक्षकों की नियुक्ति के बारे में मैं एक हद तक सकारात्मक कार्रवाई का विरोधी भी नहीं हूं। ऐतिहासिक तौर पर भारत में शिक्षा पर सवर्णो विशेष कर ब्राह्मणों, बनियों और कायस्थों का एकाधिकार रहा है। इन जातियों की जितनी आबादी है उस अनुपात में इनके पीएचडी किए हुए लोग कई गुना हैं। भारत के बौद्धिक अभिजात में राजपूत और ईसाइयों का प्रतिनिधित्व भी ठीक है। लेकिन इतिहास और सामाजिक पूर्वाग्रह के नाते दलित, पिछड़ा और आदिवासी श्रेष्ठ स्कूलों, कॉलेजों और शोध संस्थानों तक नहीं पहुंच पाते। इस पूर्वाग्रह को खत्म करने के लिए नौकरी के प्रवेश स्तर पर ज्यादा नहीं पर एक हद तक आरक्षण होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट पचास प्रतिशत आरक्षण की इजाजत देता है। लेकिन उसके बाद की तरक्की को जति निरपेक्ष रखा जाना चाहिए। कहने का मतलब यह है कि एसोसिएट या पूर्ण प्रोफेसर बनने के लिए व्यक्ति को अपने शिक्षण और शोध के आधार पर ही दावा करना चाहिए।

अगर शिक्षण के व्यवसाय में अकादमिक गुणवत्ता सबसे ऊपर है तो यह बात विश्वविद्यालय के सबसे बड़े पद यानी कुलपति के लिए भी लागू होनी चाहिए। इसलिए अगर उम्मीदवार की सारी योग्यताएं समान या लगभग समान हैं तो वंचित वर्ग के व्यक्ति को चुना जा सकता है। लेकिन जोर इस बात पर होना चाहिए कि उस उम्मीदवार का शिक्षण, शोध और प्रशासन में रिकॉर्ड कैसा है। पश्चिमी जगत के बाहर भारत में दुनिया के सबसे पुराने विश्वविद्यालय मौजूद हैं। भारत में जब मुंबई, कोलकाता और मद्रास विश्वविद्यालय बने तब चीन और अफ्रीकी देशों में कोई विश्वविद्यालय था ही नहीं। लेकिन आज विभिन्न कारणों से भारत के इस संस्थानों का पतन हो रहा है। अगर हम जति, विचारधारा और भाई भतीजावाद से ऊपर उठ कर बौद्धिक क्षमता को अपने केंद्रीय सस्थानों का एक मात्र आधार बनाएं तो यह अपने में भी अच्छा होगा और राज्य के स्तर तक संदेश भी जाएगा।


ramguha @vsnl. com
लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:जात न पूछो कुलपति की