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एक विनम्र कलाकार

चित्रकार तैयब मेहता चर्चा में तब आए, जब 2002 में उनका एक चित्र डेढ़ करोड़ रुपए में बिका, जो उस वक्त किसी भी समकालीन भारतीय चित्रकार के चित्र को मिली सबसे ज्यादा कीमत थी। लेकिन तैयब मेहता फलते-फूलते कला बाजार में चर्चित ग्लैमरस कलाकारों जैसे बिल्कुल नहीं थे। वे निहायत संकोची, विनम्र और अपनी कला में डूबे रहने वाले कलाकार थे। कलाकारों को उनकी कलाकृतियों की कीमत से ही आंकने वाले लोगों को आश्चर्य होगा कि मेहता मुंबई में एक कमरे के फ्लैट में रहते थे और ज्यादातर वक्त उनकी दाल रोटी का मुख्य जरिया चित्रों की बिक्री नहीं, उनकी पत्नी की नौकरी थी। ऐसा भी नहीं कि बाजार में कीमत बढ़ जाने या चर्चित हो जाने से उनमें कोई फर्क आया हो। उसके बाद भी न वे पार्टियों या पत्र पत्रिकाओं में छाए, न ही उनका अपनी कला के प्रति नजरिया बदला। वे उसी तन्मयता और एकाग्रता से पेंटिंग करते रहे, जैसा वे करते रहे थे। मेहता प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संस्थापकों के बाद आए सदस्यों में थे। प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप का भारतीय कला जगत में असंदिग्ध महत्व है। इसके सदस्य न भारतीयता के रूढ़ मुहावरों से बंधे थे, न ही पश्चिमी आधुनिकता की नकल करना चाहते थे। वे अपने विवेक से अजिर्त भारतीय आधुनिकता में विश्वास करते थे। प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के सारे ही सदस्य तब युवा कलाकार थे, जो अपनी कला से इस भारतीय आधुनिकता का स्वरूप भी स्पष्ट कर रहे थे और फ्रांसिस न्यूटन सूज जैसे कुछ लोग शब्दों में भी काफी मुखर थे। आधुनिकता की यह भारतीय पहचान तैयब मेहता के चित्रों में स्पष्ट दिखती है, लेकिन वे बहुत मुखर नहीं थे। तैयब बहुत पढ़े-लिखे सजग व्यक्ति थे, उन्होंने विदेश प्रवास में पश्चिमी कला का गहरा अध्ययन भी किया था, लेकिन उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति अपने रंगों और रूपाकारों तक ही सीमित रखी। बाजार के दबाव में उन्होंने कभी काम नहीं किया। हमेशा अपनी धीमी गति से गहरे अनुशासन के साथ काम करते रहे, जिसमें उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही सादगी और गहराई थी, किसी किस्म के लटके- झटके नहीं। तैयब मेहता की वजह से हम याद कर सकते हैं कि बाजार और तड़क-भड़क के दौर में भी ऐसी रचनात्मक प्रतिभाएं हो सकती हैं, और देर से ही सही उनको सम्मान भी मिल सकता है।

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