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नदीः कोसी की धार पर लिखी तस्वीर

हर वर्ष अप्रैल से लेकर जून की तपती गर्मी से पूरा भारत बेहाल रहता है। मानसून की फुहारें जब भारत भर में, खासकर उत्तरी भारत को राहत पहुंचाती है तो मानसून के आगमन पर सारा भारत थिरक उठता हे, पर उत्तर बिहार जिसे लोग बोलचाल की भाषा में ‘मिथिलांचल’ कहते हैं, डर से थर-थर कांपने लगता है। उन्हें यह डर सताने लगता है कि पता नहीं कब नेपाल से आने वाली नदियों में बाढ़ आ जाए और उनकी जिन्दगी भर की कमाई को रातोंरात बहाकर ले जाए।

वैसे तो 1987 की प्रलयंकारी बाढ़ अभी भी लोगों के जेहन में ताज है, परंतु उस वर्ष स्वर्गीय राजीव गांधी ने पूरी दिलचस्पी लेकर मिथिलांचन के लोगों के दुख का निवारण किया था। इस काम में तत्कालीन रेलमंत्री स्वर्गीय माधवराव सिंधिया ने भी भरपूर मदद की थी। राहत कार्यो का पूरा संचालन राजेश पायलट ने किया था। दरभंगा से निर्मली तक की रेल लाइन उस प्रलयंकारी बाढ़ के कारण इस तरह टूट गई थी मानों कोई भयानक भूकंप आया हो। रेलवे ने बहुत प्रयास किए पर बाढ़ का आना फिर भी नहीं रुका। इसका प्रमुख कारण यह है कि नेपाल के लालची अफसरों, खासकर वन विभाग के अफसरों ने तराई क्षेत्र के घने जंगलों को बेरहमी से काटकर बहुमूल्य लकड़ियों को चोरी-छिपे भारत होकर विदेश भेज दिया। नेपाल ने कभी भी नए सिरे से वृक्षारोपण का प्रयास नहीं किया, जिसका नतीज यह हुआ कि भीषण वर्षा के कारण नेपाल की नदियों में आने वाले जल का वेग रुका नहीं और कुछ घंटों के अंदर ही मिथिलांचल में दानवी रूप धारण कर उसने बाढ़ का तांडव मचा दिया। सन् 2002 में फिर मिथिलांचल में प्रलयंकारी बाढ़ आई और बाद में 2008 में कोसी में जो प्रलयंकारी बाढ़ आई, उसे टीवी चैनलों पर न केवल भारतवासियों ने, बल्कि विदेशियों ने भी देखा। सारे संसार से कोसी पीड़ित लोगों को राहत सामग्री भेजी गई। गत वर्ष नीतीश सरकार ने बहुत ही सराहनीय काम किया था और मुस्तैदी से बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाई थी।

50’ के दशक में कोसी पर जो बांध बना था दुर्भाग्यवश उसका रखरखाव 70’ और 80’ के दशकों में ठीक से नहीं हो सका और बाद में तो यह बांध जार-जार ही होता गया। किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि एक दिन यह बांध टूट भी सकता है। बिहार के सुपौल जिले के बीरपुर-कोसी बराज के पास कुसहा में अचानक बांध टूट गया और उसके बाद जो प्रलयंकारी दृश्य सामने आया, उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है। आज भी हजारों लोग लापता हैं। बीरपुर के पास कोसी का कुसहा बांध क्यों टूटा, इसके बारे में पूरा सत्य कभी सामने नहीं आ पाएगा। परंतु यह सही है कि नेपाल सरकार ने कोसी बांध के रखरखाव में जरा भी दिलचस्पी नहीं ली।

यह बात कम लोगों को पता है कि मिथिलांचल में जनसंख्या का जो घनत्व है, उतना पूरी दुनिया में कहीं नहीं है, चीन में भी नहीं। मिथिलांचल का दरभंगा, मधुबनी, सहरसा और सुपौल जिले संसार की सबसे घनी आबादी वाले जिलों में हैं। नेपाल की नदियों से अचानक आई बाढ़ से लाखों लोग हर वर्ष इस अवर्णनीय पीड़ा को मिथिलांचल में झेलते हैं। आम जनता को तो पीने का स्वच्छ जल भी नसीब नहीं होता है। क्योंकि सभी चापाकल बाढ़ के पानी से बर्बाद हो गए होते हैं। यह कहानी हर साल दोहराई जती है। नेपाल से निकलने वाली नदियों के द्वारा मिथिलांचल में जो तांडव मचाया जाता है, उसका एक ही उपाय है कि उन नदियों पर खासकर कोसी, गंडक, बागमती, अधबारा और दूसरी छोटी-बड़ी नदियों को उनके उदगम स्थान पर ही हाई डैम बनाकर बांधना होगा, जिससे पानी धीरे-धीरे नेपाल की तराई और उत्तर बिहार को छोड़ा जाए। इन हाई डैमों से इतनी अधिक बिजली पैदा होगी, जिससे नेपाल और बिहार दोनों का कायाकल्प हो जाएगा।

कई बार भारत सरकार और नेपाल सरकार के बीच इस बारे में गंभीर वार्ता हुई। परंतु हर बार किसी न किसी कारण से वार्ता विफल हो गई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्वकाल में इस समस्या पर नेपाल सरकार से गंभीर वार्ता हुई थी। पीछे मुड़कर देखने से लगता है कि उस समय नेपाल सरकार का रवैया व्यावहारिक था। नेपाल सरकार का कहना था कि इस तरह की योजना पर हजारों करोड़ रुपया खर्च होगा। भारत सरकार का कहना था कि इस तरह की परियोजनाओं से जो बिजली पैदा होगी उसका बहुत बड़ा भाग भारत खरीदेगा। परंतु भुगतान भूटान के ‘चुक्का’ प्रोजेक्ट की तरह रुपयों में ही भारत करेगा। नेपाल सरकार को यह मंजूर नहीं था और बात बीच में ही टूट गई।

भारत सरकार को नए सिरे से पहल करनी चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि नेपाल में हाई डैम बनाने की योजना पर फिर से वार्ता हो तो नेपाल के प्रधानमंत्री माधव नेपाल का भारत सरकार को पूरा सहयोग मिलेगा।

गत वर्ष जिन लोगों ने कोसी के तांडव को टीवी के विभिन्न चैनलों पर देखा था उन्हें एक दृश्य अवश्य याद आता होगा जहां टूटी-फूटी झोपड़ी के छप्पर पर एक गरीब किसान का परिवार कह रहा है- ‘हम मारे छी मुक्का कपार पर। हमर तकदीर लिखल छै कोसी के धार पर’ (हम अपने सिर को पीट रहे हैं, क्योंकि हमारी तकदीर कोसी की धारा पर टिकी है)।

लेखक पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत हैं

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