class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बेआवाज यात्री की सुध लेनी होगी

इस बार का रेल बजट कुछ ही घंटों में सामने आने वाला है। इससे पहले आए लालू यादव के मुनाफेदार लोकप्रिय बजट और नई रेल मंत्री ममता बनर्जी से कुछ ज्यादा ही बढ़ी हुई उम्मीदों को देखते हुए कुछ और नए लोकप्रिय फैसलों की अपेक्षा है। लेकिन इस मौके पर अपने तजुर्बो के आधार पर रेल बजट की आम आदमी से जुड़ी व्यावहारिक प्राथमिकताएं गिनवा रहे हैं रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन जय प्रकाश बत्रा

मेरे हिसाब से सबसे बड़ा मुद्दा भारतीय रेल में सफर करने वाले उन 90 प्रतिशत यात्रियों से जुड़ा है जिनकी कोई आवाज नहीं है। वे आम आदमी हैं और बिना रिजर्वेशन के गैर आरक्षित डिब्बों में सिर्फ टिकट लेकर सफर करते हैं। आपकी जानकारी के लिए, लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों में से 90 प्रतिशत यात्री वे होते हैं जो गैर आरक्षित कम्पार्टमेंट्स में सफर करते हैं। हमारे-आपके जैसे लोग जो रिजर्वेशन करा के ही लंबी यात्राएं करते हैं, वे लंबी यात्रा करने वाले कुल यात्रियों का केवल 10 प्रतिशत होते हैं।

लेकिन लंबी दूरियां तय करने वाले उन 90 प्रतिशत लोगों की कोई आवाज नहीं है। उनके बारे में और उनकी परेशानियों के बारे में न तो मीडिया लिखता है और न ही भारतीय रेल ने उनके बारे में कभी गंभीरता से सोचा है। मुझे लगता है कि जब सरकार समेकित विकास (इन्क्लुसिव ग्रोथ) की बात कर रही है तो ऐसे करोड़ों यात्रियों के बारे में सोचना अनिवार्य है। मुझे उम्मीद है कि इस बजट में शायद रेलमंत्री उनके लिए कुछ करें।

आर्थिक स्थिति

मेरे हिसाब से रेलवे की आर्थिक हालत तो ठीकठाक ही है, लेकिन चुनौतियां कई हैं। अगर रेलवे की आर्थिक हालत की बात करें तो इसके पास सरप्लस तो है ही, लेकिन छठे वेतन आयोग की वजह से इस पर असर पड़ा है। पिछले साल छठे वेतन आयोग की वजह से रेलवे कर्मचारियों के बढ़े वेतन और एरियर के भुगतान में करीब 12,000 करोड़ रुपये गए। इस बार भी इसी मद में रेलवे को करीब 14,000 करोड़ रुपये खर्चने होंगे। इस वजह से इस बार रेलवे का सरप्लस कम होगा। लेकिन भारतीय रेल की असली चुनौती उन परियोजनाओं को पूरा करना है जो सालों से अधूरे पड़े हैं या जिन पर काम नहीं हो पा रहा है। ये वे परियोजनाएं हैं जिनकी घोषणा साल दर साल हर बजट में होती रही है, लेकिन उनके लिए किसी न किसी वजह से या तो धन की कमी हो जाती है या फिर कोई और अड़चन आती रहती है। ऐसे परियोजनाओं की लागत करीब 85,000 करोड़ है। यह वह रकम है जो इन परियोजनाओं की घोषणा के समय इनकी लागत थी। अब समय बीतने के बाद परियोजनाओं की लागत भी काफी बढ़ गई होगी।

मैं यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि भारतीय रेल की जो नियमित परियोजनाएं हैं, वे चलती रहती हैं और उनका काम नहीं रुकता। जसे डबल लाइन का काम, गेज कन्वजर्न का काम या नई लाइन बिछाने का काम। ये प्राथमिकता वाले क्षेत्र हैं और इनके लिए बजट का प्रावधान भी हो जता है और इनकी प्रगति भी अच्छी होती है। लेकिन मैं दूसरी बात कह रहा हूं।

भारतीय रेल एक ऐसा क्षेत्र है जहां प्रगति और विकास की लंबी योजनाएं लेकर चलना होता है। इन पर रेलवे का भविष्य निर्भर होता है। जसे रेलवे फ्रेट कॉरीडोर का महत्वाकांक्षी काम हो या रेलवे कोच बनाने वाले बड़ी फैक्टिरियों का निर्माण या तेज गति से चलने वाली ट्रेनों के लिए उपयुक्त रेल लाइनों का निर्माण करने का काम हो, इनके लिए ज्यादा धन और प्रभावी योजना की जरूरत है। इस क्षेत्र में रेलवे की प्रगति काफी कम है और यहां ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

सुरक्षा जरूरी रेलवे की सुरक्षा की जहां तक बात है तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि इस मामले में हाल के वर्षो में अच्छी प्रगति हुई है। 2001 में जहां 473 रेल दुर्घटनाएं हुई थीं, उनकी संख्या पिछले साल घटकर 174 हो गई। इनमें सीधी टक्कर केवल 13 ही थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो हम इस मामले में दूसरी रेल सेवाओं के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन मैं यह नहीं कह रहा कि इस क्षेत्र में सुधार की जरूरत नहीं। मेरा मानना है कि अगर रेल दुर्घटना घटकर एक भी रह जए तो भी यह चिंता का विषय है और इस पर ध्यान देना चाहिए। मेरी इच्छा है कि भारतीय रेल को सुरक्षा के नए आधुनिक उपाय समय समय पर अपनाने चाहिए और नई रणनीतियों पर गौर करना चाहिए। देखना है कि इस बजट में रेल मंत्री सुरक्षा के क्षेत्र में क्या नए कदम उठाने की घोषणा करती हैं।

यात्री पहली प्राथमिकता

अब हम यात्री सेवाओं की बात करें। लगातार शिकायतें आती रही हैं कि खान-पान और सफाई का स्तर गिर रहा है। मैं जनता हूं कि ये शिकायतें गलत नहीं हैं। इस क्षेत्र में रेलवे को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। कैटरिंग और सफाई रेल के एजेंडे में सबसे ऊपर होना चाहिए। इसे और नहीं टाला जा सकता। आरक्षित डिब्बों और लंबी दूरी की मंहगी ट्रेनों (राजधानी, शताब्दी वगैरह) में सफर करने वालों की लगातार शिकायत यह रही है कि खान पान में पिछले कुछ समय से लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। उनकी शिकायतें सफाई से भी संबंधित हैं। मेरा मानना है कि यात्री ठगा और लुटा-पिटा न महसूस करे। खुशी की बात है कि नई रेलमंत्री ने सफाई और खानपान सेवाओं को दुरुस्त करने को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है। टिकट के लिए आम लोगों की लाइनें लंबी होती जा रही हैं और लंबी दूरियों की ट्रेनों में टिकट मिलना एक मुश्किल काम होता है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है। नई ट्रेनों की शुरुआत और आरक्षण और टिकट प्रणाली की मौजूदा व्यवस्था को दुरुस्त करने और प्रभावी बनाने की जरूरत है।

माल ढुलाई के क्षेत्र में इंडस्ट्री की इच्छा है कि इसके किराए कम हों। मुझे लगता है कि उससे भी ज्यादा जरूरी है कि माल ढुलाई टर्मिनल को ज्यादा दुरुस्त करें। जहां माल लाया और जहां से ले जाया जाता है, वहां की मौजूदा गड़बड़ियों को ठीक कर दिया जाए तो इंडस्ट्री इसका स्वागत करेगी। अभी आर्थिक मंदी की वजह से वगन (माल ढुलाई के रेल डिब्बे) की उपलब्धता ठीक है, लेकिन मांग बढ़ने के बाद वगनों की कमी महसूस होने लगती है और इस पर प्राथमिकता से ध्यान देना रेलवे के लिए जरूरी है।

प्रस्तुतिः अमिताभ पाराशर

 

रोचक तथ्य

समय के लिहाज से सबसे लंबा सफर तय करने वाली रेल

समय के लिहाज से सबसे लंबा सफर तय करने वाली 6317 हिमसागर एक्सप्रेस (कन्याकुमारी और जम्मूतवी के बीच) समय के लिहाज से सबसे लंबा सफर तय करती है। यह 3751 कि.मी. की दूरी 71 घंटे, 45 मिनट में तय करती है।

सबसे ज्यादा राज्यों से गुजरने वाली रेल मंगलौर और जम्मू तवी के बीच चलने वाली रेल 6687/6688 नवयुग एक्सप्रेस सबसे ज्यादा राज्यों कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश से होकर गुजरती है।

कश्मीर में रेल सेवा

अक्तूबर 2008 में श्रीनगर के बडगाम जिले के राजवंशेर से अनंतनाग के बीच रेल सेवा शुरू हुई।

जरूरी है सुविधा
भारतीय रेलवे (न्यायालय के फैसले) के नियम के मुताबिक जो ट्रेन चार घंटे या 160 कि.मी. से ज्यादा का सफर तय करती है, उस ट्रेन में टॉयलेट की सुविधा होनी चाहिए। ईएमयू/मेमू में ये सुविधा नहीं होती।

दूरी के लिहाज से नॉन स्टॉप सफर तय करने वाली रेल
वर्तमान में ये रिकॉर्ड 2431/2432 त्रिवेंद्रम से हजरत निजमुद्दीन राजधानी का है। इस रेल ने वडोदरा से कोटा तक की 528 कि.मी. की दूरी नॉन स्टॉप तय की। इस दूरी को तय करने में उसे 6.5 घंटे लगे।

सबसे छोटी दूरी
नागपुर-अजनी महज तीन कि.मी. की दूरी तय करती है। यह मुख्यतः नागपुर स्टेशन से अजनी वर्कशाप काम करने जाने वाले क्रू को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

सबसे तेज रेलगाड़ी
भारत में भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस सबसे तेज रेलगाड़ी है।

डीजल गाड़ी की सबसे लंबी दूरी
सबसे ज्यादा लंबी दूरी 5933/5934 डिब्रूगढ़-अमृतसर एक्सप्रेस तय करती है।

इलेक्ट्रिक गाड़ी की सबसे लंबी दूरी
त्रिवेंद्रम-नई दिल्ली एक्सप्रेस जो कि एरनाकुलम और नई दिल्ली के बीच चलती है।

सबसे ज्यादा लोकोमोटिव बदलाव
सबसे ज्यादा लोकोमोटिव बदलाव वाली रेल 6381/6382 मुंबई-सीएसटी कन्याकुमारी एक्सप्रेस है। सीएसटी पुणो तक यह इलैक्ट्रिक इंजन द्वारा चलती है, पुणो से रेनीगुंटा तक यह डीजल इंजन द्वारा चलती है, रेनीगुंटा से एरनाकुलम तक यह फिर इलक्ट्रिक इंजन द्वारा चलती है और एरनाकुलम से कन्याकुमारी तक यह डीजल इंजन द्वारा जाती है।

कोच
सामान्यतः एक पैसेंजर ट्रेन  में 24 कोच होते हैं, जिसमें पेंट्री कार, लगेज वन आदि शामिल होते हैं। त्योहारों, छुट्टियों के दौरान आपको 25 या 26 कोच कर दिए जते हैं या फिर वीआईपी या ट्रेन को सफलतापूर्वक चलाने के लिए रेलवे स्टॉफ के लिए अतिरिक्त कोच जोड़ा जता है।

पुरानी ट्रेनें जो अब तक चल रही हैं
कई ट्रेनें जिनके रूट में बदलाव हुआ, नाम बदले, समय बदला, लेकिन वह ट्रेनें आज तक चल रही है। बैंगलोर मेल, 1864 से आज तक चल रही है।

लंबी सुरंग
कोंकण रेलवे की करबूदे सुरंग सबसे लंबी है। इसकी लंबाई 6.5 कि.मी. है।

लंबा ब्रिज
देहरी के पास सोन नदी पर बना नेहरू सेतु ब्रिज सबसे लंबा है।

सबसे ऊंचा ब्रिज
जम्मू तवी और ऊधमपुर के बीच गंभीर खाड़ ब्रिज सबसे ऊंचा है। यह 77 मी. ऊंचा है।

सबसे लंबा प्लेटफॉर्म
खड्गपुर प्लेटफॉर्म सबसे लंबा है। यह 1072.5 मी. लंबा है।

आमने-सामने दो स्टेशन
महाराष्ट्र में श्रीरामपुर और बलरामपुर दो स्टेशन एक ही रूट पर हैं। दोनों स्टेशन एक ही ट्रैक के दो तरफ एक दूसरे के सामने स्थित हैं।

भोजन
भारतीय रेलवे के कुछ स्टेशन अपने अलग-अलग व्यंजनों के लिए मशहूर है।

पुणो- चाय, मिसाल और कैंटीन की पेटीज
करजतः बटाटा वड़ा/वड़ा पाव
आगरा- पेठा
नई दिल्ली-आलू चाट
जयपुर-दाल बाटी
गोरखपुर- रबड़ी
इलाहाबादः मोतीचूर लड्डू

ट्रेनों की नंबरिंग कैसे की जाती है?
मुख्यतः लंबी दूरी की पैसेंजर गाड़ियों में वर्तमान में इस सिस्टम का ही पालन होता है। सामान्यतः ट्रेन नंबर चार डिजिट का ही होता है।

पहली डिजिट क्षेत्र और जोनल रेलवे के बारे में जानकारी देती है

कोंकण रेलवे

सेंट्रल रीजन, वेस्ट सेंट्रल रीजन और एनसीआर

सुपरफास्ट, शताब्दी और जनशताब्दी

पूर्वी रीजन और पूर्वी मध्य क्षेत्र

उत्तरी रीजन, उत्तरी सेंट्रल रीजन और उत्तरी पश्चिमी रीजन

एनईआर और एनएफआर

दक्षिण रीजन और दक्षिण पश्चिम रीजन

साउथ सेंट्रल रीजन और साउथ वेस्ट रीजन

साउथ ईस्ट रीजन

वेस्ट रीजन, नॉर्थ वेस्ट रीजन और वेस्ट सेंट्रल रीजन

सेंट्रल और वेस्ट सेंट्रल रेलवे

मुंबई सीएसटी

झांसी

भोपाल

मुंबई सीएसटी की ओर जाने वाली फास्ट पैसेंजर ट्रेन

शोलापुर और जबलपुर डिविजन

दादर जाने वाली ट्रेन, एक कटरी जाने वाली ट्रेन

कुछ भोपाल जाने वाली ट्रेन


‘अप’ और ‘डाउन’ का मतलब क्या होता है?
‘डाउन’ का मतलब है कि कोई ट्रेन अपने मुख्यालय या डिवीजनल मुख्यालय से दूर जा रही है और ‘अप’ का मतलब मुख्यालय या डिवीजनल मुख्यालय की तरफ आ रही है।

भारतीय रेलवे के जोन  (कुल 16)

उत्तरी रेलवे
उत्तर पूर्व रेलवे
उत्तरपूर्वी सीमांत रेलवे
पश्चिमी रेलवे
दक्षिणी रेलवे
दक्षिण मध्य रेलवे
दक्षिण पूर्वी रेलवे
पूर्वी रेलवे
मध्य रेलवे


बाद में बने 7 जोन

दक्षिण पश्चिमी रेलवे
उत्तर पश्चिमी रेलवे
पश्चिमी मध्य रेलवे
उत्तर मध्य रेलवे
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे
पूर्वी तटीय रेलवे
पूर्वी मध्य रेलवे

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