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पुरानी पटरी पर

ममता बनर्जी के रेल बजट में कहने, सुनने और ताली बजाने के लिए बहुत कुछ है। किराया न बढ़ाया जाना, महिलाओं, युवा वर्ग के लिए ढेर सारी सुविधाएं, नई ट्रेनें, नई रेल लाइनें, ‘विश्व स्तरीय’ स्टेशन वगैरह। फिर किराए और भाड़े में कोई बढ़ोत्तरी नहीं, उल्टे कुछ वर्गो के लिए रियायतें। ममता बनर्जी ने भारतीय रेलवे के संसाधनों से मतदाताओं को लुभाने की पुरानी परंपरा को ही कमोबेश निभाया है। जब भी रेल बजट आता है तो बुद्धिमान जनों को यह उम्मीद नहीं रहती कि इससे निकली व्यवस्था में भारतीय रेलें किसी प्रगति, किसी विकास या किसी आर्थिक तरक्की को ढोकर गांवों, कस्बों और शहरों में पहुंचाएंगी, यह मंशा अलबत्ता जरूर दिखती है कि ट्रेनें मतदाताओं को लादें और सीधे पोलिंग बूथ में पहुंचा दें।  इसमें अब किसी को कुछ भी अजीब नहीं लगता और आमतौर पर लोकलुभावन अर्थशास्त्र के विरोधी माने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसका समर्थन कर दिया है।

पुरानी अर्थव्यवस्था के जो साधन अभी भी उम्मीद बंधाते हैं, उनमें रेलवे सबसे ऊपर है। पूरे देश को आप हवाई संपर्क से जोड़ नहीं सकते और सड़कों के आप जितने भी स्वर्णिम चतुर्भुज बनाएंगे प्रदूषण का खतरा भी उसके साथ ही विस्तार पाएगा। आधुनिक रेल इस खतरे से बचा सकती है। इसलिए इतने बरस बाद भी देश में रेलें लंबी दूरी के आवागमन और माल ढुलाई की रीढ़ हैं, आगे के लिए भी हमारे सामने कोई विश्वसनीय विकल्प नहीं है। तरक्की के जितने भी सपने हम बुन रहे हैं, उनका एक बड़ा दारोमदार रेलवे के कंधों पर रहेगा ही। इसलिए जब रेल बजट आए तो उससे उम्मीद यही की जानी चाहिए कि वह रेलवे को संस्थागत तौर से भविष्य की इस भूमिका को निभाने के लिए तैयार करेगा। एक अच्छा रेल बजट रेलवे को एक ऐसे संगठन के रूप में मजबूत बना सकता है, जो खुद तरक्की करे और उस तरक्की का फायदा पूरे देश की आबादी को मिले। यह सब सस्ती यात्रा और सस्ते माल भाड़े से कहीं ज्यादा जरूरी है। भविष्य की जरूरतों के हिसाब से रेलवे की क्षमता के विस्तार का कोई संकल्प रेल बजट में नहीं दिखता। पर यह सब हो तभी सकता है, जब हम रेलवे को अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का औजार मानें, राजनीति को मजबूत करने का नहीं। आप ममता बनर्जी या उनके बजट को जमीन से ऊपर उड़ने का दोषी नहीं ठहरा सकते, क्योंकि उन्होंने महज परंपरा का ही पालन किया है। लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार जिस मजबूती के साथ सत्ता में लौटी है, उससे यह उम्मीद तो की ही जा सकती है।

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