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रेलवे गेज

रेल पटरी के अंदरूनी हिस्सों के फासले को गेज कहते हैं। दुनिया की साठ प्रतिशत रेल सेवा में स्टैंडर्ड गेज का इस्तेमाल किया जाता है। स्टैंडर्ड गेज का माप 1435 मिलीमीटर यानी चार फुट और साढ़े आठ इंच होता है। इसके अतिरिक्त, ब्रॉड गेज और नेरो गेज भी रेलवे में काम में लाई जाती हैं। कुछ गेज को ड्यूल गेज भी कहा जाता है जिसमें दो या अधिक रेलों को एक ही रास्ते पर जाने की सहूलियत मिलती है।

वर्तमान में भारत में चार रेल गेज हैं। ब्रॉड गेज, स्टेंडर्ड गेज, मीटर गेज, नैरो गेज। ब्रॉड गेज- 1676 मि.मी.  (5 फीट 6 इंच) भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला गेज है। यह गेज 89,771 कि.मी. के ट्रेक में इस्तेमाल होता है। जिन क्षेत्रों में ट्रैफिक कम होता है, वहां मीटर गेज-1000 मि.मी. का प्रयोग होता है। नैरो गेज कुछ रूट्स पर है। यह 3,350 कि.मी. का क्षेत्र कवर करते हैं। नीलगिरि माउंटेन रेलवे और दाजर्लिंग हिमालय रेलवे नैरो गेज का प्रयोग करती है।

स्टेंडर्ड गेज के स्थान पर ब्रॉड गेज का चुनाव 1850 में भारत के गवर्नर जनरल ने विशेष कारण से किया था। उन्होंने तेज आंधी और खराब मौसम से निपटने के लिए ब्रॉड गेज का चयन किया था। स्टैंडर्ड गेज भारत में कम जगहों पर ही बचा है। इसका एकमात्र उदाहरण कोलकाता ट्राम सिस्टम है। मीटर गेज 1880 में लॉर्ड मेयो द्वारा इस्तेमाल में लाया गया था। पहली मीटर गेज दिल्ली से फारुख नगर तक बनी थी। इसके पीछे मुख्य मकसद था लागत कम करना। नैरो गेज को बनाने के पीछे मुख्य कारण यह था कि इंजीनियरिंग की प्रक्रिया को आसान किया जाए और पैसे को बचाया जाए।

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